दोहा वार्ता से पहले तालिबान ने दिया बड़ा झटका, इस्लामिक स्टेट पर अमेरिकी ऑफर को ठुकराया
अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद ये पहला मौका है, जब अमेरिकी अधिकारियों के साथ तालिबान की आमने-सामने की बैठक होने वाली है। अमेरिका ने तालिबान को मान्यता देने से इनकार कर दिया है।
काबुल, अक्टूबर 09: काबुल पर कब्जे के बाद पहली बार अमेरिकी अधिकारियों के साथ तालिबान के नेताओं की बातचीत होने वाली है, लेकिन उस बातचीत से पहले ही तालिबान ने अमेरिका को बहुत बड़ा झटका दे दिया है। तालिबान ने इस्लामिक स्टेट को रोकने के लिए अमेरिका के साथ मिलकर काम करने से साफ तौर पर इनकार कर दिया है। अमेरिका के लिए ये काफी बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि इस्लामिक स्टेट के विस्तार से अगर किसी को सबसे ज्यादा खतरा है, तो वो अमेरिका ही है।

तालिबान ने दिया अमेरिका को झटका
तालिबान ने शनिवार को अफगानिस्तान में चरमपंथी समूहों को रोकने के लिए अमेरिका के साथ सहयोग और मिलकर काम करने के ऑफर को खारिज कर दिया है। अगस्त में अमेरिका के अफगानिस्तान से हटने के बाद पहली बार तालिबान और अमेरिकी अधिकारियों के बीच होने जा रही है। ये मुलाकात कतर की राजधानी दोहा में होने जा रही है, जिससे पहले तालिबान ने इस्लामिक स्टेट को लेकर अपनी मंशा जाहिर कर दी है। तालिबान के वरिष्ठ अधिकारी और अमेरिकी प्रतिनिधि फारस की खाड़ी के राज्य कतर की राजधानी दोहा में शनिवार और रविवार को मिलने वाले हैं। दोनों पक्षों के अधिकारियों ने कहा है, कि मुद्दों में चरमपंथी समूहों पर लगाम लगाना और विदेशी नागरिकों और अफगानों को देश से निकालना शामिल है। हालांकि, तालिबान ने अफगानिस्तान से विदेशियों को बाहर निकालने पर लचीलेपन का संकेत दिया है।

''वॉशिंगटन से नहीं चाहिए सहयोग''
तालिबान के राजनीतिक प्रवक्ता सुहैल शाहीन ने एसोसिएटेड प्रेस को बताया कि, अफगानिस्तान में तेजी से सक्रिय हो रहे इस्लामिक स्टेट और संबंधित आतंकी संगठनों को रोकने के लिए तालिबान वाशिंगटन के साथ कोई सहयोग नहीं लेगा। अफगानिस्तान में आईएस ने कई हमलों की जिम्मेदारी ली है, जिसमें एक आत्मघाती बम विस्फोट शामिल है जिसमें 46 अल्पसंख्यक शिया मुसलमानों की मौत हो गई और दर्जनों घायल हो गए। ये हमला कल एक मस्जिद में तब हुआ, जब वहां पर नमाज पढ़ा जा रहा था। यह पूछे जाने पर, कि क्या तालिबान इस्लामिक स्टेट को रोकने के लिए अमेरिका के साथ काम करेगा? शाहीन ने कहा कि, "हम स्वतंत्र रूप से दाएश (आईएस) से निपटने में सक्षम हैं।" 2014 में पूर्वी अफगानिस्तान में उभरने के बाद से आईएस ने देश के शिया मुसलमानों पर लगातार हमले किए हैं। आईएस को संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में भी देखा जाता है।

दोहा में अमेरिका-तालिबान की मुलाकात
दोहा में तालिबान के साथ होने वाली बैठक से पहले अमेरिका ने भी साफ कर दिया है कि बैठक का मतलब तालिबान को मान्यता देना नहीं है। तालिबान और अमेरिकी अधिकारियों के बीच ये वार्ता पाकिस्तान में अमेरिकी उप-विदेश मंत्री वेंडी शेरमेन के 2 दिवसीय दौरे के बाद हो रहा है, जहां उन्होंने पाकिस्तानी विदेश मंत्री के साथ साथ कई पाकिस्तानी उच्च-अधिकारियों से बात की थी। पाकिस्तान में भी वार्ता का मुख्य फोकस अफगानिस्तान ही था। पाकिस्तानी अधिकारियों ने अमेरिका से अफगानिस्तान के नए शासकों के साथ जुड़ने और आर्थिक मंदी से बचने के लिए अरबों डॉलर का अंतरराष्ट्रीय फंड जारी करने का आग्रह किया है।

लगातार हमलावर हो रहा इस्लामिक स्टेट
अफगानिस्तान के शिया मौलवियों ने शुक्रवार को मस्जिद पर हमले के बाद तालिबान शासकों से सुरक्षा की मांग की है। वहीं, इस्लामिक स्टेट ने इस हमले की जिम्मेदारी लेते हुए कहा कि, ये हमला एक उइगर आत्मघाती हमलावर ने किया था। दावे में कहा गया है कि, हमले ने शियाओं और तालिबान दोनों को निशाना बनाया क्योंकि चीन की मांगों को पूरा करने के लिए उइगरों को अफगानिस्तान से बाहर करने की कोशिश में तालिबान लगा हुआ है। अगस्त के अंत में विदेशी सैनिकों के अफगानिस्तान छोड़ने के बाद से यह सबसे घातक हमला था।

''अफगानिस्तान में और होंगे हमले''
अमेरिका स्थित विल्सन सेंटर में एशिया कार्यक्रम के उप निदेशक माइकल कुगेलमैन ने कहा कि शुक्रवार का हमला आने वाले वक्त में होने वाले और खौफनाक हिंसा के कड़ी का पहला हिस्सा हो सकता है। दरअसल, ज्यादातर उइगर आतंकवादी पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट से संबंधित हैं, जिसने दशकों से पाकिस्तान और अफगानिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों में एक सुरक्षित ठिकाना पाया है।

चीन की बढ़ेगी चिंता
हमले के बाद माइकल कुगेलमैन ने ट्वीट करते हुए कहा कि, "अगर (आईएस) दावा सही है, तो (अफगानिस्तान) में आतंकवाद के बारे में चीन की चिंताएं बढ़ जाएंगी, जिसके प्रति तालिबान कठोर होने का दावा करता है।" इसके साथ ही चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट के लिए भी खतरा है। तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्ला मुजाहिद ने पिछले महीने चीनी परियोजना को क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक उपक्रम बताया था, लेकिन अगर उइगर आत्मघाती हमलावर ने ये हमला किया है, तो फिर चीन किसी भी हालत में इस संगठन के 'शांत' होने तक अफगानिस्तान नहीं आएगा।

अमेरिका बना पाएगा तालिबान पर दवाब?
एक अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि, दोहा वार्ता के दौरान, अमेरिकी अधिकारी तालिबान नेताओं को उनके वादों के बारे में और उनके द्वारा जताए गये प्रतिबद्धताओं के बारे में याद दिलाने की कोशिश करेंगे। इसके साथ ही वे तालिबान से मांग करेंगें, कि वे अमेरिकियों और अन्य विदेशी नागरिकों को अफगानिस्तान छोड़ने की अनुमति दे। इसके साथ ही अफगान जो कभी अमेरिकी सेना या सरकार और अन्य अफगान सहयोगियों के लिए काम करते थे, उन्हें देश से बाहर निकलने दिया जाए। अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बात की क्योंकि वे बैठकों के बारे में रिकॉर्ड पर बोलने के लिए अधिकृत नहीं थे।












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