ताइवान का ‘लव ट्राएंगल’: अमेरिका हावी होगा या चीन

ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग-वेन अमेरिका के दौरे पर हैं और उनके पूर्ववर्ती मा यिंग-जो चीन के शहरों का दौरा कर रहे हैं. क्या हैं इसके मायने?

ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग-वेन
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ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग-वेन

ताइवान एक 'ख़तरनाक लव ट्राएंगल' के बीच फंस गया है.

बीते सप्ताह ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग-वेन का अमेरिका के न्यूयॉर्क में ज़बरदस्त स्वागत हुआ. इसके बाद अब वो कैलिफ़ोर्निया जाने वाली हैं जहां उनकी मुलाक़ात अमेरिका के हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेन्टिव्स के स्पीकर केविन मैकार्थी से होनी है.

साई इंग-वेन के अमेरिकी दौरे के वक्त को लेकर चर्चा के बीच अमेरिका और चीन के बीच तनाव की खाई और गहराती जा रही है. हाल के दिनों में अमेरिका में परस्पर विरोध में रहने वाले डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टी के नेता ताइवान के समर्थन के मामले में एक-दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ में लगे दिखते हैं.

इसका एक बड़ा कारण ये है कि बीते साल अमेरिकी हाउस की पूर्व स्पीकर नैन्सी पेलोसी ने ये जानते हुए ताइवान का दौरा किया कि चीन उनकी यात्रा से नाराज़ होगा.

ताइवान एक स्वशासित प्रदेश है जिसे चीन अपना हिस्सा मानता है. चीन का मानना है कि आज नहीं तो कल इस हिस्से को वो खुद में शामिल कर लेगा.


ताइवान-चीन के बीच 70 साल से है तनाव

  • 1945-49 के दौर में चीन में गृह युद्ध छिड़ा था. एक तरफ माओत्से तुंग की अगुवाई में कम्युनिस्ट थे तो दूसरी तरफ च्यांग काई शेक के नेतृत्व में राष्ट्रवादी ताक़तें थीं.
  • च्यांग काई शेक बुरी तरह हारने लगे, उन्होंने ऐसी जगह जाने के बारे में सोचा जहां वो फिर से ताक़त बटोर सकें.
  • वो ताइवान चले गए जहां उन्होंने निर्वासन में रहते हुए सरकार गठित की.
  • चीन के कम्युनिस्ट अब तक ताइवान को अपने अधिकार में नहीं ले पाए हैं.

ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग-वेन नैन्सी पेलोसी के साथ
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ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग-वेन नैन्सी पेलोसी के साथ

अमेरिका के नज़दीक जाने से ताइवान को क्या फ़ायदा?

चीन और अमेरिका के बीच ताइवान तनाव का अहम मुद्दा बना हुआ है.

ताइवान के अमेरिकन इंस्टीट्यूट के पूर्व निदेशक प्रोफ़ेसर विलियम स्टैन्टन कहते हैं, "निजी तौर पर मैं पेलोसी के दौरे के विरोध में था. अमेरिका के किसी वरिष्ठ राजनेता का ताइवान का दौरा करना चीन को बैठे-बिठाए सुई चुभोने जैसा था जिससे कुछ फायदा नहीं होने वाला था. इसका जो नतीजा दिखा वो बेहद डराने वाला था."

चीनी की कई मिसाइलें गरजती हुई ताइवान के ऊपर से गुज़रीं जिन्होंने इस द्वीप पर लोगों को परेशान कर दिया. इस इलाक़े के दूसरे देशों में चर्चा छिड़ गई कि कहीं चीन ताइवान के ख़िलाफ़ युद्ध तो नहीं छेड़ देगा.

लेकिन इसके बावजूद जनवरी में अमेरिकी हाउस के स्पीकर बनने के बाद रिपब्लिकन पार्टी से नाता रखने वाले कैविन मैकार्थी ने कहा कि वो इस मामले में नैन्सी पेलोसी के नक्शेकदम पर चलेंगे.

प्रोफ़ेसर विलियम स्टैन्टन कहते हैं कि हाउस स्पीकर बनने के तुरंत बाद उन्होंने ताइवान दौरे की इच्छा जताई लेकिन ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग-वेन ने कहा कि ये सही नहीं होगा.

प्रोफ़ेसर स्टैन्टन कहते हैं, "मुझे लगता है कि केविन मैकार्थी पेलोसी जैसा काम ही करना चाहते थे लेकिन साई इंग-वेन ने उन्हें कहा 'नो थैंक्यू, कैसा हो अगर हम ताइवान की जगह कैलिफ़ोर्निया में मुलाक़ात करें'."

एक तरफ राष्ट्रपति साई इंग-वेन एक और अमेरिकी नेता के ताइवान दौरे के कारण फिर से विवादों को जन्म नहीं देना चाहतीं तो दूसरी तरफ वो चीन को ये भी दिखाना चाहती हैं कि वो गणतांत्रिक रूप से चुनी हुई देश की सरकार और उसके सबसे ताकतवर सहयोगी अमेरिका के बीच के संबंधों को तोड़ नहीं सकेगा.

इसी पृष्ठभूमि में राष्ट्रपति साई और केविन मैकार्थी की मुलाक़ात कैलफ़ोर्निया में होनी है. लेकिन केविन उनके दौरे के लेकर बेहद उत्साहित दिखते हैं. चीन की इस चेतावनी के बावजूद कि 'ताइवान के सवाल पर अमेरिका आग से खेल रहा है' उन्होंने इसे 'दो मुल्कों के नेताओं के बीच की' बैठक कहा.

ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञानी वेन-टी संग कहते हैं कि ताइवान के लिए ये कथित "ट्रांज़िट डिप्लोमेसी" (यात्राओं के ज़रिए अपने सहयोगियों से संबंध बनाना और इसके ज़रिए अपने दुश्मन को चुनौती देना) बेहद महत्वपूर्ण है.

बीते कुछ सालों में चीन ने ताइवान के सहयोगी रहे कई मुल्कों को सफलतापूर्वक उससे दूर कर दिया है. आज के दौर में जो देश ताइवान को एक देश के तौर पर मान्यता देते हैं उनकी संख्या 13 तक सीमित हो गई है.

वेन-टी संग कहते हैं, "ताइवान के समाज को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान चाहिए और ये यात्रा इस लिहाज़ से महत्वपूर्ण है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान न होने की वजह से ताइवान के लोगों के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन के ये इशारे बेहद महत्वपूर्ण हो गए हैं."


बीते सप्ताह होंडुरास ने ताइवान से साथ अपने दशकभर पुराने कूटनीतिक रिश्ते तोड़ लिए जिसके बाद कुल 13 देशों के ताइवान के साथ औपचारिक संबंध हैं.

जिन 13 देशों के ताइवान के साथ कूटनीतिक संबंध हैं, वो हैं

  • लातिन अमेरिका और कैरिबियाई देश - बेलीज़, ग्वाटेमाला, पराग्वे, हेती, सेंट किट्स एंड नेवीज़, सेंट लूसिया, सेंट विन्सेंट एंड द ग्रेनडाइन्स
  • पेसिफ़िक- मार्शल आइलैंड्स, नाउरू, पलाउ, तुवालु
  • अफ़्रीका - एस्वातिनी
  • यूरोप- वेटिकन सिटी

मा यिंग-जू
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मा यिंग-जू

चीन की प्रतिक्रिया

ऐसा नहीं है कि इस बीच चीन खामोश बैठा केवल धमकियां दे रहा है. उसने साई इंग-वेन से पहले ताइवान के राष्ट्रपति रहे मा यिंग-जो को चीन दौरे का निमंत्रण दिया है.

चीन के बुलावे पर मा यिंग-जो अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने के लिए चीन के पांच शहरों का दौरा करने के लिए तैयार हुए और चीन पहुंच कर अपने पूर्वजों की कब्रों पर फूल चढ़ाने गए.

लेकिन उनके इस दौरे के राजनीति मायने भी हैं. दरअसल ये पहला मौका है जब 1949 में ताइवान बनने के बाद कोई पूर्व राष्ट्रपति पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना के दौरे पर गया है.

वेन-टी संग कहते हैं, "चीन ताइवान को लेकर नरम रुख़ रखना चाहता है. वो लोगों के दिल जीतना चाहता है और कोशिश कर रहा है कि 2024 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव अभियान में राष्ट्रवाद का मुद्दा सिर न उठा सके."

वो कहते हैं कि मा यिंग-जो का चीन दौरा इसके लिए ज़रूरी "राजनीतिक भूमिका" तैय़ार कर देगा.

चीन के नानजिंग पहुंचने के बाद मा यिंग-जो ने जो भाषण दिया उसे भी दोनों तरफ के लोगों के बीच की दोस्ती के तौर पर देखा जा रहा है.

राजनीतिक भावना से भरे अपने भाषण में उन्होंने कहा, "ताइवान की खाड़ी के दोनों तरफ के लोग चीनी हैं. ये सभी लोग चीन के यैन और सैलो सम्राटों के वंशज हैं."

प्रोफ़ेसर विलियम स्टैन्टन कहते हैं, "मा यिंग-जो की तरफ चीन का बर्ताव बढ़िया है क्योंकि वो एक तरह से आत्मसमर्पण का प्रतिनिधित्व करते हैं. वो कहते हैं कि 'हम सभी चीनी हैं'. ये ऐसी बात है जिस पर चीन तो सहमत है लेकिन ताइवान इस बात से बिल्कुल इत्तेफ़ाक नहीं रखता."

मा यिंग-जो की नीति में जोखिम वाली बात ये है कि हाल में हुए सर्वे के अनुसार ताइवान के 60 फ़ीसदी नागरिक खुद को ताइवानीज़ कहते हैं, वो खुद को चीनी नहीं मानते.

वेन-टी संग कहते हैं, "लेकिन आने वाले दिनों में इसका एक फ़ायदा भी हो सकता है. अब तक जो सर्वे हुए हैं उनमें सामने आया है कि ताइवान के आधे से अधिक नागरिक मानते हैं कि चीन के साथ युद्ध अब एक बड़ी संभावना है. मा यिंग-जो ताइवान के नागरिकों को ये भरोसा दिलाना चाहते हैं कि केवल उनकी पार्टी कुओमिनतांग युद्ध रोक सकती है."

वेन कहते हैं, "वो एक तरफ अपनी विरासत का इस्तेमाल ताइवान खाड़ी के दोनों तरफ के लोगों को जोड़ने के लिए कर रहे हैं तो दूसरी तरफ ताइवान में घरेलू स्तर पर अपना राष्ट्रपति चुनाव अभियान भी शुरू कर रहे हैं. उनकी पार्टी का दावा है कि वो चीन के साथ शांति स्थापित कर सकती है."


अमेरिका की भूमिका

  • 1972 में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने चीन के साथ मेलजोल बढ़ाना शुरू किया. 'शंघाई घोषणापत्र' तभी सामने आया. इसी ने 'वन चाइना पॉलिसी' स्थापित की.
  • इसके मुताबिक अमेरिका मानता है कि ताइवान स्ट्रेट के दोनों तरफ चीनी हैं. वो ये भी मानता है कि चीन एक है और ताइवान चीन का हिस्सा है.
  • ये नीति अमल में आने के बाद ताइवान ने संयुक्त राष्ट्र में अपनी सीट गंवा दी. और 1970 के दशक के आख़िर तक अमेरिका के चीन के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित हो गए.
  • अमेरिका हमेशा कहता रहा है कि ये नीति सिर्फ़ चीन के ताइवान पर दावे को मानती है, लेकिन इसे मंज़ूरी या मान्यता नहीं देती.
  • ताइवान को भरोसा देने के लिए पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने 1979 में 'ताइवान रिलेशन्स एक्ट' पर हस्ताक्षर किए. इसमें ताइवान को हथियार बेचने का वादा किया गया ताकि वो अपनी रक्षा कर सके.
  • तब से अमेरिका की जो आधिकारिक नीति रही है, उसमें ताइवान एक अहम 'रणनीतिक पेंच' है.

ताइवान को लेकर आमने-सामने अमेरिका-चीन

लेकिन आज सबसे बड़ा मुद्दा ताइवान या घरेलू स्तर पर उसकी राजनीति नहीं है बल्कि उसे लेकर अमेरिका और चीन के बीच बढ़ रहा तनाव है.

अमेरिका के जर्मन मार्शल फंड के एशिया प्रोग्राम की प्रमुख बॉनी ग्लेज़र कहती हैं कि साल 1979 में अमेरिका और चीन ने एक-दूसरे को आधिकारिक तौर पर मान्यता दी थी, उसके बाद से दोनों के बीच रिश्ते आज से पहले कभी इतने निचले स्तर तक नहीं पहुंचे थे.

वो कहती हैं, "चीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन या फिर पेंटागन से बात करने को तैयार नहीं है. अमेरिकी कांग्रेस ने पहले ही चीन के अस्तित्व को ही ख़तरा बताया है."

दशकों तक अमेरिका ताइवान को लेकर बेहद सावधानी बरतता रहा है. वो हमेशा कहता रहा है कि उसकी नीति चीन के ताइवान पर दावे को मानती है, लेकिन उसने इसे मंज़ूरी या मान्यता नहीं दी है.

वही चीन का कहना है कि ताइवान उसका हिस्सा है और चीन की एक ही सरकार है जो उसकी 'मेनलैंड' में है.

1979 के बाद से अमेरिका ने ताइवान के साथ नहीं बल्कि चीन से साथ कूटनीतिक संबंध बनाए रखे हैं. हालांकि वो ताइवान का सहयोगी भी बना हुआ है और कहता है कि वो ताइवान की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है.

लेकिन अब चीन का कहना है कि ताइवान की खाड़ी में बीते चार दशकों से शांति बनाए रखने में मदद करने के बाद अमेरिका अब स्थिति को बदलने की कोशिश कर रहा है.

बॉनी ग्लेज़र कहती हैं, "अमेरिका राष्ट्रपति जो बाइडन ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को भरासा दिलाया है कि वो ताइवान का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में नहीं कर रहे हैं और वो ताइवान को चीन से अलग करने का समर्थन नहीं करते."

वो कहती हैं कि अमेरिका और ताइवान के राजनेताओं के आधिकारिक दौरों और बैठकों के बीच उनके वादे पर भरोसा करना बेहद मुश्किल है.

ऐसे में जब राष्ट्रपति साई इंग-वेन कैलिफ़ोर्निया में कैविन मैकार्थी के साथ चाय की चुस्कियां ले रही होंगी, उस वक्त मा यिंग-जो चीन के शहरों में होंगे. लेकिन ताइवान के लिए ये ज़रूरी है कि वो चीनी राष्ट्रपति से भी बात करे.

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