Satya Mohan Joshi की अंतिम इच्छा, 13वीं शताब्दी के बौद्ध देवता का मुरल सहेजना, जानिए क्यों है इतना विशेष
Satya Mohan Joshi नेपाल के युग पुरुष के रूप में जाने जाते थे। 103 साल का आयु में चिरनिद्रा में सोए शताब्दी पुरुष सत्यमोहन जोशी की अंतिम इच्छा गूढ़ बौद्ध देवता के भित्ति चित्र का संरक्षण था। Satya Mohan Joshi last wish es
इतिहासकार Satya Mohan Joshi हमारे बीच नहीं रहे। नेपाल में कई कलाकार विगत कुछ महीनों से बौद्ध तांत्रिक देवता चक्रसंवर की पेंटिंग तैयार कर रहे हैं। इसकी पृष्ठभूमि में नेपाल के प्रसिद्ध इतिहासकार और युग पुरुष- सत्य मोहन जोशी की अंतिम इच्छा है। ANI की रिपोर्ट के मुताबिक छह कलाकार 22 गुणा 5.5 फीट आकार के चक्रसंवर के पौभा (Paubha of Chakrasamvara) को सावधानीपूर्वक चित्रित कर रहे हैं। बता दें कि चक्रसंवर के पौभा बौद्ध धर्म के एक शक्तिशाली देवता हैं जो नेपाल के साथ तिब्बत और मंगोलिया में बेहद लोकप्रिय हैं।

नेपाल की स्वदेशी कला
चक्रसंवर के पौभा का मुरल संरक्षित करने संबंधी रिपोर्ट में समाचार एजेंसी ने बताया, छह कलाकार सुबह से शाम तक विलुप्त होने जा रही इस कला को बचाने में जुटे हैं। ये आर्टपीस तैयार होने के बाद मुरल "नेपाल की स्वदेशी कला परंपराओं, प्रथाओं और विधियों" का प्रतिनिधि होगा। आर्टपीस तैयार करने में छह कलाकार जी तोड़ मेहनत कर रहे हैं।
नेपाल के शताब्दी पुरुष की भूमिका
बता दें कि Rashtriya Naach Ghar में भी जोशी की अहम भूमिका रही है। द कॉइनेज ऑफ नेपाल (The Coinage of Nepal), करनाली को लोक संस्कृति (Karnali ko Lok Sanskriti), मृत्यु एक प्रसन्ना (Mrityu Ek Prasna) और महर्षि याज्ञवल्क्य (Maharshi Yagyabalkya) जैसी पुस्तकें जोशी की प्रमुख रचनाओं में शामिल हैं। नेपाल की सांस्कृतिक विविधता के बारे में जोशी का ज्ञान गहरा था। सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में कई विशेषज्ञों ने उन्हें इतिहास और कला संस्कृति के क्षेत्र में कलाप्रवीण (virtuoso) हस्ती के रूप में जाने जाते हैं।

जानकारी न होने पर कामुक एहसास कराता है Mural
जो लोग बौद्ध देवता से परिचित नहीं हैं, ऐसे लोगों को कैनवस पर चित्रित किया जा रहा भित्ति चित्र लोगों को एक कामुक एहसास कराता है। मुरल या भित्ति को देखने पर ऐसा लगता है कि चक्रसंवर- एक गूढ़ /गुप्त देवता (Chkrasamvara- an esoteric deity) अपनी योगिनी पत्नी वज्रवरही (Vajravarahi) को गले लगा रहे हैं। Vajrayana का अभ्यास करने वाले लोग इन्हें गूढ़ देवता (esoteric deity) मानते हैं।
दुर्लभ कला को सहेजने का प्रयास
इतिहासकार Satya Mohan Joshi की आखिरी इच्छा नेपाल की इस दुर्लभ कला और मुरल यानी भित्ति को सहेजना था। इस संबंध में आर्टपीस तैयार करने में जुटे राबिन महारजन ने बताया कि "मूल रूप से हमने इसे दीवार पर पेंट करने की योजना बनाई थी ताकि राहगीर इसे देख सकें। लेकिन बारिश या भूकंप या किसी अन्य संभावित घटनाओं का ख्याल आने पर मुरल को सहेजने के ख्याल से कैनवास पर एक भित्तिचित्र बनाने का फैसला लिया गया। मुरल में जिन रंगों का उपयोग किया जा रहा है, वे प्राकृतिक रंग हैं। इन्हें निकाला जा सकता है। अगर हम ड्राइंग के समय को भी जोड़ दें तो आर्टपीस तैयार करने में पांच महीने से अधिक समय लग चुका है। सभी कलाकार इसे तैयार करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं।
किस आकार का है आर्ट पीस
कैनवास के एक तरफ से दूसरी तरफ फैले भित्ति चित्र का आकार कितना बड़ा है, इसका अंदाजा इसी बात से होता है कि खिड़की के सामने वाली दीवार के एक हिस्से को यह आर्टपीस पूरा कवर करता है। केंद्र में चक्रसंवर की एक पेंटिंग है। कलाकारों ने देवता के परिवार के अन्य सदस्यों को भी शामिल किया है। इसका मकसद मुरल को और अधिक जीवंत और सूचनात्मक (lively and informative) बनाना है।
देवता गुप्त, सभी लोगों को पूजा की अनुमति नहीं
ऐसा माना जाता है कि गूढ़ देवता चक्रसंवर के भित्ति चित्र को केवल वे लोग ही समझ सकते हैं जिन्होंने Dekha (गूढ़ दीक्षा) प्राप्त की है। ऐसे लोग ही चक्रसंवर की पूजा करने के लिए देवता के कक्ष में प्रवेश कर सकते हैं। मुरल तैयार कर रहे महाराजन ने बताया, बौद्ध धर्म के वज्रयानतंत्र में, चक्रसंवर की पूजा मुख्य देवता के रुप में होती है। चक्रसंवर देवता को नेपाल में गूढ़ / गुप्त (esoteric) माना जाता है। गूढ़ होने का मतलब आर्टपीस या मुरल जनता को नहीं दिखाई जानी चाहिए क्योंकि इसकी व्यापक रूप से गलत व्याख्या की जाएगी। हालांकि, हम इसे फिर से बना रहे हैं ताकि जो इस विषय पर शोध और इसे संरक्षित कर रहे लोगों को सूचनाएं मिलें।
चक्रसंवर किन लोगों के बीच पॉपुलर
बौद्ध धर्म के विशेषज्ञों का कहना है कि चक्रसंवर तांत्रिक बौद्ध धर्म (Tantric Buddhism) में एक दर्शन का प्रतिनिधित्व करता है। ये द्वैत से रहित है और प्रबुद्ध ज्ञान (enlightened knowledge) का प्रतिनिधित्व करता है। तैयार की जा रही भित्ति चक्रसंवर और वज्रवरही के मिलन के माध्यम से करुणा और ज्ञान के मिलन को चित्रित करने के दर्शन का संदेश देती है। चक्रसंवर नेवा के साथ-साथ तिब्बती बौद्ध धर्म में व्यापक रूप से प्रतिष्ठित है।
Mural में पारंपरिक तकनीक का उपयोग
कलाकारों का मानना है कि mural of esoteric Buddhist god के पूरा होने पर, सदियों से बारीकी से संरक्षित किया गया तंत्र सार्वजनिक क्षेत्र में आ जाएगा। ऐसा होने पर इसके मूल्य में वृद्धि के साथ-साथ इसे संरक्षित करने के लिए जागरूकता भी बढ़ेगी। गत पांच महीनों से mural of esoteric Buddhist god को तैयार करने में शिद्दत से जुटे कलाकार अंतिम हिस्से में पाउभा (paubha) बनाने की पारंपरिक तकनीक का उपयोग कर रहे हैं। इसमें खनिज रंग का उपयोग करना भी शामिल है। इससे मुरल समृद्ध बनता है और लंबे समय तक टिकता भी है।
13वीं शताब्दी की पद्धति का इस्तेमाल
एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक छह लोगों की टीम में शामिल एक अन्य कलाकार लक्ष्मी शाक्य ने बताया, esoteric Buddhist god का मुरल तैयार करने के दौरान हम पूरी प्रक्रिया के लिए खनिज रंगों का उपयोग कर रहे हैं। माना जाता है कि इस प्रकार के रंग 13 वीं शताब्दी के 'चित्रकार' और कलाकारों द्वारा व्यापक रूप से उपयोग किए जाते थे। उन्होंने कहा, प्राचीन काल से पाउभा बनाते समय इस्तेमाल किए जाने वाले एक्रिलिक रंगों से खनिज रंग अलग होते हैं। इसमें पीले रंग के लिए हरिताल (yellow pigment harital) का इस्तेमाल होता है जो arsenic का एक प्रकार होता है।
रंगों के लिए खनिजों का इस्तेमाल
खनिज रंग की प्रक्रिया में ज्यादातर, हरे रंग के लिए मैलाकाइट (malachite for green), लाल रंग के लिए सिमरिक (simrik for red), नीले रंग के लिए इंडिगो (indigo for blue), काले रंग के लिए गजल (Gajal for black) और सफेद के लिए शैल पाउडर (shell powder for white) का उपयोग किया जाता है।
कितना पैसा खर्च होगा, अब तक कितना जमा हुआ
कलाकारों का अनुमान है कि esoteric Buddhist god का मुरल पूरी तरह तैयार होने में लगभग 4.23 मिलियन नेपाली रुपये खर्च होने की उम्मीद है। परियोजना के लिए अनुमानित अपेक्षित बजट का 25 प्रतिशत जमा किया जा चुका है। भारतीय करेंसी में ये अमाउंट 25 लाख रुपये से अधिक होती है।
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