मालदीव-बांग्लादेश के बाद हाथ से निकलेगा श्रीलंका? आज हो रहे राष्ट्रपति चुनाव में जीत सकते हैं चीन समर्थक नेता
Sri Lanka Election 2024: श्रीलंका में भीषण आर्थिक संकट के बाद 2022 में हुए बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों के बाद पहली बार राष्ट्रपति चुनाव हो रहे हैं, जिसकी वजह से सत्ता से राजपक्षे परिवार का पतन हो गया था। लिहाजा, देश इस बार धर्म से हटकर मुद्दों के आधार पर वोट डाल रहा है।
वहीं, श्रीलंका का पड़ोसी देश भारत भी राष्ट्रपति चुनाव पर नजर बनाए हुए है। इन चुनावों के नतीजे कोलंबो के साथ नई दिल्ली के संबंधों को बदल सकते हैं। श्रीलंका का राष्ट्रपति चुनाव भारत के लिए क्यों मायने रखता है, आइए जानते हैं।

श्रीलंका की रणनीतिक मौजूदगी
श्रीलंका की भारत से नजदीकी और हिंद महासागर क्षेत्र में इसकी रणनीतिक स्थिति 21 सितंबर को होने वाले चुनावों को नई दिल्ली के लिए महत्वपूर्ण बनाती है।
इस द्वीप राष्ट्र में उत्तरी और पूर्वी प्रांतों में तमिलों की एक बड़ी संख्या है, जो इसकी आबादी का 11 प्रतिशत है। जिसकी वजह से भारत और श्रीलंका में तमिलों के बीच न केवल भाषाई और सांस्कृतिक समानताएं हैं, बल्कि उनके बीच रिश्तेदारी के बंधन भी हैं।
श्रीलंका में तमिलों की स्थिति ने भारत को लंबे समय से प्रभावित किया है। यह द्वीप राष्ट्र 1987 में भारत-श्रीलंका समझौते के हिस्से के रूप में हस्ताक्षरित श्रीलंका के संविधान में 13वें संशोधन को लागू करने में अभी तक नाकाम रहा है। इस समझौते के तहत, कुछ शक्तियां श्रीलंका के नौ प्रांतों की स्थानीय सरकारों को ट्रांसफर की जाएंगी।
पिछले साल जुलाई में श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने नई दिल्ली का दौरा किया था, जिस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने द्वीप राष्ट्र में तमिल समुदाय के लिए "सम्मानपूर्ण जीवन सुनिश्चित करने" की जरूरत पर जोर दिया था। उन्होंने विक्रमसिंघे से यह भी कहा था, कि उन्हें उम्मीद है कि श्रीलंका के राष्ट्रपति 13वें संशोधन को लागू करेंगे।
नए राष्ट्रपति के सत्ता में आने के बाद भारत, श्रीलंका में प्रांतीय परिषद के चुनावों के लिए भी जोर दे सकता है, जिससे श्रीलंकाई तमिलों को ज्यादा स्वायत्तता मिलेगी।
लेकिन, श्रीलंका भारत के लिए कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं, कि श्रीलंका भारत के जिस दक्षिणी स्थान के करीब स्थित है, उन इलाकों में भारत के परमाणु ऊर्जा संयंत्र, स्पेस रिसर्च सेंटर और नौसैनिक अड्डे जैसे प्रमुख प्रतिष्ठान हैं, लिहाजा श्रीलंका में किसी भी एंटी-इंडिया स्टैंड रखने वाली सरकार का आना, भारत के लिए मुसीबत खड़ी कर सकता है।

पड़ोस में घट रहे हैं भारत के सहयोगी
भारत के पड़ोस की बदलती वास्तविकताएं भी श्रीलंका के चुनाव में भारत की दिलचस्पी को स्पष्ट करती हैं। बांग्लादेश में शेख हसीना के सत्ता से बाहर होने के बाद से नई दिल्ली और ढाका के बीच के संबंधों पर गहरा असर पड़ा है।
वहीं, मालदीव में भारत विरोधी भावनाएं बढ़ना भी अच्छी खबर नहीं है। राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू, जिन्हें चीन समर्थक नेता के रूप में देखा जाता है, वो पहले ही द्वीप देश से भारतीय सैनिकों को निकाल चुके हैं, हालांकि अब वो दिल्ली का दौरा करके दोनों देशों के संबंधों को सुधारने की कोशिश कर रहे हैं।
जबकि, 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद से चीन के साथ भारत के संबंध काफी तनावपूर्ण रहे हैं। म्यांमार गृहयुद्ध से जूझ रहा है, जिसमें विद्रोहियों ने देश के आधे हिस्से पर कब्जा कर रखा है। अफगानिस्तान में 2021 से तालिबान का शासन है। पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध तो दशकों से खराब बने हुए हैं।
लिहाजा, श्रीलंका में सत्ता में कोई प्रतिकूल बदलाव भारत नहीं चाहता है। दक्षिण एशिया में आश्चर्यजनक राजनीतिक परिवर्तन उस वक्त हो रहे हैं, जब बीजेपी की सरकार बहुमत से दूर रह गई है।
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट (SCMP) की एक रिपोर्ट में श्रीलंका स्थित विदेश नीति थिंक टैंक फैक्टम की मुख्य विश्लेषक उदिता देवप्रिया ने कहा है, कि "भारत निश्चित रूप से इस चुनाव को बहुत ही पैनी नजर से देखेगा।"
भारत, श्रीलंका में एक दोस्ताना सरकार की उम्मीद करेगा ताकि पीएम मोदी और विक्रमसिंघे के प्रशासन के बीच "मजबूत संबंध" जारी रहे। राष्ट्रपति विक्रमसिंघे, जो एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं, वो नई दिल्ली के साथ दोस्ताना संबंध रखने के लिए जाने जाते हैं। हालांकि, वे बीजिंग के भी करीब रहे हैं, लेकिन वो बैलेंस बनाकर चल रहे हैं।
लेकिन ये याद रखना जरूरी है, कि 2017 में श्रीलंका के प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे ने ही रणनीतिक दक्षिणी बंदरगाह हंबनटोटा को 99 साल की लीज पर चीन को सौंपने की मंजूरी दी थी।
यूएस इंस्टीट्यूट ऑफ पीस के विजिटिंग विशेषज्ञ नीलांथी समरनायके ने SCMP को बताया है, कि भारत श्रीलंका के साथ अपने सकारात्मक संबंधों की रक्षा करना चाहेगा, खासकर बाग्लादेश में शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद श्रीलंका, भारत के लिए और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है।
श्रीलंका में चीन फैक्टर
हिद महासागर क्षेत्र में चीन का बढ़ता प्रभाव भारत के लिए चिंता का विषय है। द डिप्लोमैट के मुताबिक, श्रीलंका के राष्ट्रपति चुनावों में नई दिल्ली की हिस्सेदारी है, क्योंकि वह द्वीप राष्ट्र में "चीनी प्रभाव का मुकाबला करने की इच्छा" रखती है। विश्लेषकों का मानना है, कि नई दिल्ली और बीजिंग के साथ श्रीलंका के भविष्य के संबंध जीतने वाले उम्मीदवार की नीतियों पर निर्भर करेंगे।
मौजूदा राष्ट्रपति विक्रमसिंघे के अलावा, समागी जन बलवेगया (SJB) के विपक्षी नेता सजित प्रेमदासा और नेशनल पीपुल्स पावर (NPP) गठबंधन के अनुरा कुमारा दिसानायके अन्य प्रमुख दावेदार हैं। राजपक्षे वंश के 38 साल के नमल राजपक्षे भी इस रेस में हैं, लेकिन उन्हें ज्यादातर अपने परिवार की विरासत को पुनर्जीवित करने की कोशिश करने वाले एक प्रतीकात्मक उम्मीदवार के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन, अनुरा कुमारा दिसानायके फिलहाल हर सर्वे में आगे चल रहे हैं।
प्रेमदासा का झुकाव भारत की ओर ज्यादा है और उनकी SJB पार्टी चीन को लेकर काफी शंका रखती है, जबकि दिसानायके को बीजिंग के करीब माना जाता है। टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, प्रेमदासा भारत, अमेरिका और चीन सहित सभी प्रमुख शक्तियों के साथ मजबूत संबंध विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे श्रीलंका एक "गुटनिरपेक्ष" राष्ट्र बन जाएगा।
श्रीलंका ने भारत और चीन दोनों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखने की कोशिश की है। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है, कि अगर NPP के दिसानायके सत्ता में आते हैं तो यह भू-राजनीतिक संतुलन खतरे में पड़ सकता है।

अनुरा कुमारा दिसानायके जीते तो मुश्किल में होगा भारत?
श्रीलंका में प्रगतिशील राजनीति और नीति के लिए मुरगला केंद्र के विश्लेषक हरिंद्र बी दासनायके ने SCMP को बताया है, कि NPP के उदय ने दिल्ली को "चिंतित" कर दिया है। उन्होंने कहा, "भारत एनपीपी के संभावित नेतृत्व को लेकर सतर्क रहने के लिए बाध्य होगा, जबकि चीन इसे क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बढ़ाने के अवसर के रूप में देखेगा।"
हालांकि, भारत ने जनता विमुक्ति पेरमुना (JVP) के प्रमुख दिसानायके से जुड़ने की कोशिश की है। फरवरी में विदेश मंत्री (ईएएम) एस जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल ने भारत में दिसानायके के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की थी।
अपनी ओर से, बीजिंग राष्ट्रपति चुनाव जीतने वाले किसी भी उम्मीदवार से जुड़ने की कोशिश करेगा। एससीएमपी से बात करते हुए, समरनायके ने कहा, कि चीन ने श्रीलंका में पैठ बना ली है और नेतृत्व परिवर्तन से अपनी "रणनीतिक पकड़" को प्रभावित नहीं होने देगा। लेकिन, भारत के सामने दिक्कत एक और रणनीतिक सहयोगी को खोने की हो सकती है, लेकिन इस वक्त भारत निश्चित तौर पर ऐसा नहीं चाहेगा।












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