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F-35 और परमाणु ऊर्जा.. सऊदी अरब से ऐतिहासिक समझौते करेगा अमेरिका, बाइडेन के 'झांसे' में फंसेंगे प्रिंस सलमान?

F-35 Stealth Fighters: फारस की खाड़ी में चीन की आक्रामकता से परेशान अमेरिका पिछले कई महनों से सऊदी अरब को F-35 लड़ाकू विमान का लालच दे रहा है और माना जा रहा है, कि अमेरिका और सऊदी अरब में फिफ्थ जेनरेशन लड़ाकू विमान F-35 लाइटनिंग II को लेकर बहुत जल्द डील होने वाली है।

व्हाइट हाउस ने 20 मई को एक बयान में कहा है, कि इस हफ्ते अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैक सुलिवन सऊदी अरब की यात्रा करने वाले हैं और माना जा रहा है, कि इस यात्रा के दौरान दोनों देश, एफ-35 लड़ाकू विमान को लेकर आखिरी समझौते तक पहुंच जाएंगे।

F-35 Stealth Fighters deal

व्हाइट हाउस के नेशनल सिक्योरिटी के प्रवक्ता जॉन किर्बी ने कहा, कि "दोनों देश समझौते के इतने करीब आ गये हैं, जितने करीब पहले कभी नहीं पहुंचे थे" और द्विपक्षीय समझौता होना 'करीब करीब तय' हो गया है।

F-35 लड़ाकू विमान, ललचाए प्रिंस सलमान?

हालांकि, जॉन किर्बी ने संभावित समझौते को लेकर कोई खास जानकारी नहीं दी है, लेकिन ऐसी रिपोर्ट्स हैं, कि यदि सऊदी अरब और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय संबंधों पर हस्ताक्षर किए जाते हैं, तो अमेरिका की कोशिश सऊदी से समझौते के बदले एक औपचारिक गारंटी लेने की होगी, कि वो चीन से किसी भी तरह का हथियार ना खरीदे या फिर उसने चीन से हथियारों को लेकर जो सौदा किया है, वो उसे सस्पेंड कर दे।

अमेरिका के एक अधिकारी के मुताबिक, इस समझौते के तहत अमेरिका, सऊदी अरब को पांचवी पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमान F-35 बेचने के अलावा कई तरह के और रक्षा समझौते के लिए तैयार हो सकता है।

हालांकि, अभी तक अमेरिका ने एफ-35 को लेकर वादा नहीं किया है, लेकिन पेंटागन के अधिकारियों ने कहा है, कि यह महत्वपूर्ण है कि एफ-35 फाइटर जेट पर चर्चा की जाए, क्योंकि रियाद लंबे समय से गुप्त फाइटर जेट चाहता है।

अमेरिका ने अभी तक सऊदी अरब को F-35 सिर्फ इसलिए नहीं बेचा है, क्योंकि इजराइल इस सौदे को लेकर आपत्ति जताता रहा है। अमेरिका और इजराइल के बीच एक लंबे समय से चले आ रहे समझौते में कहा गया है, कि इजराइल को आपूर्ति किए गए अमेरिकी हथियार, इजराइल के पड़ोसियों को बेचे गए हथियारों की तुलना में "बेहतर क्षमता वाले होते" हैं। इसलिए, मिडिल ईस्ट में अमेरिका जो भी हथियार डील करता है, उसमें ये ध्यान रखा जाता है, कि वो इजराइल की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा ना करे।

लेकिन, सऊदी अरब हर हाल में पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान चाहता है और सैन्य पर्यवेक्षकों का मानना है, कि F-35 को लेकर अगर सऊदी अरब के साथ सौदा नहीं किया गया, तो फिर सऊदी अरब उसके विकल्प में फ्रांस से 4.5 जेनरेशन वाले रफाल लड़ाकू विमान या फिर चीन से एफ-31 पांचवी पीढ़ी के विमान के लिए सौदा कर सकता है।

डिफेंस एक्सपर्ट्स का मानना है, कि F-35 डील करने से पहले सऊदी अरब को अमेरिका को ये वचन देना होगा, कि इससे इजराइल की सुरक्षा को खतरा ना हो। वहीं, अगर सऊदी एफ-35 लड़ाकू विमान खरीद लेता है, तो फिर सऊदी अरब अगले कई दशकों के लिए इस लड़ाकू विमान के मेंटिनेंस, ट्रेनिंग, अपडेशन के लिए अमेरिका पर निर्भर हो जाएगा और अमेरिका यही चाहता भी है।

हालांकि, अभी भी इजराइल की तरफ से इस डील को लेकर कोई आश्वासन नहीं दिया गया है और इजराइल ही वो देश है, जो अभी भी एफ-35 लड़ाकू विमान का इस्तेमाल करता है, लिहाजा इस डील को लेकर अब उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी, ये देखने वाली बात होगी। इसके बावजूद, अमेरिका ने बातचीत बंद नहीं की है क्योंकि वह जानता है, कि क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए सऊदी से रक्षा सौदा जरूरी है, और एफ-35 में सऊदी की दिलचस्पी पिछले कई सालों से बनी हुई है।

सऊदी से चीन को दूर भगाना चाहता है अमेरिका

मिडिल ईस्ट में बढ़ते चीनी हथियारों और उसके निवेश ने अमेरिका को चिंतित कर दिया है। 2013 में बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (NRI) की घोषणा के बाद से मध्य पूर्व में चीन की पहुंच तेजी से बढ़ी है। इस क्षेत्र के कई देशों के लिए सबसे बड़े व्यापारिक भागीदार और विदेशी निवेशक के रूप में, चीन सक्रिय रूप से आर्थिक निवेश सौदों की तलाश कर रहा है, खासकर बुनियादी ढांचे में और कनेक्टिविटी परियोजनाओं को लेकर चीन काफी आक्रामक तरीके से आगे बढ़ रहा है।

सऊदी अरब ने भी चीन से हथियार खरीदे हैं। चीनी मीडिया ने कहा है, कि 2022 में सऊदी अरब ने चीन के साथ 4 अरब डॉलर के नए हथियार खरीदने के लिए सौदे किए हैं। और इस सौदे में सशस्त्र ड्रोन, बैलिस्टिक मिसाइल और एंटी-ड्रोन लेजर-आधारित सिस्टम शामिल थे, हालांकि सउदी ने लड़ाकू जेट जैसी महंगी संपत्ति फिलहाल चीन से नहीं खरीदी है।

बीजिंग और रियाद के बीच सैन्य सहयोग लगातार बढ़ रहा है। चीन और सऊदी अरब ने अक्टूबर 2023 में अपना संयुक्त नौसैनिक अभ्यास भी आयोजित किया था, जिसका मकसद विदेशी समुद्री आतंकवाद का मुकाबला करना था।

सऊदी अरब में चीन के भारी निवेश और हथियारों की बिक्री के साथ-साथ उसका राजनयिक प्रभाव भी बढ़ रहा है। पिछले साल सऊदी अरब और ईरान के बीच शांति स्थापित करने में भी चीन कामयाब रहा था। और कई एख्सपर्ट्स ने चेतावनी दी थी, कि मनमुटाव के बाद सऊदी अरब में अमेरिका का जो स्थान खाली हुआ है, चीन उसे भरने की कोशिश कर रहा है।

पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या और बाद में यूक्रेन युद्ध और तेल उत्पादन को लेकर रियाद के रुख के बाद दोनों पारंपरिक सहयोगियों के बीच संबंध निचले स्तर पर पहुंच गए थे। चीन., अमेरिका के साथ सऊदी संबंधों में तनाव को एक घुसपैठ विंडो के रूप में देखता रहा है। हालांकि, मध्य पूर्व में, जो परंपरागत रूप से अमेरिकी गढ़ रहा है, चीन की बढ़ती उपस्थिति ने पेंटागन को परेशान कर दिया है और उसे झुकने के लिए मजबूर किया है। इसलिए, अमेरिका और सऊदी अरब के बीच बातचीत फिर से शुरू हो गई है।

F-35 Stealth Fighters deal

क्या द्विपक्षीय समझौते में डील होना तय है?

अटकलें लगाई जा रही हैं, कि रक्षा समझौता नाटो-शैली के समझौते से थोड़ा कम होगा। नाटो के बाहर के देशों के साथ अमेरिका के लिए औपचारिक रक्षा समझौते सामान्य नहीं हैं। हालांकि, अमेरिका अन्य प्रमुख सहयोगियों के साथ मजबूत सैन्य संबंध बनाए रखता है।

स्थिति से परिचित लोग यह भी सोचते हैं, कि रियाद के साथ आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस जैसी अत्याधुनिक तकनीक साझा करना यूएस-सऊदी सुरक्षा समझौते का हिस्सा होगा।

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में कहा गया है, कि क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान "आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस और क्वांटम कंप्यूटिंग में बड़े अमेरिकी निवेश के बदले में अपने देश के सबसे संवेदनशील नेटवर्क से चीनी टेक्नोलॉजी को सीमित करेंगे और अपने नागरिक परमाणु कार्यक्रम के निर्माण के लिए अमेरिकी मदद लेंगे।"

इसके अलावा, कई रिपोर्ट्स में ये भी कहा गया है, कि सऊदी अरब में सिविल न्यूक्रियर प्रोग्राम को लेकर भी अमेरिका का समर्थन मिल सकता है, हालांकि इससे अमेरिका की घरेलू राजनीति में जरूर विरोध शुरू हो जाएंगे, लेकिन अमेरिका हरगिज नहीं चाहेगा, कि सऊदी अरब में चीन न्यूक्लियर प्रोजेक्ट लेकर आए। जबकि सऊदी अरब के प्रधानमंत्री प्रिंस सलमान अब हर हाल में परमाणु ऊर्जा चाहते हैं, जबकि डर इस बात को लेकर है, कि कहीं प्रिंस सलमान की चाहत परमाणु बम बनाने की तो नहीं है?

हाल ही में एक अमेरिकी अधिकारी को यह कहते हुए रिपोर्ट किया गया था, कि "हम अपने बीच के प्रमुख तत्वों पर समझ के बहुत करीब हैं... हमें निश्चित रूप से उन हिस्सों पर भी काम करना होगा, जो इजरायल और फिलिस्तीनियों से संबंधित हैं, जो कि एक महत्वपूर्ण घटक है।"

पिछले साल, अमेरिका ने सऊदी अरब और इजराइल के बीच शांति स्थापित करने के लिए ठोस प्रयास किए थे। लेकिन, अक्टूबर में इजराइल और गाजा युद्ध शुरू होने के बाद शांति की ये कोशिशें पटरी से उतर गईं।

हालांकि, एक्सपर्ट्स में आशावाद है, कि अमेरिका और सऊदी अरब के बीच जल्द ही एक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए जाएंगे, लेकिन संशयवादियों का मानना है, कि इजराइल के साथ संबंधों को सामान्य बनाने की मांग एक बड़ी बाधा हो सकती है। सऊदी अरब ने मांग की है, कि टिकाऊ युद्धविराम स्थापित करने और एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास करने के लिए हमास के खिलाफ इजरायल का हमला तुरंत रोका जाए।

किर्बी ने कहा, कि यह अनिश्चित है कि संयुक्त राज्य अमेरिका और सऊदी अरब के बीच समझौता कब होगा। लेकिन, ये बातचीत अंततः पटरी पर आने को लेकर बाइडेन प्रशासन आशावादी बना हुआ है।

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