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अजब ख़ान आफ़रीदी और अंग्रेज़ युवती के अपहरण की कहानी

अजब ख़ान आफ़रीदी के बेटे का कहना है कि उनके पिता ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी थी, लेकिन उन्हें अब न तो पाकिस्तान में कोई याद करता है और न ही अफ़ग़ानिस्तान में.

आज से सौ साल पहले वो एक साधारण-सा गुरिल्ला अभियान था जिसमें शामिल तीन आफ़रीदी युवक और उनके एक पंजाबी दोस्त को ये नहीं मालूम था कि वह अंग्रेज़ों के घेरे से बच कर ज़िंदा लौट सकेंगे या नहीं.

अभियान में शामिल इन चारों लोगों के सरदार अजब ख़ान आफ़रीदी थे. कुछ दिनों पहले घर पर मर्दों की अनुपस्थिति में पड़ने वाले एक छापे और महिलाओं के अपमान का बदला लेके ने इरादे से ये लोग कोहाट छावनी के उस बंगले में आए थे.

100 साल पहले यानी 13 अप्रैल 1923 को, उस समय के भारत के उत्तर पश्चिमी सीमान्त इलाक़े ख़ैबर पख़्तूनख़्वा में इस अभियान को अंजाम दिया गया था. उस समय वहां पर अंग्रेज़ों की हुकूमत थी.

'दर्रा आदम ख़ेल बोस्ती ख़ेल' की कहानियों में अजब ख़ान आफ़रीदी और उनके तीन साथियों के किरदार और इस अभियान का ज़िक्र मिलता है.

22 फ़रवरी 1923 की कार्रवाई और अंग्रेज़ों की प्रतिक्रिया

अंग्रेज़ों को छापामारी के एक मामले में अजब ख़ान आफ़रीदी की तलाश थी. वो आसपास के इलाक़े में अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़ कार्रवाइयों को अंजाम दे रहे थे जिसकी बदौलत वो स्थानीय लोगों में मशहूर होते जा रहे थे.

अंग्रेज़ उन्हें 'डाकू' कहते थे. अंग्रेज़ों का गोलाबारूद लूटने की वजह से वो 'वांटेड' भी घोषित किए गए थे.

22 फ़रवरी 1923 को एक घटना में उन्होंने कोहाट छावनी में मौजूद अंग्रेज़ फ़ौज के सिपाहियों की थ्री नॉट थ्री (303) की तरह की लगभग 64 बंदूक़ें के साथ ले गए थे.

यह बंदूकें उन्होंने अंग्रेज़ों की चौकी से लूटी. इसकी प्रतिक्रिया ये हुई कि अंग्रेज़ सरकार ने स्थानीय परंपराओं को रौंदते हुए क़बायली इलाक़ों में घुसकर कार्रवाई की. अंग्रेज़ क़बायली इलाक़े में कोई भी ऐसी कार्रवाई स्थानीय जिरगा के ज़रिए या उनकी मंज़ूरी से करने के पाबंद थे.

साइड कमांडर, फ़्रंटियर कांस्टेबुलरी के नेतृत्व में एक दस्ते ने अजब ख़ान आफ़रीदी के घर की घेराबंदी की. जब वो घर पहुंचे तो न तो अजब ख़ान वहां मौजूद थे न ही उनके भाई शहज़ादा ख़ान.

अजब ख़ान आफ़रीदी के बेटे हाजी नेक मोहम्मद ने अपने पिता पर एक क़िताब लिखी है. वो कहते हैं, "मुख़बिर की सूचना पर छापे के दौरान अंग्रेज़ों की टीम ने उनके घर के तहख़ानों से हथियार भी बरामद किए. उन्होंने अजब ख़ान आफ़रीदी के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की और उन्हें वाटेंड घोषित कर दिया. "

'मां की क़सम'

घर पर पड़े छापे के अगले दिन अजब ख़ान और उनके भाई शहज़ादा ख़ान आम दिनों की तरह घर आए. उन्हें अंग्रेज़ों की कार्रवाई का पता चला तो उन्होंने इसे अपनी जाति और इज़्ज़त का मामला बना लिया. दोनों ने घर की औरतों की बातें सुनीं और यह कहकर चले गए कि अब वह बदला लेने के बाद ही लौटेंगे.

हाजी नेक मोहम्मद कहते हैं कि जाने से पहले उनकी मां ने उनको क़सम दी कि जब तक वह इस बेइज़्ज़ती का बदला ना लें, वापस घर न आएं.

इसके बाद दोनों भाई पास के पहाड़ों में रहने लगे. वो कभी-कभार वहां घूमते-फिरते हुए दिख जाते थे लेकिन किसी को मालूम नहीं था कि उनके दिल में क्या है. इस दौरान उन्होंने अपने दो-तीन दोस्तों के साथ मिलकर अंग्रेज़ों से बदला लेने के लिए अंग्रेज़ मिलिट्री के मेजर एलिस को अग़वा करने की योजना बनाई.

योजना को अंजाम देने के लिए उन्होंने छावनी में मेजर एलिस के घर की निगरानी शुरू कर दी. इस योजना में सबसे बड़ी रुकावट मेजर एलिस का कुत्ता था जिसे रात को घर की निगरानी के लिए खुला छोड़ दिया जाता था.

उन्होंने सबसे पहले उसका बंदोबस्त किया. कुत्ते से दोस्ती करने के लिए वो हर दिन मीट खिलाने लगे. इस तरह उनके हमले की रात कुत्ते की निगरानी भी मेजर एलिस की कोई मदद न कर सकी.

पठान
COURTESY MEHMOOD BABAR
पठान

आत्मघाती हमला

कोहाट छावनी में अजब ख़ान आफ़रीदी के साथ घुसने वाले 'दर्रा आदम ख़ेल बोस्ती ख़ेल' के उन तीन आफ़रीदी जवानों में अजब ख़ान और उनके भाई शहज़ादा खान के साथ-साथ पंजाब के तिल्ला गंग (मियांवाली) से आए उनके साथी हैदर शाह भी शामिल थे.

वो छावनी में मेजर एलिस के घर में दाख़िल हुए. लेकिन मेजर एलिस की क़िस्मत अच्छी थी कि वह उस रात घर में मौजूद नहीं थे.

अजब ख़ान और उनके भाई शहज़ादा ने मेजर एलिस के घरों की दीवारें लांघी और उनके बेडरूम में पहुंच गए. वहां मिसेज़ एलिस से उनकी मुलाक़ात हुई जिन्होंने प्रतिरोध शुरू कर दिया. अंधेरे में शहज़ादा ख़ान ने यह समझ कर कि यह मेजर एलिस हैं, ख़ंजर के वार से उन्हें मार डाला.

इसी दौरान उन्हें यह अंदाज़ा हुआ कि मारा जाने वाला शरीर पुरुष का नहीं बल्कि महिला का था. उधर, सीटियां बजने की आवाज़ की वजह से घर के बाहर अंग्रेज़ सिपाही और अफ़सर जमा हो चुके थे. उनके बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था, लेकिन अचानक उन पर भाग्य की देवी मेहरबान हो गई.

उन्हें घर के अंदर एक 17 वर्षीय युवा लड़की मिस मौली एलिस मिलीं, जो अपनी मां को गिरते हुए देख चुकी थीं. हालांकि अंधेरे के कारण अभी उसे अपनी मां के मरने की ख़बर नहीं हुई थी. अजब ख़ान और उनके साथियों ने मौली एलिस को ढाल के तौर पर साथ रखा और अंग्रेज सिपाहियों का घेरा तोड़कर बाहर निकल गए.

दर्रा आदम ख़ेल बोस्ती ख़ेल के महल की जगह

पेशावर और कोहाट के बीच स्थित इस इलाक़े का नाम दर्रा आदम ख़ेल है. इसके गांव बोस्ती ख़ेल और कोहाट में अंग्रेज सरकार की छावनी के बीच केवल एक पहाड़ी थी.

यहां के रहने वाले आफ़रीदी क़बीले के लोग अंग्रेज़ों के लिए सिरदर्द बने हुए थे, क्योंकि वो बीच-बीच में अंग्रेज़ सरकार की चौकियों पर हमले करते रहते थे.

यहां के लोगों, ख़ास तौर पर अजब ख़ान आफ़रीदी के लिए यह बहुत आसान था कि वह छावनी या आसपास के इलाक़ों में हमले करके जल्दी से अपने इलाक़े में आ जाएं.

मिस मौली एलिस की कहानी

अपनी उम्र के आख़िरी पड़ाव में मिस मौली एलिस ने मीडिया को अपने अपहरण की कहानी के बारे में कुछ इस तरह बताया.

उन्होंने कहा, "उस दिन मैं आम दिनों की तरह दोस्तों के साथ वक़्त गुज़ारने और क़िताबें पढ़ने के बाद घर आई. कुछ देर तक अपनी मां के साथ रहने के बाद मैंने फिर क़िताब पढ़ी और उसके बाद हम सोने चले गए."

"इस दौरान मुझे नहीं मालूम कि रात के किस पहर शोर से मेरी आंख खुली. मुझे अपने कमरे में दो मर्द खड़े नज़र आए. मेरी मां उनके साथ संघर्ष कर रही थीं और वह अपने हाथ में मौजूद सीटी बजाना चाह रही थीं."

"इस दौरान उन दोनों मर्दों में से एक ने मेरी मां को क़ाबू में कर लिया. मेरी मां ने सीटी मेरी ओर फेंक दी लेकिन मैं उसे ना बजा सकी. पता नहीं उस समय मुझे क्या हो गया था. इस दौरान मेरी मां ने प्रतिरोध बंद कर दिया, मुझे लगा कि वो ज़ख़्मी हो गई हैं."

अजब ख़ान आफ़रीदी के बेटे ने क्या बताया

पेशावर में अपने घर पर बीबीसी के साथ बात करते हुए अजब ख़ान आफ़रीदी के बेटे नेक मोहम्मद ने बताया कि मिस एलिस की घटना तो उनके आख़िरी अभियानों में से एक थी. यह घटना 1923 में हुई जबकि उनके अनुसार उनके पिता 1919 से अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे.

वह बताते हैं, "मिस एलिस के अगवा होने के बाद अंग्रेज़ों ने उनको मारने की हर कोशिश की लेकिन सफल नहीं हुए. उन्हें जितना भी तंग किया गया वह हमारे अपने लोगों के ज़रिए किया गया. उनके पड़ोसियों, गांव के लोगों और आफ़रीदियों ने अंग्रेज़ से रिश्वत लेकर उनको तंग किया. इन लोगों को इसके बदले रियायतें और नवाबी मिली, कुछ को ख़ान साहब की उपमा भी मिली. अजब ख़ान आफ़रीदी के साथ अपनों के इस रवैया को लेकर कई क़िताबें लिखी गई हैं."

पिता की सवारी और बन्दू

नेक मोहम्मद बताते हैं, "हमारा संबंध हथियार बनाने के सबसे पुराने केंद्र दर्रा आदम ख़ेल से था तो ज़ाहिर है कि हमारे पिता भी यहीं पर तैयार होने वाली बन्दूक़, जिसे थ्री नॉट थ्री का (क्षेत्रीय भाषा में सरपोख़ टोपक) इस्तेमाल करते थे. यह एक अंतहीन सिलसिला था जिसके बाद उनके पास काफी हथियार जमा हुए."

"अब पाकिस्तानी सेना ने दर्रा आदम ख़ेल के चौक पर मेरे पिता की पीतल की मूर्ति लगाई है. हालांकि उस चौक को उनके नाम पर नहीं, बल्कि उसे 'शहीदों का चौक' नाम से पुकारते हैं. मेरे पिता शहीद नहीं हुए थे, वह तो जंग से जिंदा लौटने वालों मे से थे. फिर भी चौक का नाम उनके नाम से नहीं है. इसमें उनके कंधे पर उनकी वही पुरानी बंदूक़ लटकी हुई है. लेकिन हम ख़ुश हैं, जो भी थे वो पंजाब के फ़ौजी थे. लेकिन इस बात का दुख रहेगा कि पख़्तूनों ने मेरे पिता की कोई क़द्र नहीं की."

जहां अंग्रेज़ गाड़ियों और घोड़ों पर चलते थे, वहीं अजब ख़ान और उनके साथी दर्रा आदम ख़ेल की पहाड़ियों में पैदल चलते औऱ हमला करने के बाद ग़ायब हो जाते थे.

दर्रा आदम ख़ेल के गांव बोस्ती ख़ेल और कोहाट में अंग्रेज़ों की छावनी के बीच सिर्फ एक पहाड़ था. वो इस इलाक़े में पैदल घूमा करते थे. हालांकि कभी-कभी गधा या ख़च्चर का इस्तेमाल कर लेते थे.

अजब ख़ान आफ़रीदी अफ़ग़ानिस्तान के राज्य पिक्तिया आते-जाते थे. वहां रहने वाले ज़दरान और मैंगल क़बीलों से भी उनका परिचय था. इस कारण उनका हथियारों का व्यापार भी शुरू हुआ.

यही वह समय था जब अफ़ग़ानिस्तान में ग़ाज़ी अमानुल्लाह ख़ान ने अपनी जद्दोजहद शुरू करने का फ़ैसला किया उन्हें उस इलाक़े से परिचित व्यक्ति की ज़रूरत पड़ी. उनके लोगों ने उन्हें बताया कि अजब ख़ान उनके लिए बिल्कुल सही होंगे. अमानुल्लाह ख़ान ने अजब ख़ान को बुलाया. उस समय नादिर ख़ान पिक्तिया में मिलिट्री कमांडर थे जो बाद में अफ़ग़ानिस्तान के शासक बने.

मिसेज़ एलिस की सीटियां और औरत पर हाथ उठाने का जुर्म

क्या क़बायली परंपराओं में औरतों को छूना जुर्म नहीं है? इस सवाल के जवाब में नेक मोहम्मद ने कहा, "मेरे पिता ने जब मेजर एलिस के घर पर हमला किया तो उनका निशाना मेजर एलिस थे लेकिन वह वहां मौजूद नहीं थे. उनके कमरे में उनकी पत्नी थीं. रात के अंधेरे में जब वो घर के अंदर गए तो मिसेज़ एलिस की आंख खुल गई. उन्होंने तुरंत सीटियां बजाईं तो मेरे पिता ने अपने भाई से कहा कि उन्हें हर हाल में चुप कराना है. मेरे चचा ने ख़ंजर निकाला और सीटियां बजाने वाले अंग्रेज़ के सीने में उतार दिया. इस दौरान जब उनके हाथों में मिसेज़ एलिस के लंबे बाल आए और उन्होंने अजब ख़ान को कहा कि यह कोई औरत लगती है."

उनके अनुसार, "हमारे पास सबूत हैं कि मिसेज़ एलिस की हत्या की घटना अंधेरे के कारण हुई."

क़ैद में रहने के दौरान मिस मौली एलिस की 'अजब ख़ान से मोहब्बत'

मेजर एलिस की बेटी मौली एलिस 1983 में एक बार फिर पाकिस्तान आईं जहां पर वो कोहाट में अपनी मां की क़ब्र पर गईं. इस दौरान इंग्लैंड और दूसरे देशों के मीडिया ने कुछ ऐसी ख़बरें छापीं जिनसे पता चला कि मौली एलिस अपहरण के बाद अजब ख़ान के 'मोहब्बत में गिरफ़्तार' हो गई थीं.

इन ख़बरों में कहा गया कि अपहरणकर्ताओं के लिए मौली एलिस के दिल में कोमल भावनाएं पैदा हो गई थीं. अजब ख़ान के बेटे नेक मोहम्मद ने इस बारे में कहते हैं कि उनके पिता मौली एलिस को बहन की तरह देखते थे.

वो कहते हैं, "मेरे पिता में कुछ ऐसी अच्छाइयां थीं जो शायद दूसरे स्वतंत्रता सेनानियों में नहीं रही होंगी. वो अगवा किए व्यक्ति का पूरा सम्मान करते. ख़ुद ही देख लें कि 35 साल के अजब ख़ान, 16-17 साल की मिस एलिस को लेकर कई दिनों तक पहाड़ों में घूमते रहे लेकिन एक बाद आंख उठाकर उनकी तरफ नहीं देखा. मिस एलिस ने ख़ुद यह बात मानी है कि अजब ख़ान ने उन्हें बहनों की तरह रखा था."

बंगला नंबर 36 या आईएसएसबी हाउस

अजब ख़ान और उनके दोस्तों ने मिस मौली एलिस को जिस बंगले से अग़वा किया वह आज भी मौजूद है. इसका नंबर है 36 और अब ये कोहाट छावनी में फ़ौज में कमीशन हासिल करने वाले अफ़सरों का चयन केंद्र यानी आईएसएसबी हाउस है.

नेक मोहम्मद के अनुसार अजब ख़ान जब मिस एलिस को ले जाने लगे तो उनके घर में मौजूद क़ालीन का एक टुकड़ा भी साथ ले गए, ताकि पहाड़ों में कहीं रुकें तो यह उनको बैठाने के काम आ सके.

उनके अनुसार घरवालों को इस घटना के बारे में बताते हुए अजब ख़ान ने बताया था कि अंग्रेज़ों के चंगुल से निकलने के बाद मिस एलिस के साथ उन्होंने सारा दिन पहाड़ की चोटी पर गुज़ारा. अंग्रेज़ उन्हें ढूंढते रहे लेकिन चोटी की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया.

नेक मोहम्मद ने बताया, "अजब ख़ान के अनुसार, शाम हुई तो हमने फिर सफ़र शुरू किया. मिस एलिस को कभी एक आदमी उठाता, तो कभी दूसरा. दूसरे दिन हम अपने गांव पहुंचे जहां पर एक औरत ने हमें बताया कि गांव के आसपास तो अंग्रेज़ हैं. हर तरफ निगरानी हो रही है."

"मिस एलिस को लेकर हम तीराह पहुंचे और उन्हें एक जानेमाने आध्यात्मिक व्यक्ति महमूद अख़ुन्दज़ादा के पास ले गए. इसके बाद लड़की को वापस अंग्रेज़ों को देने के लिए जिरगों का सिलसिला शुरू हुआ और स्थानीय लोगों और अंग्रेज़ों के एजेंट बड़ी संख्या में वहां आए. लेकिन अजब ख़ान ने मिस एलिस को महमूद अख़ुनज़ादा के हवाले किया."

तीराह में मिस एलिस की सुपुर्दगी के लिए एक तरफ़ जिरगा था और दूसरी ओर तीन हज़ार अंग्रेज़ फ़ौजियों ने बोस्ती ख़ेल में अजब ख़ान के घर का घेराव किया हुआ था. उन्होंने घर में आग लगा दी. जिरगा में अजब ख़ान के प्रतिनिधियों ने कहा कि जब जिरगा चल रहा है तो उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई कहां का इंसाफ़ है.

तीराह में जिरगे के दौरान महमूद अख़ुन्दज़ादा ने अजब ख़ान आफ़रीदी से कहा कि "अब अंग्रेज़ से आपका बदला पूरा हो गया है और आपने अपनी मां की क़सम भी पूरी कर दी है, बस इस मामले को ख़त्म किया जाए."

इसके बाद में मिस मौली एलिस की वापसी का फ़ैसला हुआ.

अजब ख़ान आफ़रीदी की जासूसी और परिवार का पलायन

लेकिन मिस एलिस को वापस लौटाए जाने के बाद अंग्रेज़ ने अजब ख़ान आफ़रीदी की जासूसी शुरू कर दी. इस कारण उनका पूरा परिवार यहां से निकलकर अफ़ग़ानिस्तान के शहर जलालाबाद चला गया और वहां पर मोरिया पहाड़ पर रहने लगा.

नेक मोहम्मद बताते हैं कि पहाड़ी की दोनों ओर अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में शनवारी क़बीला रहता था. उन्हें जब पता चला कि अजब ख़ान और उनके परिवार को ख़तरा है तो उन्होंने घोषणा की कि जिसने भी अजब ख़ान की जासूसी की उसे जुर्माना देना होगा और उसका घर जलाए जाने की सज़ा मिलेगी.

अंग्रेज ने बहुत कोशिश की कि अजब ख़ान को किसी भी तरह गिरफ़्तार करें लेकिन अफ़ग़ानिस्तान के शासक ग़ाज़ी अमानुल्लाह ख़ान ने इंकार कर दिया. इस पर अंग्रेज़ों ने कहा कि उसे पकड़ कर जेल में डाल दो या उसकी आंखें निकाल लो ताकि उनका बदला पूरा हो सके. लेकिन शनवारियों ने ऐसी कोई बात नहीं मानी.

मिस एलिस की घटना के बाद अफ़ग़ानिस्तान में छिपने के बाद भी अजब ख़ान आफ़रीदी अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ अभियान चलाते रहे. अंग्रेज़ों ने ग़ाज़ी अमानुल्लाह ख़ान से इसकी शिकायत की.

अजब ख़ान के बेटे के अनुसार "इसके बाद अमानुल्लाह ख़ान ने मेरे पिता को बुलाया और उन्हें तुर्किस्तान जाने को कहा. उनसे कहा गया कि वहां उन्हें सुविधाएं मिलेंगी और गवर्नर का पद मिलेगा. लेकिन अजब ख़ान नहीं माने. उन्होंने कहा कि वो अफ़ग़ानिस्तान में उन्हीं की बादशाही में रहेंगे. ग़ाज़ी अमानुल्लाह ख़ान ने कहा कि आप नहीं जाएंगे तो हमें ताक़त का इस्तेमाल करना होगा. इस पर "मेरे वालिद मुस्कुराए और कहा कि आपकी ताक़त के सामने नहीं ठहर सकता."

अमानुल्लाह ख़ान ने उनके परिवार को मज़ार-ए-शरीफ़ में ज़मीन दी और उस इलाक़े का नाम ग़ाज़ियानो क़िला यानी ग़ाज़ियों का क़िला रख दिया. यह इलाक़ा मज़ार-ए-शरीफ़ में मशहूर आध्यात्मिक गुरु सख़ी साहब की मज़ार से डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर था.

नेक मोहम्मद कहते हैं, "अब हमारा सब कुछ, हमारा परिवार वहां है. केवल मैं यहां पाकिस्तान में हूं. ग़ाज़ी अमानुल्लाह ख़ान ने हमें न केवल ज़मीन-जायदाद दी बल्कि महीने का ख़र्च भी दिया."

नेक मोहम्मद कहते हैं "पाकिस्तान बनने तक "मेरे पिता को यहां नहीं आने दिया गया. पूरा परिवार वहीं रह गया और आख़िर में 1961 में मेरे पिता वहीं मज़ार-ए-शरीफ़ में दफ़न किए गए."

अजब ख़ान के परिवार का सबसे बड़ा दुख

नेक मोहम्मद कहते हैं, "मैं यहां अपने हीरो पिता की वजह से आया हूं. मेरे पिता ने संघर्ष न किया होता तो पाकिस्तान आज़ाद ना होता. लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि आज यहां आता हूं तो पाकिस्तानी मुझे मुहाजिर कह कर बुलाते हैं. वहीं अफ़ग़ानिस्तान में मुझे पाकिस्तानी कहकर पुकारा जाता है. हम न यहां के रहे, न वहां के."

"मैंने अफ़ग़ानिस्तान में क़ानून की पढ़ाई की, मैं वहां उप-मंत्री रहा. वहां पर मज़ार-ए-शरीफ़ से संसद के लिए उम्मीदवार भी बना लेकिन बाद में चुनाव किसी और ने लड़ा, सबने मिलकर उसके लिए रास्ता छोड़ दिया."

"यहां पर बेनज़ीर के बेटे, बाचा (बादशाह) ख़ान के बेटे, नवाज़ शरीफ़ के बेटे आज भी सीना तान कर चलते हैं लेकिन मेरी जगह कहीं नहीं है. किसी ने हमारे लिए आवाज़ नहीं उठाई. मेरे पिता की जासूसी कर के अंग्रेज़ की मदद करने वालों को आज इज़्ज़त मिली है लेकिन हमारी कोई हैसियत नहीं. हमसे किसी ने नहीं पूछा कि आपको क्या चाहिए."

"मेरे पिता अजब ख़ान आफ़रीदी के बारे में पांचवीं क्लास के सिलेबस से पाठ को निकाल दिया गया है. हमारे वालिद के इतिहास को जानने के लिए पाकिस्तान में एक केंद्र बनाया जाना चाहिए जहां पर स्वतंत्रता संग्राम के सभी हीरो के इतिहास के बारे में नई पीढ़ी को पढ़ाया जा सके."

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