अफगानिस्तान में लौटा अंधेरे का राज, भारतीय मदद हड़प लेता है तालिबान, अहमद मसूद के बड़े आरोप
अफगानिस्तान का पंजशीर वो राज्य है, जहां पर तालिबान लाख कोशिशों के बाद भी कब्जा नहीं कर पाया है और पंजशीर से अभी भी तालिबान के खिलाफ संघर्ष चल रहा है।
काबुल, सितंबर 05: अफगानिस्तान में सत्ता पर काबिज हुए तालिबान को एक साल से ज्यादा का वक्त हो चुका है, लेकिन तालिबान की सरकार देश को आर्थिक संकट से बाहर निकालने की कोई कोशिश भी नहीं की है। तालिबान सिर्फ विदेशी मदद पाने के इंतजार में रहता है और तालिबान के प्रमुख विरोधी 'नेशनल रेसिस्टेंस फ्रंट ऑफ अफगानिस्तान' के नेता अहमद मसूद के मुताबिक, भारत से जो भी मदद अफगानिस्तान भेजा जाता है, उसका एक ढेला भी तालिबान शासन जरूरतमंद लोगों तक नहीं पहुंचने देता है, बल्कि सारी मदद तालिबान हड़प लेता है और उसका इस्तेमाल तालिबान के घरवाले करते हैं। इतना ही नहीं, कश्मीर में हो रही हिंसा और तालिबान के बीच भी अहमद मसूद ने एक लिंक स्थापित किया है।

पंजशीर में है मसूद की पकड़
अफगानिस्तान का पंजशीर वो राज्य है, जहां पर तालिबान लाख कोशिशों के बाद भी कब्जा नहीं कर पाया और एक अज्ञात जगह पर इंडियन एक्सप्रेस को दिए गये एक स्पेशल इंटरव्यू में पंजशीर के शेर के नाम से मशहूर रहे अहमद शाह मसूद के 33 वर्षीय बेटे अहमद मसूद ने कहा कि, "मुझे सत्ता नहीं चाहिए और मेरे लिए अभी इंसाफ के लिए संघर्ष ही मेरी लड़ाई है और मेरा संघर्ष इंसाफ और आजादी के लिए है।" भारत संयुक्त राष्ट्र के विश्व खाद्य कार्यक्रम के माध्यम से अफगानिस्तान को 50,000 टन गेहूं भेज रहा है। लेकिन, अहमद मसूद ने कहा कि "तालिबान ने भारत से मिल रहे मानवीय समर्थन का इस्तेमाल अपनी सेना और अपने परिवारों के लिए किया है, न कि वास्तव में जरूरतमंद लोगों के लिए"। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि, "वे उचित रूप से मानवीय सहायता का वितरण नहीं करते हैं और वे इसे जातीयता के आधार पर दूसरों की तुलना में एक क्षेत्र को अधिक देते हैं।" यह पहली बार है जब किसी अफगान नेता ने तालिबान के खिलाफ यह आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि, अफगानिस्तान एक बार फिर से अंधेरे युग में वापस चला गया है और तालिबान अलकयादा के साथ साथ दूसरे आतंकवादी संगठनों को पनाह दे रहा है और अफगानिस्तान में ये आतंकवादी स्वतंत्र तौर पर घूम रहे हैं।

जवाहिरी पर क्या बोले मसूद
वहीं, अलकायदा के प्रमुख अयमान अल जवाहिरी के राजधानी काबुल के एक पॉश इलाके में मारे जाने की घटना को लेकर अहमद मसूद ने कहा कि, ये कोई 'आश्चर्यजनक' बात नहीं थी। उन्होंने कहा कि, "तालिबान की इच्छा के आगे झुकना, आतंकवाद की इच्छा के आगे झुकना है।" इसके साथ ही उन्होंने कहा कि, पाकिस्तान हमेशा से तालिबान के लिए संरक्षक की भूमिका निभाता आया है। उन्होंने कहा कि,"यह एक ऐसी आग है जिसके साथ पाकिस्तान ने खेला और हम देखेंगे कि देर-सबेर यह उन पर पलटवार करेगा।" अहमद मसूद ने कहा कि, "तालिबान का शासन आतंकवादियों के लिए एक सुरक्षित पनाहगाह होगा और खासकर जब काबुल में कोई वैध सरकार नहीं होगी। यह कई आतंकवादी समूहों, जैश-ए-मोहम्मद और कई अन्य लोगों के लिए एक सुरक्षित पनाहगाह है, जो भारत और इस क्षेत्र के सभी देशों के लिए खतरा हैं। उनके फलने-फूलने के लिए, अफगानिस्तान से उन्हें संचालित करने के लिए, उन संगठन में भर्ती करने के लिए अफगानिस्तान एक सुरक्षित ठिकाना होगा।'

कश्मीर में आतंक और तालिबान
पंजशीर के संरक्षक अहमद मसूद ने इसके साथ ही भारतीय कश्मीर में बढ़ रही आतंकवादी घटनाओं के लिए भी तालिबान को जिम्मेदार ठहराया है और उन्होंने कहा कि, "तालिबान के अधिग्रहण के बाद से कश्मीर में हिंसक घटनाएं कई गुना बढ़ गई हैं। तालिबान के शासन में अफगानिस्तान और कश्मीर में हिंसा में वृद्धि और इन आतंकवादी समूहों की हिंसा में वृद्धि के बीच सीधा संबंध है, क्योंकि अब वो इस बात को मानने लगे हैं, कि अगर हम रक्तपात और आतंकवादी कृत्यों को जारी रखते हैं, तो जिस तरह से तालिबान को समर्थन दिया गया है, उस तरह से कहीं और भी चरमपंथी सरकार स्थापित करने में हम सफल होंगे। अहमद मसूद ने कहा कि, हम सभी के लिए सभी प्रयासों को एक साथ रखना और इस चरमपंथी विचारधारा को हराना बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह फैल रहा है।

'भारत की हिचकिचाहट घातक'
वहीं, अफगानिस्तान की भूमिका के बारे में पूछ जाने पर भी अहमद मसूद ने जवाब दिया है। इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए उन्होंने कहा कि, 1990 के दशक में भारत की तरफ से उनके पिता अहमद शाह मसूद और उनके संगठन तक भारत गुप्त तरीके से अपनी मदद पहुंचाता था, लेकिन अब भारतीय दृष्टिकोण में झिझक है और भारत अभी भी स्थिति का आंकलन करने की प्रक्रिया में है और यह हिचकिचाहट घातक है। यह बहुत गलत है। और इससे पहले कि ये विचारधारा जड़ें जमाए या आतंकवादी को एक आधार मिले, हमें तत्काल कार्रवाई की जरूरत है।" उन्होंने भारत को लेकर कहा कि, "यह समझना बहुत जरूरी है, कि हम एक ही पृष्ठ पर हैं, और हम अपने पिता के उसी रास्ते पर चल रहे हैं। इसलिए जितनी जल्दी झिझक खत्म हो जाए, उतनी जल्दी हम इस नतीजे पर पहुंच सकते हैं, कि इस क्षेत्र में आतंकवाद के खिलाफ एक साथ मिलकर प्रयास किया जाए, तो बेहतर है। क्योंकि हम इसे पसंद करते हैं या नहीं, हम आतंकवाद के खिलाफ अफगानिस्तान के लोगों की रक्षा के लिए आखिरी पंक्ति हैं।

'हमने मांगी थी भारत से मदद'
अहमद मसूद ने अपने इंटरव्यू में कहा कि, वो "भारत सरकार के सभी स्तरों" तक पहुंचे हैं और "राजनीतिक समर्थन" और "सैन्य रसद" मांगा है। मसूद ने यह भी कहा कि, उन्हें तालिबान सरकार में एक पद की पेशकश की गई थी, जब वह इस साल ईरान में शासन के विदेश मंत्री अमीर खान मोत्ताकी से मिले थे, लेकिन उन्होंने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था। अपने लड़ाकों द्वारा किए जा रहे प्रतिरोध पर उन्होंने कहा कि उनमें से लगभग 3,500 हैं जो पंजशीर घाटी से फैल रहे हैं और हेरात, फरयाब, मजहर, कुंदुज, बगलान, तखर और बदख्शां तक फैल रहे हैं। मसूद ने कहा कि, उन्होंने "कमांड एंड कंट्रोल सेंटर" बनाया है और "हमें बाहर से कोई समर्थन नहीं है। यह हमारे अपने लोगों की उदारता और उनकी प्रतिबद्धता और विरोध और लड़ाई जारी रखने की इच्छा पर आधारित है। लेकिन इस समय हमारी रणनीति ठीक वही है जो मेरे पिता (अहमद शाह मसूद) ने उस समय सोवियत संघ के खिलाफ इस्तेमाल की थी, जो गुरिल्ला युद्ध था।" आपको बता दें कि, अहमद मसूद के पिता अहमद शाह मसूद की अमेरिका में 9/11 के हमलों से कुछ दिन पहले तालिबान ने हत्या कर दी थी।












Click it and Unblock the Notifications