अंटार्कटिका में बहुत तेजी से पिघल रहा है Thwaites ग्लेशियर,जानें क्या कह रहे हैं वैज्ञानिक ?
अंटार्कटिका में 'कयामत के दिन' वाले हिमनद के नाम से कुख्यात Thwaites glacier आशंका से भी ज्यादा तेजी से पिघल रहा है। शोध करने वाले अपने निष्कर्ष से चिंतित हैं। इसकी वजह से पूरी दुनिया पर खतरा मंडरा रहा है।

अंटार्कटिका का विशाल थ्वाइट्स या डूम्सडे ग्लेशियर वैज्ञानिकों के पहले के अनुमानों से भी कहीं तेजी से पिघल रहा है। इसके बारे एक रिपोर्ट विज्ञान के एक जर्नल में प्रकाशित हुई है। हालात भयावह हैं। चिंता इस बात की है कि सिर्फ 'कयामत के दिन वाले' ग्लेशियर के पिघलने का ही खतरा नहीं है। यह अगर पिघला तो आसपास के विशाल हिमनदों को भी अपने साथ समेट लेगा। इससे पूरी दुनिया तबाह हो सकती है। समद्र का तल आपकी-हमारी कल्पना से भी ज्यादा ऊंचा हो सकता है। यह स्थिति कितनी प्रलयकारी हो सकती है, इसका सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है।
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अंटार्कटिका में 'प्रलय' की आहट!
अंटार्कटिका के विशाल थ्वाइट्स (Thwaites) ग्लेशियर को लेकर वैज्ञानिकों के दो ग्रुप ने जो रिसर्च किया है, उसके नतीजे माथे पर पसीने लाने वाले हैं। इन्होंने हिमनद के डूबे हुए हिस्सों और उसके आगे के भाग की पड़ताल के लिए आइसफिन नाम के रोबोटिक वाहन का इस्तेमाल किया है। पहले यह बता दें कि थ्वाइट्स ग्लेशियर 'कयामत के दिन वाले हिमनद' ( doomsday glacier) के रूप में भी कुख्यात है। वैज्ञानिकों ने हिमनद के अंदर दरारें, खारा और गर्म पानी का बहाव पाया है। जिसकी वजह से यह बहुत ही ज्यादा तेजी से पिघल रहा है। रिसर्च का यह निष्कर्ष काफी भयावह माना जा रहा है।

शोध में कौन लोग शामिल ?
थ्वाइट्स ग्लेशियर पर हुए दोनों शोध जर्नल नेचर में प्रकाशित हुए हैं। इस रिसर्च में ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे (BAS) और कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक शामिल थे। इस शोध को प्रोजेक्ट MELT के तहत संचालित किया गया। वैज्ञानिकों की टीम को पीटर डेविस और ब्रिटनी स्कमिड्ट लीड कर रहे थे। यह शोध अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम के कंसोर्टियम इंटरनेशनल थवाइट्स ग्लेशियर सहयोग का हिस्सा है। आइसफिन रोबोट ने बर्फ से आवाज की पहचान कर इस रिसर्च में बड़ी मदद की है।

शोध में ग्लेशियर के बारे में क्या पता चला है ?
रिसर्च में बताया गया है कि ग्लेशियर को जिस पहली समस्या का सामना करना पड़ रहा है, वह ग्लोबल वार्मिंग है। लेकिन, इससे वायुमंडलीय तापमान में वृद्धि नहीं हुई है, लेकिन पानी की हुई है। वास्तव में ऐसा लगता है कि बर्फ की वाटरलाइन पिछले 30 वर्षों में ही 16 किलोमीटर घट गई है। इसकी वजह से इसकी सतह का बहुत बड़ा हिस्सा गर्म खारे पानी के संपर्क में आ रहा है। इसके अलावा एक और प्राकृतिक घटना, जिसे टाइडल पंप कहते हैं, उससे भी दिक्कत बढ़ गई है। इसकी वजह से ज्वार की तरफ से बर्फ उठ जा रहा, जिससे इसके अंदर पानी का ज्यादा बहाव बढ़ गया है।

चिकने और नुकीले हिस्से अलग तरह से घुल रहे हैं
जिस इलाके में बर्फ समतल और चिकना है, वहां ठंडा पानी एक ब्लैंकेट की तरह काम करता है। इससे खारे पानी और खारेपन से इसकी रक्षा होती है। लेकिन, जहां सतह नुकीला है, वहां सतह के सीधा होने से बर्फ पर गर्म पानी का ज्यादा असर होता है और वहां अधिक तेजी से पिघलने की स्थिति पैदा होती है। यहां अलग-अलग तरह से भी गर्म पानी का दबाव बढ़ता है।

पहले के मॉडलों के अनुमानों से हालात ज्यादा खतरनाक
कॉर्नेल यूनिवर्सिटी की ग्रह और पृथ्वी विज्ञानी ब्रिटनी स्कमिड्ट ने तापमान को लेकर एक बहुत ही बुरा निष्कर्ष निकाला है। उन्होंने बताया है कि पहले के मॉडलों में जो 'प्रलय के दिन वाले' ग्लेशियर के लिए अनुमान लगाए गए थे, उसकी तुलना में उससे कम खराब परिस्थितियों में भी कितने खतरनाक तरीके से इसमें गिरावट आ रही है। मतलब 'बुरे दिन' के लिए अब बहुत ज्यादा जलवायु परिपर्तन की जरूरत नहीं है। यानि आगे हालात और खराब हुए तो 'डूम्सडे' ग्लेशियर पहले के अनुमानों से भी कहीं ज्यादा तेजी से पिघल जाएगा।
'प्रलय के दिन वाला हिमनद' पिघलने से क्या खतरा है ?
शोध में यह भी अनुमान लगाया गया है कि अगर यह विशाल थ्वाइट्स ग्लेशियर पूरी तरह से पिघल जाता है तो क्या होगा? इसकी वजह से दुनिया भर में समुद्र तल 30 सेंटी मीटर से भी ज्यादा बढ़ जाएगा। लेकिन, खतरा इतना ही नहीं है। अगर थ्वाइट्स ग्लेशियर पिघलता है तो आशंका है कि आसपास के इलाके के ग्लेशियर भी उसमें समाने लगेंगे। इसके चलते समुद्र का स्तर अतिरिक्त तीन मीटर तक बढ़ सकता है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि इसे 'प्रलयकारी' क्यों कहा जा रहा है!
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