Russia-Ukraine isuue:पहली बार संकट टलने के संकेत, क्यों युद्ध जैसे बन गए थे हालात ? जानिए

नई दिल्ली, 15 फरवरी: यूक्रेन पर रूस के आक्रमण का संकट फिलहाल टल गया लगता है। रूस ने यूक्रेन सीमा पर से अपने सैनिकों की तैनाती कम करनी शुरू कर दी है। पिछले कुछ दिनों में जोरदार कूटनीतिक प्रयासों को लगता है कि सफलता मिली है। वैसे कुछ अंतरराष्ट्रीय एक्सपर्ट पहले से कह रहे थे कि रूस की यह दबाव बनाने की नीति है, जिससे वह यूक्रेन के नाम पर पश्चिमी देशों के साथ कुछ डील करना चाहता है। बहरहाल, सैनिकों की वापसी का कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया है। इससे पहले तक अमेरिका ने ऐसा माहौल बनाया था कि रूस अब किसी भी पल यूक्रेन पर आक्रमण करने वाला है और उसने भी इलाके में अपने हजारों सैनिकों को उतारना शुरू कर दिया था।

पहली बार रूस-यूक्रेन युद्ध टलने के संकेत

पहली बार रूस-यूक्रेन युद्ध टलने के संकेत

पहली बार यूक्रेन सीमा पर तैनात अपने सैनिकों की तैनाती कम करने की बात कहकर रूस ने युद्ध के मंडरा रहे संकट के टलने का संकेत दे दिया है। गौरतलब है कि यूक्रेन सीमा पर रूस ने पिछले कई महीनों से लगभग 1,00,000 सैनिकों को तैनात कर रखा है। बुधवार को रूसी न्यूज एजेंसी ने कहा है कि 'टास्क पूरा करने के बाद' उसकी सेना अपनी बेस में लौट रही है। रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जखारोवा ने लिखा है, '15 फरवरी इतिहास में दर्ज हो जाएगा, क्योंकि इस दिन पश्चिम का युद्ध वाला प्रोपेगेंडा फेल हो गया।' उन्होंने आगे लिखा, 'बिना एक शॉट फायर के शर्मिंदा और तबाह।'

रूस ने पश्चिमी देशों पर कसा तंज

रूस ने पश्चिमी देशों पर कसा तंज

हालांकि, रूस ने कितनी सेना वापस की है, यह अभी साफ नहीं है, लेकिन पहली बार रूस ने शांति के संकेत जरूर दिए हैं। यह घोषणा ऐसे वक्त में की गई है, जब रूस की सेना की यूक्रेन के नजदीक खतरनाक तैनाती की सैटेलाइट तस्वीरें सामने आ चुकी हैं और लग रहा था कि किसी भी वक्त रूस यूक्रेन पर हमला बोलने वाला है। रूस ने कहा है कि उसने बेलारूस और अपने दूसरे पड़ोसी मुल्कों में युद्धाभ्यास के लिए सेना भेजी थी, लेकिन पश्चिम शक्तियां यह मान बैठी थी कि यह सेना यूक्रेन पर आक्रमण के लिए तैनात की गई है। रूस की घोषणा के साथ ही अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार ने राहत की सांस ली है। हालांकि, इस संकट को टालने के लिए युद्धस्तर पर किए गए कूटनीतिक प्रयासों का ही ये असर लग रहा है कि रूस का टोन डाउन हुआ है, जिसपर पाबंदियों की तलवार भी लटक रही थी। हालांकि, रूस अभी भी इस बात पर डटा है कि नाटो यह भरोसा दे कि वह यूक्रेन को कभी अपना सदस्य नहीं बनाएगा और साथ ही पूर्वी यूरोपीय देशों से अपनी मौजूदगी को कम करेगा।

रूस-यूक्रेन के बीच कैसे बन गए थे युद्ध जैसे हालात ?

रूस-यूक्रेन के बीच कैसे बन गए थे युद्ध जैसे हालात ?

रूस ने पिछले कुछ महीनों से अनुमानित 1,00,000 से ज्यादा सैनिकों की तैनाती यूक्रेन की तीन सीमाओं पर कर दी थी। मध्य जनवरी से उसने अपनी सेना बेलारूस भी भेजनी आरंभ की थी, जिसकी सीमाएं रूस और यूक्रेन दोनों से मिलती हैं। इसके बारे में रूस की ओर से कहा जा रहा था कि यह फरवरी में साझा युद्धाभ्यास के लिए है। उधर अमेरिका ने भी यूक्रेन के पड़ोसी मुल्कों पोलैंड और रोमानिया में कई हजार सैनिक भेज दिए थे। अमेरिका बार-बार कह रहा था कि रूस किसी भी दिन यूक्रेन पर हमला कर सकता है। उसने तो 12 फरवरी को यूक्रेन की राजधानी कीव स्थित अपने दूतावास से अधिकतर कर्मचारियों को भी वापस आने को भी कह दिया था।

यूक्रेन और रूस के बीच फसाद का कारण

यूक्रेन और रूस के बीच फसाद का कारण

30 साल पहले जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो यूक्रेन को आजादी मिली। लेकिन, यह तीन दशकों बाद भी भ्रष्टाचार और आंतरिक गतिरोध से नहीं उबर पाया। इसका पश्चिमी इलाका आमतौर पर पश्चिमी यूरोप का हिमायती रहा है तो पूर्वी भाग सांस्कृतिक और भाषाई तौर पर रूस से प्रभावित है। फरवरी, 2014 में दोनों देशों में तनाव तब चरम पर पहुंच गया, जब हिंसक विरोध के बाद यूक्रेन के रूस-समर्थक राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच को अपदस्थ कर दिया गया। लगभग उसी समय रूस ने क्रीमिया पर कब्जा कर लिया। यूक्रेन की अस्थाई सरकार और कमजोर सेना से उसकी स्थिति और खराब हो गई। व्लादिमीर पुतिन ने फौरन पूर्वी यूक्रेन के डोनबास क्षेत्र पर निशाना साध दिया। यूक्रेन सरकार की सेना और रूस समर्थित अलगवादियों के बीच लड़ाई में 14,000 से ज्यादा लोग मारे गए।

यूक्रेन पर इसका क्या प्रभाव पड़ा ?

यूक्रेन पर इसका क्या प्रभाव पड़ा ?

रूस ने जिस तरह से यूक्रेन के मामलों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आक्रामक दखल दिया, उसके बाद यूक्रेन की जनता का समर्थन पाकर वहां की सरकार ने कहा कि 2024 में वह यूरोपियन यूनियन की सदस्यता के लिए आवेदन देगा और उसने नाटो की सदस्यता लेने का भी इरादा जाहिर किया। यूक्रेन की एक न्यूज साइट आरबीसी-यूक्रेन के मुताबिक एक सर्वे में पाया गया कि सिर्फ 15 फीसदी लोग ही पुतिन को लेकर सकारात्मक सोचते हैं। रूस इन सबकी वजह से पूरी तरह से भड़क गया।

रूस, यूक्रेन को लेकर आशंकित हो गया ?

रूस, यूक्रेन को लेकर आशंकित हो गया ?

रूसी राष्ट्रपति की नीति एक तरह से यूक्रेन को रूस के प्रभाव वाले इलाके के तौर पर देखने जैसी रही है। रूस नहीं चाहता कि यूक्रेन नाटो जैसे संगटन में शामिल होने जैसा फैसला करने की हिमाकत करे। यही वजह है कि उसने यह कोशिशें शुरू कर दी कि वह ना तो यूरोपियन यूनियन में शामिल हो और ना ही नाटो की सदस्यता ग्रहण करे। रूसी राष्ट्रपति पर मुखर होते घरेलू विरोध का भी असर रहा है। क्योंकि, एक साल पहले वहां सरकार विरोधी जो प्रदर्शन हुए, वो वर्षों तक नहीं देखे गए हैं। इसके अलावा वे यूक्रेन को वो पश्चिमी देशों के खिलाफ एक हथियार के तौर पर भी इस्तेमाल करने की कोशिश में रहे हैं, ताकि उसपर और उसके संभावित सहयोगियों पर पश्चिमी देशों की ओर से पहले से लगे आर्थिक और वित्तीय पाबंदियों को हटवा सकें। मौजूदा संकट को बढ़ाकर रूस को इसके लिए कूटनीतिक तोल-मोल का अवसर हासिल करना था, शायद उसने वह हासिल कर लिया है।

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