बाइडेन का फोन भी नहीं उठाया, शी जिनपिंग को घर बुलाया, सऊदी अरब ने अमेरिका को मुंह चिढ़ाया

सऊदी अरब ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को रियाद का दौरा करने के लिए आमंत्रित किया है, जबकि, सऊदी अरब क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन का फोन कॉल उठाने से इनकार कर दिया था।

रियाद, मार्च 20: यूक्रेन युद्ध शुरू होने के साथ ही दुनिया की राजनीति काफी तेजी से बदल रही है और बदलते हालात के बीच खाड़ी देशों ने अमेरिका को बहुत बड़ा झटका देने का मन बना लिया है। बदलते हालात के बीच जो बाइडेन की स्थिति ऐसी हो गई है, कि जिस अमेरिकी राष्ट्रपति ने शपथ लेने के बाद सऊदी अरब क्राउन प्रिंस से बात करने से इनकार कर दिया था, वही अमेरिकी राष्ट्रपति इस वक्त प्रिंस सलमान से फोन पर बात करने के लिए बेकरार हैं, जबकि सऊदी अरब ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को देश आने का न्योता दिया है।

शी जिनपिंग को रियाद से न्योता

शी जिनपिंग को रियाद से न्योता

सऊदी अरब ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को रियाद का दौरा करने के लिए आमंत्रित किया है, जबकि, सऊदी अरब क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन का फोन कॉल उठाने से इनकार कर दिया था। वाल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक, शी जिनपिंग की यात्रा इस्लाम के पवित्र महीने रमजान के बाद होने की संभावना है, जो अप्रैल की शुरुआत में शुरू होता है। अखबार ने कहा कि, सऊदी अधिकारी 2017 में तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को दिए गए रिसेप्शन को दोहराने की उम्मीद कर रहे हैं, जब उन्होंने 2017 में सऊदी अरब का दौरा किया था।

शी जिनपिंग को सऊदी ने बताया दोस्त

शी जिनपिंग को सऊदी ने बताया दोस्त

वहीं, शी जिनपिंग को रियाद आमंत्रित करने को लेकर सऊदी अरब के एक अधिकारी ने कहा कि, 'क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और शी जिनपिंग करीबी दोस्त हैं और दोनों नेता इस बात को समझते हैं, कि दोनों देशों के बीच मजबूत संबंधों की काफी संभावनाएं हैं।" सऊदी अधिकारी ने कहा कि, "ये संबंध ऐसा नहीं है, कि 'वे हमसे तेल खरीदते हैं, और हम उनसे हथियार खरीदते हैं।' अमेरिकी अधिकारी ने 8 मार्च को एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, कि यूक्रेन युद्ध के दौरान तेल संकट में फंसे अमेरिका को बचाने के लिए व्हाइट हाउस की तरफ से सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के नेताओं को फोन किया था, लेकिन दोनों नेताओं ने अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने टेलीफोन पर बात करने से इनकार कर दिया था।

तेल कीमतों को करना चाहते थे नियंत्रित

तेल कीमतों को करना चाहते थे नियंत्रित

अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि, राष्ट्रपति जो बाइडेन के फोन कॉल का उद्येश्य, यूक्रेन के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन का निर्माण करना और तेल की कीमतों में बढ़ोतरी को सीमित करना था। अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और यूएई के शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान, दोनों ने हाल के हफ्तों में बाइडेन से बात करने के अमेरिकी अनुरोधों को अस्वीकार कर दिया। दरअसल, अमेरिका चाहता है कि, सऊदी अरब तेल का प्रोडक्शन बढ़ाए, ताकि तेल की कीमत को नियंत्रित किया जा सके, लेकिन सऊदी अरब ने ऐसा करने से इनकार कर दिया है। वहीं, सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, अगले हफ्ते अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन भी सऊदी अरब की यात्रा पर जा सकते हैं और माना जा रहा है, कि वो अमेरिकी राष्ट्रपति का संदेश सऊदी क्राउन प्रिंस को देंगे।

बाइडेन का फोन ठुकराया, पुतिन से की बात

बाइडेन का फोन ठुकराया, पुतिन से की बात

सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के नेताओं ने राष्ट्रपति जो बाइडेन से फोन पर बात करने से इनकार कर दिया था, जबकि ठीक उसके बाद सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और यूएई के प्रधानमंत्री ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से टेलीफोन पर बात की थी, जिसमें यूक्रेन संकट पर चर्चा की गई थी। एक अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि, ''हमें एक टेलीफोन कॉल की उम्मीद थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ'। आपको बता दें कि, इससे पहले राष्ट्रपति बनने के बाद जो बाइडेन ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से बात करने से इनकार कर दिया था, लेकिन अभी वो सऊदी क्राउन से बात करने के लिए बेकरार हैं।

सऊदी को लेकर बदली पॉलिसी

सऊदी को लेकर बदली पॉलिसी

साफ है कि सऊदी अरब के प्रति अमेरिकी नीति में नरमी आ रही है। दरअसल, पिछले हफ्ते 81 लोगों की सऊदी अरब की सामूहिक फांसी की भी अमेरिका ने अभी तक निंदा नहीं की है। ट्रम्प प्रशासन द्वारा छोड़े गए 2015 के परमाणु समझौते को बहाल करने के लिए ईरान के साथ अमेरिकी वार्ता ने यूक्रेन संकट को पहले ही निर्धारित कर दिया था। लेकिन यह निश्चित रूप से पुतिन के आक्रमण के बाद काफी तेज हो गया है। यूरोप इस वक्त युद्ध में फंसा हुआ है और अमेरिका के लिए इस वक्त तेल की कीमतों को स्थिर रखना काफी बड़ी चुनौती है। इसके साथ ही अमेरिका और चीन के बीच यूक्रेन संकट के बाद तनाव और बढ़ चुके हैं और ऐसे वक्त में खाड़ी देशों का चीन और रूस के खेमे में जाना अमेरिका के लिए कतई शुभ संकेत नहीं हैं।

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