मुश्किल में बाइडेन सरकारः अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी की जांच शुरू, हाउस कमेटी ने मांगे दस्तावेज
हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के अध्यक्ष माइकल मैककॉल ने अमेरिकी विदेश सचिव एंटनी ब्लिंकन को एक पत्र भेजकर अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी की जानकारी मांगी है।

File Image: PTI
अमेरिका में अफगानिस्तान से सेना की वापसी का मुद्दा एक बार फिर से गरमा गया है। एक शीर्ष हाउस रिपब्लिकन ने अगस्त 2021 में अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी को लेकर बाइडेन प्रशासन की जांच शुरू कर दी है। विदशी मामलों पर यूएस हाउस कमेटी ने एक बयान में इसकी जानकारी दी है। इसके लिए बाइडन प्रशासन से अब तक के सभी दस्तावेज भी मांगे गए हैं।
अमेरिकी विदेश सचिव से मांगी जानकारी
हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के अध्यक्ष माइकल मैककॉल ने अमेरिकी विदेश सचिव एंटनी ब्लिंकन को एक पत्र भेजकर अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी की जानकारी मांगी है। मैककॉल ने आरोप लगाया कि बिडेन प्रशासन ने अब तक दस्तावेज सौंपने से इनकार किया है, लेकिन वह अब औपचारिक रूप से पैनल के अध्यक्ष के रूप में उनके निर्देशों के अनुपालन का अनुरोध कर रहे हैं।
फिर से आतंकवाद की चपेट में अफगानिस्तान
यूएस हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के बाद से यह देश आतंकियों का सुरक्षित पनाहगार बन गया है जिससे अमेरिका के विरोधियों का हौसला बढ़ा है। बयान में कहा गया है, कि अगस्त 2021 की निकासी पर दस्तावेजों और सूचनाओं का अनुरोध करने के बावजूद बाइडन प्रशासन ने दस्तावेज सौंपने से इनकार कर दिया है, जिसके वे हकदार हैं। माइकल मैककॉल ने कहा कि यूएस हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी अपने पास उपलब्ध अधिकारियों का उपयोग आवश्यकतानुसार सूचना के अनुरोधों को लागू करने के लिए करेगी।
सेना की वापसी के बाद तालिबान का कब्जा
अफगानिस्तान में दो दशकों के युद्ध के बाद, दसियों हजार लोगों की जान चली गई, खरबों डॉलर खर्च किए गए लेकिन काबुल पर तालिबान की सत्ता को रोका नहीं जा सका। अगस्त, 2021 में अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना दो दशक की उपस्थिति के बाद पूरी तरह से हट गई थी। इसके बाद तालिबान ने अफगान सरकार को हटाकर फिर से अपना कब्जा जमा लिया था। तालिबान के अधिग्रहण के बाद से अफगान आबादी एक गहरे आर्थिक, मानवीय और सुरक्षा संकट का सामना कर रही है। एक बार फिर से अफगानिस्तान में आतंकवादी घटनाएं बढ़ गई हैं और महिलाओं के अधिकारों को फिर से सीमित कर दिया गया है।
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