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दुनिया के लिए है चंद्रयान, G20 में हो अफ्रीकन यूनियन.. ग्लोबल साउथ में लीडर की भूमिका में आया भारत?

India Global South: पापुआ न्यू गिनी के प्रधानमंत्री जेम्स मरापे ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का स्वागत करते हुए जब पैर छुआ, वो तस्वीर इस बात का प्रमाण था, कि भारत ग्लोबल साउथ, यानि दुनियाभर के विकासशाली और गरीब देशों की आवाज बनने के लिए भारत उठ खड़ा हुआ है।

और अगले महीने होने वाले जी20 शिखर सम्मेलन से पहले प्रधानमंत्री मोदी का ये बयान, कि भारत 'ग्लोबल साउथ' की दमदार आवाज बनकर उभरेगा, ये दर्शाता है, कि भारत की महत्वाकांक्षा क्या है। नई दिल्ली में 9 और 10 सितंबर को जी20 शिखर सम्मेलन का आगाज होना और उससे पहले भारत ने, जी20 में अफ्रीकन यूनियन को शामिल करने की जोरदार मांग की है।

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पीएम मोदी की इस मांग के बाद पापुआ न्यू गिनी के प्रधानमंत्री की वो अपील नजर आती है, जिसमें उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री से आग्रह किया था, कि वो प्रशांत क्षेत्र की आवाज को जी20 की मंच पर उठाएं और प्रधानमंत्री मोदी ने ग्लोबल साउथ के लिए अपनी आवाज उठा दी है।

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    अफ्रीकन यूनियन जी20 में हो पाएगा शामिल?

    भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने G20 शिखर सम्मेलन से पहले अफ्रीकी संघ (एयू) को इस समूह का पूर्ण सदस्य बनाने का प्रस्ताव दिया है, साथ ही उन्होंने भारत को आपूर्ति श्रृंखला संकट के समाधान के रूप में पेश किया है।

    पीएम मोदी ने रविवार को 9-10 सितंबर के जी20 शिखर सम्मेलन से कुछ दिन पहले नई दिल्ली में बिजनेस 20 शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा, कि "हमारे पास समावेशिता का दृष्टिकोण है और उस दृष्टिकोण के साथ, हमने अफ्रीकी संघ को जी20 का स्थायी सदस्य बनने के लिए आमंत्रित किया है।"

    G20 की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में 19 देश और यूरोपीय संघ (EU) शामिल हैं, जो कुल वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 85 प्रतिशत और दुनिया की आबादी का दो-तिहाई हिस्सा बनाते हैं, जबकि अफ्रीकन क्षेत्र से दक्षिण अफ्रीका ही एकमात्र इसका सदस्य है।

    दिसंबर में, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा था, कि वह चाहते हैं कि एयू "जी20 में एक स्थायी सदस्य के रूप में शामिल हो", उन्होंने कहा कि "इसे आने में काफी समय हो गया है, लेकिन यह आने वाला है"।

    रविवार को, नई दिल्ली ने पैन-अफ्रीकी ब्लॉक को भी शामिल करने का आह्वान किया, जिसकी पिछले साल सामूहिक रूप से 3 ट्रिलियन डॉर की जीडीपी थी।

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    हालांकि, इस साल G20 की मेजबानी कर रहे भारत को यूक्रेन संघर्ष को लेकर सदस्य देशों के बीच मतभेदों को पाटने के लिए संघर्ष करना पड़ा है, क्योंकि भारत ने मॉस्को को अलग-थलग करने की पश्चिम की नीति में शामिल होने से इनकार कर दिया है और इसके बजाय रूसी कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार बन गया है।

    लेकिन, भारत सरकार की नजर सिर्फ जी20 पर नहीं है, बल्कि भारत उससे आगे की सोच रहा है।

    चीन को काउंटर करने की कोशिश

    भारत की कोशिश कोविड संकट के समय सप्लाई चेन में आई रूकावट को लेकर खुद को एक भरोसेमंद सप्लाई चेन देश की तरफ विकल्प प्रस्तुत करने की है और भारत का मकसद, चीन को काउंटर करना है।

    लिहाजा, पीएम मोदी ने कहा, कि "इसलिए आज जब दुनिया इस (सप्लाई चेन) सवाल से जूझ रही है तो मैं आश्वस्त करना चाहता हूं, कि इस समस्या का समाधान भारत ही है।"

    आपको बता दें, कि इसके अलावा नई दिल्ली लगातार चंद्रयान-3 की उपलब्धि को सिर्फ भारत की नहीं, बल्कि दुनिया के तमाम विकासशील देशों की उपलब्धि बता रहा है। भारत का कहना है, कि चंद्रयान-3 की सफलता में तमाम विकासशील देश शामिल हैं और भारत विकासशील देशों को एकजुट लेकर चलने के लिए तैयार है।

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    ग्लोबल साउथ का लीडर बन पाएगा भारत?

    ग्लोबल साउथ मोटा-मोटी तौक पर उन देशों को कहा जाता है, जहां औद्योगिक विकास नहीं हो पाया है और इन देशों का पूंजीवादी और साम्यवादी, दोनों ही तरह की विचारधारा से टकराव रहा है।

    ग्लोबल साउथ में एशिया, अफ्रीक और दक्षिण अमेरिकी देश आते हैं। हालांकि, चीन भी खुद को ग्लोबल साउथ का ही हिस्सा बताता है, लेकिन अर्थव्यवस्था के लिहाजा से एक्सपर्ट उसे ग्लोबल साउथ से बाहर रखते हैं।

    वहीं, ग्लोबल नॉर्थ में अमेरिका, कनाडा, यूरोप, रूस, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देश हैं, जो विकसित हो चुके हैं और जिन्होंने औद्योगिक विकास का पूरा लाभ उठाया है।

    जबकि, अपनी विशालकाय आबादी, समृद्ध संस्कृति और प्रचूर मात्रा में प्राकृतिक संसाधन होने की वजह से ग्लोब साउथ की अहमियत काफी ज्यादा है और ग्लोबल साउथ भी भारत को उम्मीद भरी नजरों से देखता है। लिहाजा, इस साल अपनी जी20 की अध्यक्षता के दौरान भारत लगातार ग्लोबल साउथ के मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहा है।

    हालांकि, ग्लोबल साउथ का लीडर बनना फिलहाल भारत के लिए उतना आसान नहीं है, क्योंकि इन क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का भारी अभाव है, जिसकी वजह से विदेशी निवेश आना काफी ज्यादा मुश्किल है। वहीं, चीन भी बेल्ट एंड रोड (BRI) के जरिए लगातार ग्लोबल साउथ में पकड़ मजबूत कर रहा है, जिसे रोकना भी भारत के लिए बड़ी चुनौती है।

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