UP में बाहुबलियों के हथियारों पर हाईकोर्ट का हथौड़ा, राजा भैया-बृजभूषण समेत 19 की बढ़ी टेंशन!
Allahabad High Court on UP Weapon License: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में बाहुबलियों और आपराधिक पृष्ठभूमि (Criminal Background) वाले लोगों के शस्त्र लाइसेंसों (Arms licenses) को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि हथियारों का सार्वजनिक प्रदर्शन समाज में डर पैदा करता है, जो कानून के शासन के बिल्कुल खिलाफ है।
अदालत ने राज्य सरकार और सभी जिलों के आला अधिकारियों से इस मामले में विस्तृत जवाब तलब करते हुए राजा भैया, धनंजय सिंह और बृजभूषण शरण सिंह समेत सूबे के 19 बड़े रसूखदारों के हथियारों की कुंडली मांग ली है। आइए जानतें हैं हाईकोर्ट के इस कड़े कदम के पीछे की पूरी कहानी क्या है।
हाईकोर्ट ने यह तल्ख टिप्पणियां 'जय शंकर उर्फ बैरिस्टर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं 2 अन्य' मामले में सूबे के भीतर निजी हथियारों के दुरुपयोग पर सुनवाई करते हुए कीं।

जस्टिस विनोद दिवाकर की पीठ ने बेहद कड़े शब्दों में कहा कि, 'सच्ची आत्मरक्षा का उद्देश्य जीवन की रक्षा करना और व्यवस्था बनाए रखना होता है, न कि सार्वजनिक स्थलों को डर और दबदबे के माहौल में बदलना। इसलिए, जो संस्कृति बंदूकों और डराने-धमकाने को बढ़ावा देती है, उसे कभी भी शांतिपूर्ण और कानून सम्मत समाज के अनुकूल नहीं माना जा सकता।'
Bar and Bench की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने आगे जोड़ा कि जिस समाज में सशस्त्र व्यक्ति अपनी ताकत और धमकियों के दम पर दबदबा बनाते हैं, वह समाज कभी भी अधिक स्वतंत्र या शांतिपूर्ण नहीं बन सकता। अदालत ने साफ किया कि बिना सोचे-समझे हथियारों तक पहुंच समाज के लिए एक गंभीर खतरा है।
मार्च में ही जारी हुए थे 75 जिलों को निर्देश
इस मामले में कोर्ट ने इसी साल मार्च महीने में ही उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलाधिकारियों (DM) और कलेक्टर्स को निर्देश दिया था कि वे अपने-अपने जिलों के सभी थानों के अनुसार निजी व्यक्तियों के पास मौजूद हथियारों का पूरा ब्योरा सौंपें। इसके साथ ही जिलाधिकारियों के पास लाइसेंस जारी करने, रिन्यू करने या ट्रांसफर करने के लिए लंबित पड़े आवेदनों की जानकारी भी मांगी गई थी।
UP में शस्त्र लाइसेंसों के चौंकाने वाले आंकड़े
कोर्ट के सामने जो आधिकारिक आंकड़े आए हैं, वे बेहद हैरान करने वाले हैं:
- कुल लाइसेंस: उत्तर प्रदेश में अब तक कुल 10,08,953 शस्त्र लाइसेंस जारी किए जा चुके हैं।
- लंबित आवेदन: वर्तमान में अलग-अलग श्रेणियों के 23,407 आवेदन पेंडिंग हैं।
- पारिवारिक लाइसेंस: प्रदेश के 20,960 परिवार ऐसे हैं, जिनके पास एक से अधिक हथियार हैं।
- आपराधिक रिकॉर्ड: सबसे गंभीर बात यह है कि 6,062 मामलों में ऐसे लोगों को लाइसेंस दिए गए हैं, जिन पर दो या उससे ज्यादा आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं।
कोर्ट की रडार पर आए ये 19 रसूखदार
अदालत ने राज्य सरकार के गृह सचिव द्वारा दाखिल हलफनामे की समीक्षा के बाद कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने नोट किया कि एक तरफ राज्य सरकार गन कल्चर के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' (शून्य सहनशीलता) की नीति का दावा करती है, लेकिन दूसरी तरफ अधिकारियों ने व्यापक सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव रखने वाले राजनेताओं, सांसदों और विधायकों की महत्वपूर्ण जानकारियां छिपाने की कोशिश की।
अदालत ने अब साफ तौर पर नाम लेकर इन 19 प्रभावशाली लोगों के सही पते, उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों, हथियार लाइसेंस और उन्हें मिली सुरक्षा व्यवस्था का पूरा ब्योरा मांगा है:
1. रघुराज प्रताप सिंह (राजा भैया)
2. धनंजय सिंह
3. बृजभूषण शरण सिंह
4. सुशील सिंह
5. विनीत सिंह
6. अजय मरहद
7. सुजीत सिंह बेलवा
8. उपेन्द्र सिंह गुड्डू
9. पप्पू भौकाली
10. इन्द्रदेव सिंह
11. सुनील यादव
12. फरार अजीम
13. बादशाह सिंह
14. संग्राम सिंह
15. सुल्लू सिंह
16. चुलबुल सिंह
17. सनी सिंह
18. छुन्नू सिंह
19. डॉ. उदय भान सिंह
गन लाइसेंस के साथ सरकारी सुरक्षा की भी खुलेगी कुंडली
हाईकोर्ट ने सिर्फ हथियारों तक ही अपनी जांच सीमित नहीं रखी है। कोर्ट ने सरकार को विशेष रूप से यह बताने का निर्देश दिया है कि सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में सक्रिय इन लोगों को क्या कोई सरकारी सुरक्षा (Government Security) दी गई है? यदि हां, तो:
- उन्हें किस कैटेगरी की सुरक्षा मिली हुई है?
- उनकी सुरक्षा में कितने पुलिसकर्मी तैनात हैं?
- सुरक्षा में लगाए गए पुलिसकर्मियों के रैंक क्या हैं?
लापरवाही की तो खैर नहीं: कोर्ट की अंतिम चेतावनी
हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि कानून के राज में किसी भी तरह का भेदभाव बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अदालत ने अपर मुख्य सचिव (गृह) समेत सभी जिलाधिकारियों और पुलिस कप्तानों को आदेश की कॉपी भेजकर जवाबदेही तय करने को कहा है। अदालत ने पुलिस अधिकारियों से एक अंडरटेकिंग (शपथपत्र) भी मांगा है जिसमें यह पुष्टि करनी होगी कि पूर्व के आदेशों में मांगी गई कोई भी सामग्री छिपाई नहीं गई है।
कोर्ट ने सख्त लहजे में चेतावनी देते हुए कहा, 'अधिकारियों की ओर से किसी भी तरह की ढिलाई या लापरवाही को जानबूझकर कर्तव्य की अवहेलना (intentional dereliction of duty) माना जाएगा और इस अदालत द्वारा इसे बेहद गंभीरता से लिया जाएगा।' मामले की अगली सुनवाई 26 मई 2026 को होगी। इस मामले में याचिकाकर्ताओं का पक्ष अधिवक्ता कृपा शंकर शुक्ला और विकास शुक्ला द्वारा रखा जा रहा है। अब देखना होगा कि अगली सुनवाई में शासन और प्रशासन इस पर क्या कार्रवाई रिपोर्ट पेश करता है।













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