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तालिबान ने लागू किया शरिया कानून, लड़ाकों को कहा, ले जा सकते हो 12 साल से ज्यादा उम्र की लड़कियां

तालिबान ने फतवा जारी करते हुए कहा है कि 12 साल की उम्र से ज्यादा की लड़कियों और विधवाओं को उनके लोग ले जा सकते हैं। जानिए पाकिस्तान का अफगानिस्तान में डबल गेम क्या है।

काबुल, अगस्त 07: अफगानिस्तान में भीषण युद्ध शुरू हो चुका है और आर-पार की लड़ाई में तालिबान, अफगानिस्तान सरकार पर भारी पड़ रहा है। दो राज्यों की राजधानियों पर नियंत्रण जमाने के साथ ही तालिबान ने अपने कब्जे वाले राज्यों में शरीयत कानून लागू कर दिया है और अपने लड़ाकों को स्वतंत्रता दी है, कि वो अपनी मर्जी से जब चाहें, जिस घर से चाहें 12 साल की उम्र से ज्यादा की लड़कियों और विधवा महिला को अपने साथ ले जा सकते हैं। इसके साथ ही खुलासा हुआ है कि पाकिस्तान अफगानिस्तान में बहुत गंदा खेल खेल रहा है, जिससे अफगानिस्तान के मासूम लोग मारे जा रहे हैं और तालिबान काफी ज्यादा मजबूत हो रहा है।

218 जिलों में तालिबान का कब्जा

218 जिलों में तालिबान का कब्जा

तालिबान 2.0 को लेकर लोगों को उम्मीद थी कि 20 साल से ज्यादा वक्त कर गुफाओं में रहने के बाद कम से कम तालिबान ने इतना सीखा होगा कि वो लोकतंत्र का सम्मान करे और मजहबी कट्टरता को छोड़े। लेकिन, अफगानिस्तान की स्थिति देखकर ऐसा लगता है कि तालिबान की सोच और तरीका वही पुरानी कबीलों वाली है। तालिबान ने 25 साल पहले काबुल पर कब्जा किया था और अब रिपोर्ट है कि तालिबान अफगानिस्तान के 218 जिलों पर पूरी तरह से नियंत्रण स्थापित कर चुका है, जबकि अफगानिस्तान सरकार के पास सिर्फ 120 जिले बचे हैं। उनमें से भी सिर्फ 99 ऐसे जिले हैं, जहां पर चुनाव होते हैं। यानि देखा जाए तो तालिबान, अफगान सरकार से ज्यादा शक्तिशाली हो चुका है। लेकिन, चूंकी ज्यादातर राज्यों की राजधानियां अफगान सरकार के पास है, इसीलिए अब तक अफगान सरकार ज्यादा ताकतवर है। लेकिन, अफगान सरकार के हाथ में 120 जिले भी कबतक रहेंगे, कुछ नहीं कहा जा सकता है।

पाकिस्तान का डबल गेम

पाकिस्तान का डबल गेम

इस बीच, पाकिस्तान लगातार दोनों तरफ से खेल रहा है। एक तरफ वो लगातार तालिबान को हथियार और आतंकियों की सप्लाई कर रहा है, तो दूसरी तरफ पश्चिमी देशों के पक्ष में भी बयान देकर उनका ध्यान भटका रहा है। और देखने में साफ तौर पर ऐसा लगता है कि पाकिस्तान के जाल में अमेरिका समेत तमाम पश्चिमी देश फंसे हुए हैं और लगता ऐसा है, जैसे पाकिस्तान समर्थित कट्टरपंथी ताकतों द्वारा अफगानिस्तान पर सैन्य कब्जे से निपटने की कोई निश्चित योजना पश्चिमी देशों के पास नहीं है। वहीं, रिपोर्ट है कि तालिबान की मदद के लिए भारी संख्या में आतंकियों को पाकिस्तान ने तो भेजा ही है, इसके साथ ही चीन के शिनजियांग, उज्बेकिस्तान के हजारों आतंकी भी तालिबान की मदद के लिए पहुंचे हैं और ऐसा माना जा रहा है कि जल्द ही ये आतंकी अफगानिस्तान में पत्थर युग की स्थापना और कबीलों की सरकार बना लेंगे।

लड़कियों के लिए काल बना तालिबान

लड़कियों के लिए काल बना तालिबान

अफगानिस्तान से नई दिल्ली पहुंची खुफिया रिपोर्ट में साफ लिखा है कि तालिबान ने अब लड़कियों के साथ जुल्म की हर हद को पार कर दिया है। तालिबान ने बदख्शा, तखर और गजनी प्रांत में 12 साल की उम्र की लड़कियों और विधवाओं के लिए फतवा जारी कर दया है। फतवे में कहा गया है कि तालिबान के लड़ाके जब चाहें, अपनी मर्जी से 12 साल की उम्र की लड़कियों और विधवा महिलाओं को ले जा सकते हैं। यानि, अंजाजा लगा सकते हैं कि ये कट्टरपंथी आतंकी उन छोटी-छोटी बच्चियों के साथ किस स्तर की हैवानियत कर रहे होंगे। वहीं, रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबानी आतंकी घर घर तलाशी अभयान चलाकर सुरक्षा बलों के परिवारवालों को निशाना बना रहे हैं और उनकी संपत्ति को लूट ले रहे है।

विदेशी आतंकियों की लिस्ट

विदेशी आतंकियों की लिस्ट

रिपोर्ट के मुताबिक, अफगानिस्तान में तालिबान के साथ कई देशी-विदेशी आतंकी संगठन आ गये हैं। अलकायदा, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट और इस्लामिक मूवमेंट ऑप उज्बेकिस्तान से जुड़े अलग अलग आतंकी संगठन तालिबान का साथ दे रहे है। वहीं, बल्ख जिले में 21 साल की एक महिला को उसकी कार से बाहर खींच लिया गया और तालिबान लड़ाकों ने बुर्का नहीं पहनने पर उसकी हत्या कर दी।

तालिबान पर पाकिस्तान की दो नीति

तालिबान पर पाकिस्तान की दो नीति

इस बीच पड़ोसी देश पाकिस्तान ने तालिबान को लेकर दोतरफा रणनीति अपनाई हुई है। एक तरफ पाकिस्तान, अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी को इस्लामाबाद की राजकीय यात्रा पर आमंत्रित करने की कोशिश में है, ताकि अमेरिका और ब्रिटेन के साथ मिलकर वो शांति वार्ता का आयोजन करे। जिसमें पाकिस्तान तालिबान के पहले डिप्टी अमीर मुल्ला याकूब (मुल्ला उमर के करीबी) और हक्कानी नेटवर्क के प्रमुख सिराजुद्दीन हक्कानी जैसे वरिष्ठ तालिबान नेताओं को बुलाना चाहता है, जो तालिबान के हाथ माने जाते हैं। वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान, जलालाबाद और नंगरहार प्रांत में अपने ड्रोन से लगातार जमीनी हकीकत की जानकारी जुटाकर तालिबान तक पहुंचा रहा है, ताकि तालिबान को फायदा पहुंचाया जाए।

क्या कर रहा है अमेरिका ?

क्या कर रहा है अमेरिका ?

वहीं, अफगानिस्तान को फिर से स्थिर करने के लिए अमेरिका ने कतर में अफगान सुरक्षा बलों की सहायता के लिए सिक्योरिटी डिफेंस मैनजमेंट ऑफिस की स्थापना की है। जिसमें सबसे खराब स्थिति की तैयारी के लिए रणनीति तैयार की जा रही है। वहीं, वाशिंगटन ने अफगान नेताओं को देश की सरकार की रक्षा में एक संयुक्त मोर्चा पेश करने, जनता का विश्वास हासिल करने और शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की सलाह दी है। अमेरिका द्वारा स्थापित इस मंच पर एचसीएनआर के अध्यक्ष अब्दुल्ला अब्दुल्ला, हजारा नेता उस्ताद मोहम्मद मोहकिक और मुजाहिदीन के पूर्व नेता उस्ताद अब्दुल रब रसूल सय्यफ, इस्माइल खान, अट्टा मोहम्मद नूर, यूनिस कानूननी, उज़्बेक नेता इनायतुल्ला बाबर और बतूर दोस्तम, राशिद दोस्तम के बेटे शामिल होंगे। लेकिन, इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अफगानिस्तान की शांति हमेशा के लिए खत्म होने वाली है। क्योंकि, तालिबान रूकने का नाम नहीं ले रहा है और शांति वार्ता से कोई नतीजा निकलने की संभावना दिख नहीं रही है।

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