तालिबान का ऐसा खौफ, बॉर्डर पर से नजर नहीं हटा पा रहे ये देश, जानिए किस बात का सता रहा डर
काबुल, 20 अगस्त। तालिबान ने एक बार फिर अफगानिस्तान पर अपना कब्जा जमा लिया है, इस समय देश के हालात बेहद चिंताजनक हैं। हाथ में बंदूक थामे तालिबानी लड़ाके जिस पर चाहें गोलियां बरसा रहे हैं, अफगानिस्तान के दर्द को बयां करती कई तस्वीरें सोशल मीडिया पर दुनिया को झगझोर रही हैं। भारत समेत कई देश अपने नागरिकों को इस नर्क से निकालने के लिए युद्धस्तर पर अभियान चला रहे हैं, तो वहीं कई स्थानीय नागरिक देश छोड़ने के लिए अपनी जांन तक दांव पर लगा दे रहे हैं।

तालिबान की वापसी के बाद
तालिबानी हुकूमत की वापसी के बाद वैश्विक ताकतें आने वाले भविष्य और राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। इस बीच अफगान के कई पड़ोसी देशों की जान भी आफत में फंस गई है, हालात इस कदर खराब हैं कि वहां की सरकारें और सेना बॉर्डर से एक सेकंड के लिए भी अपनी नजरें नहीं हटा रही हैं। अफगानिस्तान के दो पड़ोसी देशों ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान में तालिबान को लेकर खलबली मच गई हैं। लेकिन आखिर क्या वजह है कि ये दोनों मुल्क इस कदर परेशान है? आइए जानते हैं।

अफगानिस्तान के पड़ोसी देशों की बढ़ी टेंशन
आपको बता दें कि अफगानिस्तान की सीमा भारत-पाकिस्तान समेत 7 देशों से लगती है। इनमें से भारत से लगने वाली सीमा एलओसी में आती है जो पाकिस्तान के कब्जे में है। तालिबान को लेकर अफगानिस्तान के पड़ोसी देशों में शुमार ईरान और तुर्कमेनिस्तान कुछ खास चिंतित नहीं हैं, वहीं पाकिस्तान तो खुलेआम तालिबान का समर्थन कर चुका है। ऐसे में बचे अन्य पड़ोसी देश उज्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान अपनी सीमा सुरक्षा और तालिबानी लड़ाकों के घुसपैठ को लेकर चिंतित हैं।

1200 किमी लंबी है ताजिकिस्तान और अफगान
अफगानिस्तान से ताजिकिस्तान अपनी 1200 किलोमीटर की सीमा साझा करता है, यह वही देश है जहां तालिबान के काबुल में प्रवेश के बाद पूर्व राष्ट्रपति अशरफ गनी के छिपे होने की अटकलें लगाई जा रही थीं। अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद अब ताजिकिस्तान तालिबानी विचारधारा को लेकर डरा हुआ है, इसकी एक वजह यह है कि मुस्लिम बहुल देश होने के बावजूद ताजिकिस्तान का सेक्युलर है, यहां हर धर्म के लोगों को अपने हिसाब से रहने की आजादी है।

ताजिकिस्तान को सता रही ये चिंता
इस बीच अफगानिस्तान से भी शरण के लिए भारी संख्या में लोग ताजिकिस्तान पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। ताजिकिस्तान इस समय दोहरे संकट का सामना कर रहा। एक तरफ जहां शरण की आस में हजारों लोग बॉर्डर पर पहुंच रहे हैं, वहीं देश में आतंकवादियों के प्रवेश को लेकर भी चिंता गंभीर है। ताजिकिस्तान शुरू से ही तालिबान के खिलाफ रहा है, कब्जे से पहले उसके और अफगानिस्तान सरकार से अच्छे रिश्ते रहे हैं।

उज्बेकिस्तान से जुड़ा है भारत का दुखद इतिहास
अफगानिस्तान के दूसरे पड़ोसी देश उज्बेकिस्तान की बात करें तो वहां के हालात भी कुछ ऐसे ही हैं। उज्बेकिस्तान से भारत का गहरा ऐतिहासिक संबंध है, यहां की राजधानी ताशकंद में ही भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का निधन हुआ था। उज्बेकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा सिर्फ 144 किलोमीटर की है, इसके बीच से अमू दरिया नदी बहती है। दोनों देशों की सीमा पर कड़े प्रतिबंध हैं, उज्बेकिस्तान का पूरा बॉर्डर कटीले तारों के साथ बिजली का करंट के साथ बिछा हुआ है।

उज्बेकिस्तान की सीमा में घुसना आसान नहीं
उज्बेकिस्तान की सीमा में घुसना इतना आसान तो नहीं है लेकिन अफगानिस्तान के साथ मैत्री ब्रिज एक रास्ता हो सकता है। अफगानिस्तान के वर्तमान हालात को लेकर उज्बेकिस्तान इस बात को लेकर दुविधा में है कि वह किसी अपनी सीमा में आने दे और किसे रोके। रूस के समर्थन की वजह से तालिबान भी उज्बेकिस्तान को पसंद नहीं करता, ऐसी रिपोर्टें सामने आई हैं कि सख्त बर्डर होने के बावजूद कई लोग सीमा पार करने की कोशिशों में लगे हुए हैं। कई अफगानी सैनिक और अधिकारी उज्बेकिस्तान में शरण लेने के लिए सरकार से संपर्क साथ रहे हैं।

अफगानिस्तान में फंसे हैं कई उज्बेक नागरिक
काबुल पर तालिबान के कब्जे से एक दिन पहले ही यानी 14 अगस्त को उज्बेकिस्तान के विदेश मंत्री ने बताया कि उनकी सरकार ने 84 अफगान सैनिकों को शरण दिया है। इस बीच यह भी कहा गया कि मैत्री ब्रिज के पास अभी भी सैकड़ों सैनिकों का जमावड़ा लगा हुआ है। फिलहाल तलिबान को लेकर उज्बेकिस्तान के सामने उससे डील करने की समस्या उठ खड़ी हुई है। कई उज्बेक नागरिक अफगान में भी फंसे हुए हैं, उनकी मदद कैसे की जाए अभी इस बारे में सरकार की तरफ से कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इस बीच उज्बेकिस्तान के सामने यह भी दुविधा है कि वह पिछली अफगान सरकार के किसी नेता को शरण देकर तालिबान से दुश्मनी मोल नहीं लेना चाहता।
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