Tarkash Afghanistan-Pakistan War Explainer: क्या ईरान भी कूदा जंग में? PAK का खात्मा शुरू?- बड़ा खुलासा
Oneindia Hindi Tarkash Afghanistan-Pakistan War Explainer: अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच हालिया एयर स्ट्राइक और सीमा झड़पों ने पूरे दक्षिण एशिया को हिला दिया है। जो देश 2021 में तालिबान की वापसी पर साथ खड़े दिख रहे थे, आज आमने-सामने नजर आ रहे हैं। इसी बीच ईरान और अमेरिका के बढ़ते तनाव ने इस पूरे संकट को और जटिल बना दिया है।
वनइंडिया की इस Exclusive बातचीत में वैभव मिश्रा ने रक्षा विशेषज्ञ कर्नल संजीत सिरोही (रिटायर्ड), मेजर जनरल राजन कोचर (रिटायर्ड) और विदेश मामलों के जानकार अरविंद सिंह तेजावत से विस्तार से बात की। आइए इसे आसान सवाल-जवाब के अंदाज में समझते हैं...

सवाल-1: 2021 में जो तालिबान पाकिस्तान का जिगरी यार था, वह आज जानी दुश्मन क्यों बन गया?
कर्नल संजीत सिरोही के मुताबिक, तालिबान को खड़ा करने में पाकिस्तान की बड़ी भूमिका रही है। सोवियत-अफगान युद्ध के समय से लेकर अमेरिका के खिलाफ लड़ाई तक, पाकिस्तान ने तालिबान को रणनीतिक संपत्ति की तरह इस्तेमाल किया। 2021 में जब अमेरिका की वापसी के बाद तालिबान सत्ता में लौटा, तो पाकिस्तान में जश्न का माहौल था।
पाकिस्तान को उम्मीद थी कि उसे 'रणनीतिक गहराई' मिलेगी, यानी भारत के खिलाफ एक मजबूत सहयोगी। लेकिन तालिबान ने सत्ता में आने के बाद खुद को पूरी तरह इस्लामाबाद के इशारों पर चलने वाला नहीं दिखाया। उसने अपनी स्वतंत्र नीति अपनाई और भारत जैसे देशों से संपर्क भी बनाए रखा। यही बात पाकिस्तान की सैन्य एस्टैब्लिशमेंट को खल गई।
अरविंद सिंह तेजावत का कहना है कि पाकिस्तान को अंदाजा ही नहीं था कि जिसे उसने पाला-पोसा, वही आगे चलकर आंख में आंख डालकर खड़ा हो जाएगा। यह इस्लामाबाद के लिए एक रणनीतिक झटका था।
सवाल-2: TTP क्या है और पाकिस्तान को तालिबान से क्या शिकायत है?
TTP यानी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान, पाकिस्तान के भीतर सक्रिय उग्रवादी संगठन है। यह खासकर खैबर पख्तूनख्वा और आदिवासी इलाकों में प्रभाव रखता है। पाकिस्तान का आरोप है कि TTP को अफगानिस्तान की जमीन से समर्थन मिलता है।
मेजर जनरल राजन कोचर का कहना है कि TTP और अफगान तालिबान को पूरी तरह अलग नहीं देखा जा सकता। अमेरिकी हथियारों का इस्तेमाल, सीमा पार जाकर हमले और फिर सुरक्षित ठिकानों पर लौट आना, यह सब पाकिस्तान की चिंता का कारण है।
हालांकि अफगान तालिबान बार-बार कहता है कि पाकिस्तान की आंतरिक समस्या के लिए उसे दोषी ठहराना गलत है। कर्नल सिरोही का तर्क है कि जब तक पाकिस्तान TTP से बातचीत कर उसकी स्थानीय मांगों को नहीं समझेगा, तब तक सिर्फ सैन्य कार्रवाई से समस्या हल नहीं होगी।
सवाल-3: क्या पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच खुला युद्ध हो सकता है?
मेजर जनरल कोचर साफ कहते हैं कि पारंपरिक युद्ध की संभावना कम है। पाकिस्तान की सेना और वायुसेना अफगानिस्तान से कहीं ज्यादा मजबूत है। अफगानिस्तान के पास प्रभावी एयर डिफेंस सिस्टम नहीं है, इसलिए पाकिस्तान एयर स्ट्राइक कर सकता है।
लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। अफगानिस्तान का भूगोल बेहद कठिन है। पहाड़, दर्रे और लंबी सीमा पाकिस्तान के लिए चुनौती हैं। अगर पाकिस्तान गहराई में घुसता है तो उसे Guerrilla Warfare (गुरिल्ला युद्ध) का सामना करना पड़ सकता है।
कोचर का कहना है कि असली खतरा असममित युद्ध है। यानी पाकिस्तान के शहरों में आत्मघाती हमले, सैन्य ठिकानों पर हमले और लंबे समय तक अस्थिरता। इस तरह की लड़ाई में पाकिस्तान को ज्यादा नुकसान हो सकता है।
सवाल-4: क्या हालिया हमले प्रोपेगेंडा वॉर का हिस्सा भी हैं?
दोनों तरफ से भारी दावों की बौछार हो रही है। पाकिस्तान सैकड़ों तालिबान लड़ाकों को मारने का दावा कर रहा है, जबकि अफगान पक्ष कई चौकियों पर कब्जे की बात कर रहा है।
तेजावत इसे प्रोपेगेंडा वॉर बताते हैं। उनका कहना है कि ऐसे आंकड़े अक्सर मनोबल गिराने या घरेलू राजनीति को साधने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जाते हैं। असली तस्वीर जमीन पर कहीं ज्यादा जटिल होती है।
सवाल-5: क्या पाकिस्तान जानबूझकर तनाव बनाए रखना चाहता है?
कर्नल सिरोही का मानना है कि पाकिस्तान कई मोर्चों पर दबाव में है। गाजा में संभावित अंतरराष्ट्रीय भूमिका, अमेरिका से रिश्ते और आंतरिक आर्थिक संकट उसे उलझन में डाल रहे हैं। ऐसे में अफगान सीमा पर सक्रियता दिखाना एक रणनीतिक संदेश भी हो सकता है।
उनका यह भी तर्क है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच टकराव बढ़ता है, तो पाकिस्तान पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में सीमा पर व्यस्त दिखना एक तरह की कूटनीतिक ढाल भी हो सकता है।
सवाल-6: ईरान का इस पूरे संकट से क्या संबंध है?
ईरान की सीमा अफगानिस्तान और पाकिस्तान दोनों से लगती है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने पूरे क्षेत्र को संवेदनशील बना दिया है। चीन द्वारा ईरान में अपने नागरिकों के लिए एडवाइजरी और अमेरिका द्वारा इजराइल में चेतावनी, हालात की गंभीरता दिखाते हैं।
मेजर जनरल कोचर के अनुसार, फिलहाल अमेरिका मनोवैज्ञानिक और साइबर दबाव का इस्तेमाल कर रहा है। सीधा सैन्य हमला आखिरी विकल्प हो सकता है। वहीं तेजावत मानते हैं कि ईरान बातचीत को लंबा खींचकर समय हासिल करने की रणनीति अपनाता है।
सवाल-7 : अगर अमेरिका-ईरान युद्ध हुआ और उसी समय पाकिस्तान-अफगानिस्तान भिड़े, तो क्या पूरा क्षेत्र जल उठेगा?
विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसा हुआ तो पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया दोनों अस्थिर हो सकते हैं। इराक और सीरिया में सक्रिय शिया मिलिशिया समूह, अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना सकते हैं। पाकिस्तान और अफगानिस्तान की अस्थिरता से चीन के निवेश, खासकर CPEC, पर भी असर पड़ सकता है।
तेजावत चेतावनी देते हैं कि लगातार अविश्वास और सैन्य खर्च बढ़ने से विकास परियोजनाएं प्रभावित होंगी। इसका असर पूरे उपमहाद्वीप पर पड़ेगा।
सवाल-8 : क्या तालिबान की अंतरराष्ट्रीय मान्यता पर असर पड़ेगा?
तालिबान खुद को मुख्यधारा में शामिल करवाने की कोशिश कर रहा है। रूस और चीन के साथ उसके संपर्क बढ़े हैं, और भारत ने भी सीमित स्तर पर संवाद बनाए रखा है। लेकिन महिलाओं की शिक्षा, मानवाधिकार और कट्टर नीतियां उसकी राह में बड़ी बाधा हैं।
तेजावत का कहना है कि व्यवहार में बदलाव के बिना पूर्ण अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलना मुश्किल है। सिर्फ सैन्य ताकत से सरकारें स्थायी वैधता हासिल नहीं कर पातीं।
सवाल-9 : अगर हमला हुआ तो पहले कौन करेगा, अमेरिका या इजराइल?
तेजावत का मानना है कि अगर हमला होता है तो पहल अमेरिका कर सकता है। इजराइल की सीधी शुरुआत पूरे संघर्ष को अरब-इजराइल युद्ध का रूप दे सकती है। कोचर का आकलन है कि अमेरिका पहले गैर-सैन्य दबाव बढ़ाएगा और आखिरी विकल्प के रूप में बड़ा हमला करेगा।
फिलहाल हालात बेहद नाजुक हैं। अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर तनाव, TTP की गतिविधियां और ईरान-अमेरिका टकराव, तीनों मिलकर एक जटिल समीकरण बना रहे हैं। बड़ा युद्ध तय नहीं है, लेकिन छोटी-छोटी चिंगारियां कभी भी बड़े विस्फोट में बदल सकती हैं।
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