इंडियन मिलिट्री एकेडमी में ट्रेनिंग ले चुका है तालिबानी नेता 'शेरू', भारत के समर्थन में दिया था बड़ा प्रस्ताव
शेर मोहम्मद अब्बास के बारे में बैचमेट्स ने कहा है कि वो निश्चित तौर पर कह सकते हैं कि वो उस समय कट्टरपंथी नहीं था।
काबुल/नई दिल्ली, अगस्त 20: तालिबान के टॉप लीडर्स में शुमार और तालिबान के राजनीतिक कार्यालय के प्रमुख शेर मोहम्मद अब्बास स्टानिकजई ने भारत में रहकर पढ़ाई-लिखाई की थी और फिर बाद में वो तालिबान का एक कट्टरपंथी नेता बन गया। रिपोर्ट के मुताबिक खुलासा हुआ है कि, शेर मोहम्मद अब्बास ने भारत के देहरादून में भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) से पढ़ाई की थी, जहां वो काफी सज्जन सुपात्र माना जाता था।

तालिबानी नेता शेरू पर बड़ा खुलासा
खुलासा हुआ है कि शेर मोहम्मद अब्बास जब इंडियन मिलिट्री एकेडमी में पढ़ाई कर रहा था, उस वक्त उसे उसके बैचमेट्स 'शेरू' कहकर संबेधित करते थे। शेर मोहम्मद अब्बास के बैचमेट्स कहते हैं कि भारत में पढ़ाई करने के दौरान शेर मोहम्मद अब्बास कतई कट्टरपंथी नहीं था, या उसने कभी अहसास नहीं दिलाया कि वो एक कट्टरपंथी लड़का है, जो आगे जाकर तालिबान का बड़ा नेता बनने वाला है। राजनीति विज्ञान का अध्ययन करने के बाद शेर मोहम्मद स्टानिकजई इंडियन मिलिट्री एकेडमी में शामिल हो गया था, जहां उसने भारतीय सैन्य संस्थान द्वारा अफगानों के लिए अपने द्वार खोलने के बाद 1.5 साल तक ट्रेनिंग ली थी।

1982 बैच में पढ़ाई करता था 'शेरू'
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 'शेरू' या शेर मोहम्मद स्टानिकजई जब 20 साल का था, तब वह 1982 बैच में देहरादून में आईएमए में शामिल हुआ था। भारतीय थल सेना के एक सेवानिवृत्त मेजर जनरल ने शेर मोहम्मद अब्बास के बारे में कहा कि ''वह एक ऐसा शख्स था, जो अन्य कैडेटों की तुलना में थोड़ा ज्यादा लंबा था और उसकी मुंछें काफी आकर्षक हुआ करती थीं। रिटायर्ड मेजर जनरल डीएम चतुर्वेदी ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि ''पढ़ाई के दौरान निश्चित तौर पर उसके पास कट्टरपंथी विचार नहीं था''

सहपाठियों ने 'शेरू' पर क्या कहा ?
कर्नल (सेवानिवृत्त) केसर सिंह शेखावत, जो शेर मोहम्मद स्टानिकजई के बैचमेट भी थे, उन्होंने शेर मोहम्मद स्टानिकजई के साथ बिताए गये पलों को याद करते हुए कहा कि हम अकसर वीकेंड में नदी के किनारे घूमा करते थे। कर्नल शेखावत ने याद करते हुए कहा, "शेर मोहम्मद की एक तस्वीर उनके पास है, जिसमें वो स्वीमिंग कर रहा और वो चड्डी में है।'' उन्होंने कहा कि ''ये तस्वीर तब की है, जब हम ऋषिकेश गये हुए थे और हमने काफी देर तक गंगा में स्नान किया था''। रिपोर्ट के मुताबिक, IMA में अपना प्रशिक्षण पूरा करने के बाद, स्टैनिकजई एक लेफ्टिनेंट के रूप में अफगान नेशनल आर्मी में शामिल हो गया था और उसने सोवियत-अफगान युद्ध और अफगानिस्तान की इस्लामी मुक्ति के लिए लड़ाई लड़ी थी।

तालिबान शासन में मुख्य पदों पर रहा
पिछले तालिबान शासन के दौरान स्टैनिकजई ने विदेश मामलों के उप मंत्री के रूप में काम किया था और तालिबान की ओर से राजनयिक वार्ता के लिए बिल क्लिंटन शासन के दौरान अमेरिका की यात्रा भी की थी। 2015 में स्टैनिकजई को कतर में तालिबान के राजनीतिक कार्यालय का प्रमुख नियुक्त किया गया था। कहा जाता है कि काफी ज्यादा पढ़े लिखे होने की वजह से स्टैनिकजई को तालिबान में काफी अहम स्थान दिया गया है। दरअसल, तालिबान के ज्यादातर नेताओं ने मदरसों में पढ़ाई की है, जबकि स्टैनिकजई ने काफी पढ़ाई-लिखाई की है।

आईएसआई ने बना दिया आतंकियों का 'बॉस'
भारत में पढ़ाई-लिखाई करने के बाद स्टैनिकजई वापस अफगानिस्तान चला गया, जहां वो सेना में बड़े ओहदे पर शामिल गो गया था। भारत में पढ़ाई करने से पहले वो पॉलिटिकल साइंस में एमए कर चुका था और फिर बाद में वो पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के साथ जुड़ गया था। जहां उसे आईएसआई के साथ साथ पाकिस्तान की मिलिट्री की तरफ से आतंकियों की तरह ब्रेनवॉश किया गया और उसे स्पेशल ट्रेनिंग दी गई। स्टैनिकजई 1996 में अमेरिका भी गया था, जहां उसने तत्कालीन बिल क्लिंटन सरकार से तालिबान को राजनीतिक दल के तौर पर मान्यता देने की मांग की थी। कई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि स्टैनिकजई का अभी भी पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से गहरा रिश्ता है और अब जब तालिबान की सरकार बनने वाली है, तो उसे अहम जिम्मेदारी मिलने वाली है।

भारत को दिया था बड़ा प्रस्ताव
हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक कतर की राजधानी दोहा में तालिबानी नेताओं के दल ने जब भारतीय अधिकारियों के साथ मुलाकात की थी, उसमें शेर मोहम्मद स्टानिकजई भी शामिल था। उसने भारतीय दल को प्रस्ताव दिया था कि भारत काबुल में अपने दूतावासों को बंद नहीं करे। रिपोर्ट के मुताबिक, शेर मोहम्मद स्टानिकजई के इस प्रस्ताव से भारतीय अधिकारी हैरान रह गये थे, हालांकि, भारत ने शेर मोहम्मद स्टानिकजई के प्रस्ताव को खारिज कर दिया और सभी भारतीय अधिकारियों को वापस बुला लिया गया।

भारत का आलोचक है शेर मोहम्मद
आपको बता दें कि शेर मोहम्मद स्टानिकजई अफगानिस्तान में भारत की भूमिका का सख्त आलोचक रहा है। हालांकि, उसने कहा था कि काबुल दूतावास में भारतीय अधिकारियों की सुरक्षा को लेकर भारत की चिंता को वो समझता है और उसने प्रस्ताव में कहा था कि भारत को अपने अधिकारियों की सुरक्षा को लेकर चिंतित नहीं होना चाहिए। रिपोर्ट के मुताबिक, शेर मोहम्मद स्टानिकजई के प्रस्ताव पर भारतीय अधिकारियों ने ध्यान दिया था, लेकिन भारतीय अधितारी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि तालिबान के प्रस्ताव का कोई महत्व नहीं है। दरअसल, भारतीय खुफिया एजेंसियों के पास जानकारी है कि लश्कर-ए-तैयबा और हक्कानी नेटवर्क के आतंकी भी काबुल पहुंच चुके हैं, लिहाजा भारत ने अपने अधिकारियों को अफगानिस्तान से बाहर निकालने का फैसला किया।
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