तालिबान ने की थी बेनजीर भुट्टो की हत्या, अब खौफ के साये में इमरान
इस्लामाबाद, 03 सितंबर। ये बात किसी से छिपी नहीं है कि पाकिस्तान आतंकवादियों का सरपरस्त है। उसे इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। फिर भी वह आतंकवादियों को पालने-पोसने से बाज नहीं आता। पाकिस्तान की सरजमीं पर तहरीक-ए-तालिबान फला फूला तो उसने 2007 में पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की हत्या कर दी। अब जब अफगानिस्तान में तालिबान का कब्जा हुआ है तो पाकितान के मौजूदा प्रधानमंत्री इमरान खान भी दहशत में आ गये हैं। वे 'पाकिस्तान तालिबान' को काबू में रखने के लिए 'अफगान तालिबान' के सामने गिड़गिड़ा रहे हैं। पाकिस्तान ने जो बोया है उसे तो काटना ही होगा।

अफगानिस्तान में सत्ता परिवर्तन से इमरान खान भले चहक रहे हैं लेकिन अंदर ही अंदर वे डरे हुए हैं। अगर पाकिस्तान तालिबान ने उनका भी तख्तापलट कर दिया तो क्या होगा ? पाकिस्तान तालिबान तो बना ही है लोकतांत्रिक और सैनिक सत्ता को नेस्तनाबूत करने के लिए। पाकिस्तान तालिबान कितना खूंखार है ये इमरान खान भी जानते हैं। उसने पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो को भरी सभा में मौत के घाट उतार दिया था। तालिबान,अलकायदा और दूसरे आतंकी संगठनों के कारण पाकिस्तान में हजारों बेकसूर लोगों को जान गंवानी पड़ी है। अनुमान है कि 2002 के बाद पाकिस्तान में करीब 50 हजार लोग आतंकी घटनाओं की वजह से मारे जा चुके हैं।

तालिबान क्यों खफा था बेनजीर भुट्टो से ?
तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) की स्थापना बैतुल्ला मेहसूद ने की थी। मेहसूद पाकिस्तान के खैबर पख्तूख्वा प्रांत का रहने वाला था। वह पढ़ा लिखा नहीं था लेकिन धार्मिक रूप से बहुत कट्टर था। वह जल्द ही दक्षिणी वजीरिस्तान का प्रमुख पख्तून नेता बन गया। उसने 2007 में कई छोटे-छोटे ग्रुपों को मिला कर 'तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान' संगठन बनाया। इस संगठन को पाकिस्तान तालिबान भी कहा जाता है। यह संगठन पाकिस्तान में शरिया शासन स्थापित करना चाहता है। इसलिए वह पाकिस्तान की मौजूदा सरकार और शासन व्यवस्था को उखाड़ फेंकना चाहता था। टीटीपी अमेरिका और उनके समर्थकों को बम और बंदूक से जवाब देना चाहता था। उसका एक और मकसद अफगानिस्तान में अमेरिकी दखल को खत्म करना भी था। टीटीपी ने पाकिस्तान सरकार को अस्थिर करने के लिए कई आत्मघाती हमले किये जिसमें सैकड़ों लोग मारे गये। दूसरी तरफ पाकिस्तानी सेना भी टीटीपी का सफाया करने के लिए अभियान चलाती रही है। 2008 में पाकिस्तान में आम चुनाव होना था। इस चुनाव में हिस्सा लेने के लिए बेनजीर भुट्टो 2007 में फिर पाकिस्तान लौटी थीं। टीटीपी का मानना था कि बेनजीर अमेरिका के इशारे पर पाकिस्तान लौटी हैं और वे सत्ता में आयीं तो मुजाहिदीनों का खात्मा कर देंगी।

बेनजीर के फिर जीतने की थी संभावना
बेनजीर भुट्टो पहली बार 1988 में पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनी थीं। वे किसी मुस्लिम देश की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं। दो साल बाद ही उनकी सरकार को बर्खास्त कर दिय गया था। 1993 वे फिर चुनाव जीत कर प्रधानमंत्री बनीं। एक महिला के दो बार प्रधानमंत्री बनने से पाकिस्तान के कट्टपंथियों की नींद हराम हो गयी थी। लेकिन बेनजीर ने अपनी गलती से खुद ही विरोधियों को मौका दे दिया। दूसरी बार सत्ता में लौटने पर वे भ्रष्टाचार के आरोपों में घिर गयीं। उनके पति आसिफ अली जरदारी को मिस्टर टेन परसेंट कहा जाने लगा। 1996 में फिर उनकी सरकार बर्खास्त कर दी गयी। भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद बेनजीर ने पाकिस्तान छोड़ दिया। वे दुबई और लंदन में रहने लगीं। लंदन में उनका अपना घर था। 2007 में जब बेनजीर पाकिस्तान लौटी तो उन्हें आश्चर्यजनक रूप से भरपूर जनसमर्थन मिला। बेनजीर की चुनावी सभा में भीड़ जुट रही थी। यह देख कर पाकिस्तान तालिबन को अंदेशा होने लगा कि बेनजीर कहीं जीत ना जाएं। पाकिस्तान तालिबन को कहीं से इनपुट मिला था कि अगर बेनजीर सत्ता में आयीं तो अमेरिका के सहयोग से वे देश में मौजूद कट्टपंथी संगठनों का खात्मा कर देंगी।

बेनजीर भुट्टो की हत्या
तब पाकिस्तान तालिबान ने बेनजीर भुट्टो की हत्या की योजना बनायी। पार्टी के सरगना बैतुल्ला मेहसूद ने बिलाल उर्फ सईद उर्फ इकरामुल्ला को आत्मघाती हमलावर के रूप में तैयार किया। टीटीपी के आतंकी अबु मंसूर वली नूर ने अपनी किताब में इस हत्याकांड का जिक्र किया है। 27 दिसम्बर 2007 को बेनजीर भुट्टो एक चुनावी सभा को संबोधित कर रहीं थीं। बिलाल भी इस सभा में शामिल था। सर्दी का मौसम था। बिलाल ने बम से लैस जैकेट पहन रखी थी। बैकअप प्लान के तहत उसने एक पिस्तौल भी छिपा रखी थी। पाकिस्तान तालिबान बेनजीर को मारने का यह मौका चूकना नहीं चाहता था। सभा के बाद जब बेनजीर चलने लगीं तो बिलाल ठीक उनके सामने आ गया। उनकी सुरक्षा के लिए मुशर्रफ सरकार ने कोई खास इंतजाम नहीं कर रखे थे। बिलाल ने अपनी पिस्तौल निकाली और बेनजीर पर गोली चला दी। गोली उनकी गर्दन में लगी। इसके बाद उसने अपने जैकेट में फिट बम का बटना दबा दिया जिससे जोर का धमाका हुआ जिससे बेनजीर समेत कई लोग मारे गये। पाकिस्तान तालिबान को यह विस्फोटक ओसामा बिन लादेन ने मुहैया कराये थे। पाकिस्तान के अंग्रेजी अखबार 'द न्यूज' ने आइएसआइ के हवाले से यह खबर प्रकाशित की थी।

क्रूर और बर्बर है पकिस्तान तालिबान
पाकिस्तान तालिबान, पाकिस्तानी सेना से भी नहीं डरता। उसने 2014 में एक आर्मी स्कूल पर हमला कर के 132 बच्चों समेत 200 लोगों की हत्या कर दी थी। इससे समझा जा सकता है कि वह कितनी निर्दयी और बर्बर है। अफगानिस्तान- पाकिस्तान सीमा पर टीटीपी ने मजबूत स्थिति कायम कर ली है। इस इलके में उनकी ही बादशाहत चलती है। पाकिस्तानी फौज इनके खात्मे के लिए कई ऑपरेशन लॉन्च किये लेकिन आज तक कामयाबी नहीं मिली। अफगान तालिबान और पाकिस्तान तालिबान में अंतर है। अफगानिस्तान के एक तालिबानी नेता ने इस अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा था, पाकिस्तान तालिबान मुसलमान हैं इसलिए हम उनसे सहानुभूति रखते हैं। इसके अलवा उनसे और हम में कोई समानता नहीं है। उनका और हमारा राजनीतिक मकसद अलग-अलग है। हम अफगानिस्तान में शरिया कानून का राज चाहते हैं और वे पाकिस्तान में। टीटीपी पाकिस्तान की समस्या है। इसमें हमारा कुछ लेना देना नहीं है। लेकिन ये केवल कहने की बाते हैं। पाकिस्तान तालिबान के कई बड़े नेता अफगानिस्तान में रहते हें और वहीं से पाकिस्तान में आतंकी हमले की साजिश रचते हैं। पाकिस्तान तालिबान, अफगानिस्तान तालिबान को अपना रहनुमा मानता है। लेकिन अभी राजनीतिक कारणों से अफगानिस्तान तालिबान ने टीटीपी से दूरी बना रखी है। ऐसा कर के वह दुनिया में अपने शासन की स्वीकार्यता बढ़ाना चाहता है।
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