जलवायु परिवर्तन की चपेट में मिडिल ईस्ट, नहीं संभले तो कयामत आ जाएगी

जलवायु परिवर्तन विश्व के लिए सबसे बड़ी समस्या का विषय है। भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, इटली सब ग्लोबल वार्मिंग की चपेट में हैं। वहीं मिडिल ईस्ट देशों की बात करें तो वह जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित है।

काहिरा, 26 जुलाई : जलवायु परिवर्तन विश्व के लिए सबसे बड़ी समस्या का विषय है। भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, इटली सब ग्लोबल वार्मिंग की चपेट में हैं। वहीं मिडिल ईस्ट देशों की बात करें तो वह जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित है। मध्य पूर्व देशों में तापमान पिछले तीन दशकों में दुनिया की औसत से कहीं अधिक तेजी से बढ़ा है। इस क्षेत्र में वर्षा कम हो रही है, जिसके कारण आने वाले समय में सूखा पड़ने की संभावना प्रबल होती दिख रही है। मिडिल ईस्ट देशों की स्थिति मौसम की चपेट में हमेशा से रहा है।

मध्य पूर्व देश में जलवायु परिवर्तन एक समस्या

मध्य पूर्व देश में जलवायु परिवर्तन एक समस्या

प्रकृति के प्रकोप से खुद को बचाने के लिए इस साल का वार्षिक संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन, जिसे COP27 के नाम से जाना जाता है, मिस्र में नवंबर में आयोजित किया जा रहा है। मध्य पूर्व की सरकारें जलवायु परिवर्तन के खतरों के प्रति जाग चुकी हैं, विशेष रूप से इससे उनकी अर्थव्यवस्थाओं को पहले से ही नुकसान हो रहा है।

रेतीले तूफानों का कहर

रेतीले तूफानों का कहर

मध्य पूर्व देश इराक की अगर बात करें तो यहां तेज गति से चलने वाले रेतीले तूफान ने इस साल शहर के लोगों को परेशान करके रख दिया है। सब काम ठप हो गए और लोग बीमारी के कारण हजारों की संख्या में अस्पतालों में भर्ती कराए गए। वहीं जलवायु परिवर्तन का असर देखिए, मिस्र के नील डेल्टा में बढ़ती मिट्टी की लवणता महत्वपूर्ण कृषि भूमि को खत्म करती जा रही है। अफगानिस्तान में, सूखे ने रोजगार की तलाश में युवाओं को उनके गांवों से पलायन करने पर मजबूर कर दिया है। सूखे के कारण वहां की मिट्टी में कुछ भी नहीं उपज रहा है। हाल के हफ्तों में, क्षेत्र के कुछ हिस्सों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस (122 फ़ारेनहाइट) से ऊपर हो गया है।

अर्थव्यवस्था को पहुंचा काफी नुकसान

अर्थव्यवस्था को पहुंचा काफी नुकसान

बता दें कि, इस साल का वार्षिक संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन, जिसे COP27 के नाम से जाना जाता है, मिस्र में नवंबर में आयोजित किया जा रहा है। मध्य पूर्व की सरकारें ग्लोबल वार्मिंग के खतरों को भांप चुकी है। क्योंकि, जलवायु परिवर्तन के कारण विशेष रूप से इससे उनकी अर्थव्यवस्थाओं को पहले से ही काफी नुकसान हो रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय वित्त पोषण पर जोर

अंतर्राष्ट्रीय वित्त पोषण पर जोर

एक पर्यावरण जलवायु परिवर्तन सलाहकार, जिन्होंने विश्व बैंक के साथ काम किया है और मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के जलवायु परिवर्तन के जानकार हैं ने बताया,"हम सचमुच अपने समक्ष जलवायु परिवर्तन का प्रभाव देख रहे हैं। बता दें कि, मिस्र, मोरक्को और इस क्षेत्र के अन्य देश स्वच्छ ऊर्जा के लिए पहल कर रहे हैं, लेकिन COP-27 में उनके लिए सर्वोच्च प्राथमिकता जलवायु परिवर्तन से पहले से सामना कर रहे खतरों से निपटने में उनकी मदद करने के लिए और अधिक अंतर्राष्ट्रीय वित्त पोषण पर जोर देना है।

नहीं संभले तो परेशानी बढ़ेगी

नहीं संभले तो परेशानी बढ़ेगी

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने इस साल की शुरुआत में एक रिपोर्ट में उल्लेख किया है कि मध्य पूर्व की सरकारों के पास व्यवस्था करने की सीमित क्षमता है। अर्थव्यवस्थाएं और बुनियादी ढांचा कमजोर हैं, और नियम अक्सर लागू नहीं होते हैं। गरीबी व्यापक है, जिससे जलवायु संरक्षण पर रोजगार सृजन को प्राथमिकता दी जा रही है। मिस्र की निरंकुश सरकारें नागरिक समाज को गंभीर रूप से प्रतिबंधित करती हैं। साथ ही, विकासशील देश मध्य पूर्व और अन्य जगहों पर उत्सर्जन में कटौती करने के लिए दबाव डाल रहे हैं, भले ही वे खुद वादों से पीछे हट गए हों।

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