मंगल ग्रह पर इंसानों को बसाने का सपना टूटा? लाल ग्रह पर पानी को लेकर ऐसी बात पता चली, कि वैज्ञानिक हुए उदास
Mars News: मंगल ग्रह आज सूखा और बंजर हो सकता है, लेकिन कई वैज्ञानिक सबूतों से पता चलता है, कि अरबों साल पहले लाल ग्रह पर पानी बहता था।
लेकिन, अब नए शोध से पता चला है, कि यह पानी कम समय के लिए मंगल की सतह पर मौजूद रहा होगा। वैज्ञानिकों ने पहले अनुमान लगाया था, कि मंगल ग्रह पर काफी ज्यादा समय तक पानी मौजूद था, लेकिन नया रिसर्च वैज्ञानिकों को उदास करने वाला है।

ऐसा इसलिए है, क्योंकि नासा के मार्स रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर (एमआरओ) जैसे अंतरिक्ष यान ने मंगल ग्रह पर जो नदियां देखी थीं, और जिनके बारे में पहले सोचा गया था, कि वे पानी के प्रवाह से बनी हैं, उनपर अब शोध से पता चला है, कि वो पानी के प्रवाह के बजाए, कार्बन डायऑक्साइड बर्फ में हुई विस्फोट के बाद उसके वाष्प से बनी हो सकती हैं।
मंगल ग्रह को लेकर शोध में बड़ा झटका
किसी भी जिंदगी के लिए पानी सबसे अहम माना जाता है, इसलिए शोध के ये परिणाम, मंगल ग्रह पर प्राचीन सूक्ष्म जीवन की खोज के लिए बुरी खबर हो सकते हैं।
टीम लीडर और यूट्रेक्ट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता लोन्के रूलोफ्स, जो मंगल ग्रह को लेकर शोध कर रहे हैं, उन्होंने एक बयान में कहा, कि "यह सामान्य रूप से मंगल ग्रह पर पानी के बारे में हमारे पुराने विचारों को प्रभावित करता है, और इसलिए लाल ग्रह पर जीवन की हमारी खोज को प्रभावित करता है।"
उन्होंने कहा, कि "मेरे शोध के नतीजे बताते हैं, कि मंगल ग्रह पर जीवन होने की संभावना पहले की तुलना में कम है।"
कम समय के लिए पानी, मतलब जीवन की संभावना कम
रूलोफ्स के मुताबिक, मंगल का वातावरण 95% कार्बन डाइऑक्साइड से बना है। मंगल ग्रह पर सर्दियों के दौरान, तापमान शून्य से 184 डिग्री फ़ारेनहाइट (शून्य से 120 डिग्री सेल्सियस नीचे) तक गिर जाता है, जो मंगल के वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड को जमा करने के लिए पर्याप्त ठंडा होता है।
जैसे ही यह कार्बन डायऑक्साइड जमता है, वो सीधे कार्बन डाइऑक्साइड बर्फ में बदल सकती है, और अपने तरल अवस्था से बाहर निकल आती है। इसी तरह की प्रक्रिया पृथ्वी पर भी देखी जाती है, जब जल वाष्प बर्फ के क्रिस्टल बनाता है जो जमीन को ढक देता है।
जब मंगल ग्रह के वसंत के साथ गर्म तापमान आता है, तो कार्बन डाइऑक्साइड बर्फ, वापस गैसीय रूप में जा सकती है, वो भी सीधे ठोस रूप से से गैस में। यानि, वो तरल अवस्था में नहीं जाती है और इस प्रक्रिया को "ऊर्ध्वपातन" कहा जाता है, जो लाल ग्रह पर विशेष रूप से देखा जा रहा है।
रूलोफ्स ने कहा, कि "मंगल के कम वायु दबाव के कारण यह प्रक्रिया बेहद विस्फोटक हो जाती है।"

उनके मुताबिक, "कार्बन डायऑक्साइड के बर्फ में विस्फोट की वजह से वो बर्फ तेजी से प्रवाहित होती, जिसे ऐसे समझा जा सकता है, कि जब पहाड़ों से चट्टान टूटते हैं, तो उसके मलबे कैसे दूर तक निशान बनाते हुए जाते हैं, मंगल ग्रह पर भी ये प्रक्रिया कुछ इसी तरह की होती है और ये प्रवाह, पानी की अनुपस्थिति में भी मंगल ग्रह के परिदृश्य को नया आकार दे सकते हैं।"
वैज्ञानिकों ने पहले सुझाव दिया था, कि मंगल ग्रह पर भूवैज्ञानिक संरचनाएं कार्बन डाइऑक्साइड बर्फ के उर्ध्वपातन से काफी प्रभावित हो सकती हैं, लेकिन वे सिद्धांत सैटेलाइट डेटा या कंप्यूटर मॉडलिंग पर आधारित थे।
लेकिन, रूलोफ़्स और उनके साथी वैज्ञानिकों ने इस पूरी प्रक्रिया को प्रयोगशाला में "मार्स चैंबर" का इस्तेमाल कर उन परिस्थितियों को बनाकर देखा है और फिर इन परिस्थितियों में कार्बन डाइऑक्साइड बर्फ के उर्ध्वपातन को सीधे देखा और इस नतीजे पर पहुंचे हैं।
उन्होंने कहा, "इस विशेष प्रयोगशाला उपकरण का उपयोग करके, हम सीधे अपनी आंखों से इस प्रक्रिया का अध्ययन कर सकते हैं। हमने यह भी देखा, कि मंगल ग्रह की परिस्थितियों में कार्बन डाइऑक्साइड बर्फ द्वारा संचालित मलबों का प्रवाह उतनी ही कुशलता से बहता है, जितना पृथ्वी पर पानी द्वारा संचालित मलबा प्रवाहित होता है।"
यह शोध पिछले सप्ताह कम्युनिकेशंस अर्थ एंड एनवायरनमेंट जर्नल में प्रकाशित हुआ है।












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