क्वाड और ब्रिक्स... भारत को क्यों और कैसे लुभा रहे हैं चीन और अमेरिका, क्या करेगी मोदी सरकार?
अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ भारत क्वाड संगठन में शामिल है, जबकि, भारत ब्रिक्स संगठन में भी शामिल है, जो क्वाड का विरोधी माना जाता है। इन दोनों संगठनों में शामिल होना भारत की अहमियत को दर्शाता है।
नई दिल्ली, जून 14: अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में सबसे प्रचलित वाक्य ये है, कि हर देश को अपना हित देखना चाहिए और यूक्रेन युद्ध के बाद अंतर्राष्ट्रीय राजनीति काफी तेजी के साथ बदली है। ताकतवर होने के बाद चीन अपने लिए एक अलग ब्लॉक का निर्माण करना चाहता है, जबकि अमेरिका की कोशिश अपने लिए एक अलग ब्लॉक के निर्माण की है। अमेरिका के साथ यूरोपीय देश खड़े हैं, तो चीन के पाले में रूस है। लिहाजा, गुटनिरपेक्ष देश भारत की भूमिका इन गुटों के बीच काफी बढ़ जाती है और दोनों गुट भारत को लुभाने की कोशिश में बढ़-चढ़कर लगे हुए हैं।

क्वाड और ब्रिक्स, दोनों में भारत
अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ भारत क्वाड संगठन में शामिल है, जबकि, भारत ब्रिक्स संगठन में भी शामिल है, जो क्वाड का विरोधी माना जाता है। इन दोनों संगठनों में शामिल होना भारत की अहमियत को दर्शाता है और ये दोनों ही संगठन चाहते हैं, कि भारत उनके साथ बना रहे। वहीं, भारत दोनों संगठनों में शामिल होने के बाद भी संगठन से अलग अपनी राय रखता है। यूक्रेन युद्ध पर जहां क्वाड के बाकी देशों की राय बिल्कुल अलग थी, वहीं भारत ने रूस की आलोचना करने से साफ इनकार कर दिया। वहीं, विशेषज्ञों का कहना है कि, ब्रिक्स भी अपने जोर के साथ आगे बढ़ रहा है, जिसमें भारत के अलावा चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका हैं।

ब्रिक्स संगठन को जानिए
आपको ये जानकर हैरानी होगी, कि ब्रिक्स का कंसेप्ट, ब्रिक्स संगठन में शामिल किसी देश से नहीं, बल्कि एक ब्रिटिश अर्थशास्त्री से आया था। ब्रिक्स संगठन का गठन साल 2006 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन ने किया था और साल 2011 में इस संगठन में दक्षिण अफ्रीका को जोड़ा गया था। शुरूआत में ब्रिक्स संगठन का महत्व विकसित हो रही इन अर्थव्यवस्थाओं को लेकर था, जो पांच बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के महत्व को दर्शाता था, लेकिन चीन और रूस के होने के चलते ये संगठन धीरे धीरे अमेरिका का प्रतिद्वंदी बन गया, जबकि भारत ब्रिक्स सहयोगियों के विचार से अलग अपने न्यूट्रल पॉजीशन पर कायम रहा। हालांकि, अब ब्रिक्स की बैठक काफी मुश्किस से अंतर्राष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खींच पाता है, लेकिन अभी भी चीन की अध्यक्षता में ब्रिक्स देश इकट्ठा होते हैं। लेकिन, इस साल के अंत में प्रस्तावित ब्रिक्स सम्मेलन अभी से ही सुर्खियां बटोर रहा है, क्योंकि इसमें रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन शामिल होंगे, जबकि भारतीय पीएम नरेन्द्र मोदी के शामिल होने पर सस्पेंस बना हुआ है।

क्वाड बनाम ब्रिक्स
क्वाड से तुलना करने पर ब्रिक्स पूरी तरह से एक आर्थिक मंच नजर आता है। क्वाड ग्रुप का गठन साल 2007 में तत्कालीन जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने किया था, जिसका मकसद ग्लोबल जियो पॉलिटिक्स को एक नया मंच प्रदान करना था, जिसमें क्वाड के चारों देशों के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास और इंडो-पैसिफिक में चीन को काउंटर करने के लिए संयुक्त नीति काम करना था, ताकि एक स्वतंत्र और खुले इंडो-पैसिफिक का निर्माण हो सके। लिहाजा, क्वाड को सीधे तौर पर चीन अपने खिलाफ मानता है और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग साफ कह चुके हैं, कि क्वाड चीन के खिलाफ बनाया गया एक सैन्य संगठन है, जिससे भारत लगातार इनकार करता रहा है।

जियोपॉलिटिक्स में गेमचेंजर बना क्वाड
साल 2007 में क्वाड के गठन के ठीक बाद ऑस्ट्रेलिया में प्रधानमंत्री केविन रूड के नेतृत्व में नई सरकार का गठन किया गया और उसके साथ ही क्वाड 'शांत' पड़ गया। ऑस्ट्रेलिया ने अनपेक्षित चीनी टकराव को ध्यान में रखते हुए शांत रहना ज्यादा सही समझा। क्वाड को पुनर्जीवित करने में 10 साल और लगे, इस बीच कई नए ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री बदले। व्हाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रम्प के आने के बाद फिर से जापान के के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास फिर से शुरू हुआ। राष्ट्रपति जो बाइडेन ने तब क्वाड को और भी अधिक जोर और अधिक औपचारिकता दी, जब पिछले साल दो बार क्वाड देशों की बैठक की मेजबानी अमेरिका ने की और साल 2022 में भी क्वाड की दो बार बैठक हो चुकी है। इसमें कोई शक नहीं है कि जो बाइडेन, फुमियो किशिदा, नरेंद्र मोदी और अब एंथनी अल्बनीज को एक साथ मिलते देखना, क्वाड को भू-राजनीतिक गेम-चेंजर की तरह बनाता है।

ब्रिक्स और क्वाड के बीच भारत
इस वक्त ब्रिक्स का चेयरमैन चीन है और वो चाहता है कि, ब्रिक्स की बैठक में पीएम मोदी शामिल हों। लेकिन, भारत की तरफ से साफ कहा गया है कि, जब तक लद्दाख का मुद्दा नहीं सुलझाया जाता, पीएम मोदी का दौरा मुश्किल है। वहीं, जून 2020 में चीन के साथ गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प ने भारत को सोचने के लिए मजबूर किया है, कि भारत को अन्य प्रमुख इंडो-पैसिफिक लोकतांत्रिक देशों के साथ घनिष्ठ सुरक्षा मित्रता बनाए रखना कितना जरूरी है। वहीं, ब्रिक्स मंत्रिस्तरीय बैठकों और अन्य कार्यक्रमों के काफी गहन वार्षिक कार्यक्रम से पता चलता है कि, भले ही इस समूह को अंतरराष्ट्रीय मीडिया द्वारा बड़े पैमाने पर नजरअंदाज कर दिया गया हो, फिर भी इसने पांच सदस्य देशों के बीच परामर्श और सहयोग के लिए मिलते रहते हैं। और यह कुछ ऐसा है, जिसे क्वाड ने अभी तक हासिल नहीं किया है।

क्या क्वाड का फंक्शन आक्रामक है?
क्वाड की बैठक में जो बातें की जाती हैं, वो काफी आक्रामक होती हैं, लेकिन क्या क्वाड के एक्शन आक्रामक होते हैं? इसका जवाब इस बात से समझा जा सकता है, कि मार्च 2021 में हुई क्वाड की बैठक में फैसला लिया गया कि, एक अरब 20 करोड़ कोविड वैक्सीन इंडो-पैसिफिक देशों में भेजा जाएगा और अमेरिका इसके लिए पैसा खर्च करेगा और भारत में वैक्सीन का निर्माण होगा, जबकि जापान और ऑस्ट्रेलिया की अलग अलग जिम्मेदारियां थीं। क्वाड की इस घोषणा ने सभी अंतर्राष्ट्रीय अखबारों में हडलाइंस बनाईं। लेकिन, हकीकत ये था, कि अप्रैल 2022 में जाकर पहली बार कंबोडिया तक क्वाड के जरिए सवा तीन लाख वैक्सीन की खुराक पहुंची। यानि, एक साल बात एक देश में कोविड वैक्सीन पहुंची, वो भी महज सवा तीन लाख। और अब, क्वाड ने मई के अंत में टोक्यो शिखर सम्मेलन में "समुद्री डोमेन जागरूकता के लिए इंडो-पैसिफिक पार्टनरशिप" नामक एक निकाय की स्थापना में सहयोग करने का वादा किया है, मुख्य रूप से इंडो-पैसिफिक में अवैध मछली पकड़ने पर नज़र रखने और संभावित रूप से प्राकृतिक और मानवीय रूप से संयुक्त रूप से प्रतिक्रिया देने के लिए इसका निर्माण किया गया है, लेकिन ये कितना असरदार होगा, इसपर सवाल है।

क्वाड के रास्ते में ब्रिक्स है कांटा?
एक तरफ क्वाड है तो दूसरी तरफ ब्रिक्स और दोनों में भारत है। ब्रिक्स देशों में चीन और रूस हैं, जो तानाशाह शासन के लिए जाने जाते हैं और इन दोनों देशों की अंतर्राष्ट्रीय विश्वसनीयत काफी खराब हो चुकी है, लिहाजा ये दोनों देश भारत को ब्रिक्स में जोड़कर रखना चाहते हैं, जबकि विशेषज्ञों का कहना है कि, क्वाड तबतक असरदार नहीं होगा, जबतक भारत ब्रिक्स से बाहर नहीं निकल आता है। वहीं, भारत ने क्वाड संगठन के खिलाफ जाकर अभी तक रूस की आलोचना नहीं की है, जिससे क्वाड देश असहज हुए हैं। लिहाजा, अब ये मोदी सरकार पर निर्भर करता है, कि भारत किस रास्ते अपने सफर की शुरूआत करता है और आने वाले वक्त में भारत की जियोपॉलिटिक्स क्या रहने वाली है?












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