रूसः पुतिन गोर्बाचोफ़ की अंत्येष्टि में जा नहीं सकते या जाना नहीं चाहते?

मिखाइल गोर्बाचोफ़ (बाएं) और व्लादिमीर पुतिन
EPA
मिखाइल गोर्बाचोफ़ (बाएं) और व्लादिमीर पुतिन

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन सोवियत दौर के आख़िरी नेता मिखाइल गोर्बाचोफ़ की अंत्येष्टि में शामिल नहीं होंगे. राष्ट्रपति कार्यालय के प्रवक्ता दिमित्रि पेसकोव ने बताया कि व्यस्तता की वजह से पुतिन इस गोर्बाचोफ़ को अंतिम विदाई देने नहीं पहुँच पाएंगे. गोर्बाचोफ़ को शनिवार को मॉस्को की कब्रगाह में दफ़नाया जाएगा.


पेसकोव ने बताया कि रूसी राष्ट्रपति ने अस्पताल पहुँचकर गोर्बाचोफ़ को श्रद्धांजलि दे दी है, जहां मंगलवार को उनका 91 साल की उम्र में निधन हो गया था.

गोर्बाचोफ़ के सुधारों ने पश्चिम देशों के साथ शीत युद्ध को ख़त्म करवाने में सहायता की थी लेकिन वो सोवियत संघ को विघटन से बचा नहीं सके. गोर्बाचोफ़ की दुनियाभर में प्रशंसा होती है लेकिन उन्हें अपने देश में ही निंदा भी झेलनी पड़ी.

सोवियत के विघटन को कई मौकों पर पुतिन त्रासदी बता चुके हैं. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या वाक़ई अपने व्यस्त कार्यक्रम की वजह से पुतिन सोवियत या यूएसएसआर के आख़िरी नेता की अंत्येष्टी में नहीं जा रहे या फिर वो समय निकालना नहीं चाहते.

साल 2005 में रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने यूएसएसआर के विघटन को "20वीं सदी की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक आपदा बताया था."

माना जाता है कि पुतिन और गोर्बाचोफ़ के बीच रिश्ते कभी अच्छे नहीं रहे. दोनों नेताओं की आख़िरी मुलाक़ात कथित तौर पर वर्ष 2006 में हुई थी.

हालांकि, पुतिन ने टेलीग्राम के ज़रिए गोर्बाचोफ़ के परिवार को जो शोक पत्र भेजा उसमें सोवियत नेता को ऐसा राजनेता बताया, जिन्होंने दुनिया के इतिहास में गहरी छाप छोड़ी.

गुरुवार को रूस के सरकारी टीवी चैनल पर अस्पताल में पुतिन को गोर्बाचोफ़ के शव के पास लाल गुलाब रखते दिखाया गया.

गोर्बाचोफ़
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गोर्बाचोफ़

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पेसकोव ने मीडिया से कहा, "दुर्भाग्य से, राष्ट्रपति अपनी व्यस्तता की वजह से 3 सितंबर को श्रद्धांजलि देने नहीं जा सकेंगे, इसलिए वो आज ही अस्पताल पहुँचे हैं."

गोर्बाचोफ़ के पार्थिव शरीर को मॉस्को के हॉल ऑफ़ कॉलम्स में अंतिम विदाई के लिए रखा जाएगा. इसके बाद उन्हें शहर की नोवोदेविची कब्रगाह में उनकी पत्नी रइसा की कब्र के बगल में दफ़नाया जाएगा.

पुतिन के इस कार्यक्रम में शामिल होने पर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि गोर्बाचोफ़ को पूरे राजकीय सम्मान के साथ आख़िरी विदाई दी जाएगी या नहीं, इसपर अस्पष्टता बरकरार है.

पेसकोव ने कहा कि गोर्बाचोफ़ के अंतिम विदाई समारोह में राजकीय सम्मान के कुछ "तत्व" होंगे और सरकार इस समारोह को आयोजित करने में मदद कर रही है.

गोर्बाचोफ़ और पुतिन
Getty Images
गोर्बाचोफ़ और पुतिन

इस समारोह में न जाने वाले पुतिन अकेले बड़े नेता नहीं हैं. ऐसे नेताओं की फेहरिस्त भी बड़ी है जिन्हें इस समारोह में आना था लेकिन रूस में प्रतिबंधित होने की वजह से वो नहीं आ सकेंगे.

यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद पश्चिमी देशों की ओर से लगाए प्रतिबंधों के जवाब में रूस ने कुछ शीर्ष नेताओं पर बैन लगाया था.

इस सूची में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन, ब्रितानी पीएम बोरिस जॉनसन सहित अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ, जापान और कनाडा के शीर्ष नेताओं का नाम है.

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल ऋषि सुनक और लिज़ ट्रस भी रूस नहीं जा पाएंगे.

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पुतिन जा नहीं सकते या जाना नहीं चाहते-विश्लेषण

स्टीव रोज़नबर्गरूसी मामलों के संपादक, बीबीसी

आज रूस की सत्ता पर काबिज़ लोगों की नज़रों में मिख़ाइल गोर्बाचोफ़ को एक कमज़ोर नेता के तौर पर देखा जाता है.

एक ऐसा नेता जिनके ढुलमुल रवैये ने दुनिया पर रूस जैसी महाशक्ति के दबदबे को हाथों से फिसलने दिया.

इसके अलावा पुतिन मिखाइल गोर्बाचोफ़ की विरासत को नष्ट करने में व्यस्त हैं.

गोर्बाचोफ़ ने रूस में ख़ुलेपन को बढ़ावा दिया, लोगों को अभिव्यक्ति की आज़ादी दी और पश्चिमी देशों के साथ शांति और दोस्ताना संबंधों को बढ़ाया.

ये सब पुतिन की कार्यशैली से उलट है. उनके राज में आज़ादी छिनी जा रही है, संवैधानिक संस्थाओं को दबाया जा रहा है और पश्चिमी देशों के साथ लगातार टकराव की स्थिति जारी है.

रोज़नबर्ग कहते हैं, "इन सबके साथ यूक्रेन पर हमले ने पुतिन को व्यस्त रखा हुआ है. इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि उनके पास समय नहीं."


गोर्बाचोफ़ ने जिस अस्पताल में आख़िरी सांसे लीं, उसकी ओर से बताया गया कि सोवियत नेता लंबे समय से गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे.

हाल के वर्षों में उनकी सेहत लगातार ख़राब होती जा रही थी और उन्हें कई बार अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था.

इसी साल जून महीने में कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में ये दावा किया गया था कि किडनी की बीमारी की वजह से गोर्बाचोफ़ को अस्पताल में भर्ती कराया गया.

पुतिन के कुछ फ़ैसलों पर गोर्बाचोफ़ भी सवाल उठाते आए थे.

हाल की बात करें, तो गोर्बाचोफ़ को यूक्रेन पर हमला करने का पुतिन का फ़ैसला ख़ास पसंद नहीं आया था.

हालांकि, साल 2014 में जब रूस ने क्राइमिया को अपने कब्ज़े में लिया था, तब गोर्बाचोफ़ ने इसका समर्थन किया था.

साल 2013 में गोर्बाचोफ़ ने बीबीसी रेडियो 4 को दिए इंटरव्यू में पुतिन को अपना अंदाज़ बदलने के लिए कहा था.

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गोर्बाचोफ़
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गोर्बाचोफ़

पूर्व सोवियत नेता ने उस समय रूस में पारित हुए कुछ कानूनों को वहां के "नागरिकों के अधिकारों पर हमला" बताया था.

बीबीसी संवाददाता स्टीव रोज़नबर्ग के साथ बातचीत में गोर्बाचोफ़ ने कहा था, "मैं वास्तव में पुतिन को राष्ट्रपति के तौर पर उनके पहले कार्यकाल के दौरान समर्थन दिया था, लेकिन उसके बाद हमारे रिश्तों में ख़टास आ गई. सबकुछ ठीक नहीं जा रहा है. मुझे लगता है कि उन्हें अपना अंदाज़ बदलना चाहिए और सामंजस्य बैठाना चाहिए."

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