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PM Modi in Japan-China:मोदी की ईवी-नीति से हिल जाएगी ट्रंप की ऑयल-डिप्लोमेसी! खत्म होगा यूएस का दबदबा?

PM Modi in Japan-China: तेल की राजनीति, डॉलर की ताकत और अमेरिका का दबदबा! बरसों से यही नियम दुनिया चलाते रहे हैं। लेकिन अब भारत ने वो दांव चल दिया है जो अमेरिका के टैरिफ वाले पूरे खेल को हिला सकता है। ट्रंप के टैरिफ-वार से निपटने के लिए भारत ने भी करारा जवाब तैयार कर लिया है।

अहमदाबाद से लॉन्च हुई पहली स्वदेशी ईवी सिर्फ एक गाड़ी नहीं, बल्कि दुनिया को भारत का संदेश है कि तेल का खेल खत्म होने वाला है। बहरहाल सवाल ये है क्या EV भारत का नया हथियार बनकर अमेरिका की ऑयल-डिप्लोमेसी और दादागिरी को ध्वस्त कर देगी? आइए, इस आलेख में इस मामले की पड़ताल करते हैं।

PM Modi in Japan-China

ट्रंप का तेल का खेल और भारत का पलटवार

रूस से तेल खरीद पर अमेरिका ने भारत के खिलाफ टैरिफ 50% तक बढ़ा दिया। ट्रंप प्रशासन का दबाव साफ है - भारत तेल खरीदे, वो भी अमेरिका से। लेकिन भारत अब समझ चुका है कि वही तेल, जो आज अमेरिका हथियार बनाकर इस्तेमाल कर रहा है, कल उसके लिए बोझ बन सकता है। अहमदाबाद से पीएम मोदी ने देश में निर्मित पहली ईवी लॉन्च करके ये साफ कर दिया है कि भारत अब "तेल-निर्भरता" के बजाय "ईवी-क्रांति" की तरफ बढ़ेगा और इसी वजह से पीएम मोदी जापान और चीन की यात्रा पर जा रहे हैं।

दूसरी तरफ अमेरिका नहीं चाहता कि भारत चीन जैसे बड़े बाजार की तरफ बढ़े जिससे चीन की अर्थव्यवस्था मजबूत हो। भारत का प्लान तैयार है - तेल का जवाब इलेक्ट्रिक कार से। अगर भारत में EV गाड़ियों का बाज़ार व्यापक रूप से विकसित हो जाता है तो अमेरिका को तेल निर्यात और तेल डॉलर सिस्टम से बड़ा आर्थिक नुकसान होगा। आखिर ट्रंप तेल-तेल क्यों रट क्यों लगाए हैं? इसके पीछे भी बड़ा खेल है।

दरअसल भारत में ऑटोमोबाइल का बड़ा बाजार है... जिसकी वजह से अमेरिका भारत को तेल खरीदने के लिए दबाव बनाता रहता है। दूसरी बात कि भारत रूस से तेल का आयात डॉलर में नहीं बल्कि रुपये और रूबल में करता है। इस यही वजह से भी अमेरिका चाहता है कि भारत उससे तेल खरीदे रूस से नहीं। इसके साथ ही यह भी जानना जरूरी है कि भारत के तेल नहीं खरीदने पर अमेरिका को क्या झटका लग सकता है।

भारत का ऑटोमोबाइल बाजार

बिक्री के हिसाब से भारत चीन और अमेरिका के बाद तीसरा सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल बाजार है। उत्पादन के लिहाज से, भारत चौथे स्थान पर है यानी चीन, अमेरिका और जापान से पीछे। भारत का ऑटो उद्योग लगभग 22 लाख करोड़ रुपये का है। यह उद्योग भारत की GDP का लगभग 7 से 8 फीसदी तक योगदान करता है। ये बाजार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग तीन करोड सत्तर लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार देता है।

वित्त वर्ष 2025 में भारत में कुल वाहन बिक्री 2 करोड़ 56 लाख यूनिट्स रही, जिसमें दोपहिया, तीनपहिया, यात्री और कमर्शियल वाहनों की बिक्री शामिल है। केवल पैसेंजर व्हीकल यानी कार बाजार 2025 में लगभग 17.1 बिलियन डॉलर रहा, जो 2029 तक बढ़कर 21.5 बिलियन डॉलर होने की उम्मीद है। दुनिया का सबसे बड़ा दोपहिया बाजार है भारत है जहां रोजाना लगभग 20 मिलियन से ज्यादा दोपहिया वाहन बिकते हैं। साथ ही सबसे बड़ी ट्रैक्टर मार्केट भी भारत है, जहां सालाना 8 लाख यूनिट्स से ज्यादा की बिक्री होती है।

भारत का ऑटोमोबाइल बाजार न केवल विशाल है, बल्कि यह तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। इसके वैश्विक स्तर पर बढ़ते रैंक और आर्थिक योगदान ने इसे उपमहाद्वीप में एक प्रमुख औद्योगिक शक्ति बना दिया है। बस इसी बाजार पर अमेरिका की नजर है क्योंकि भारत में ज्यादातर गाड़ियां पेट्रोल और डीजल पर चल रही है और भारत का ऑटोमोबाइल बाज़ार इतना बड़ा है कि उससे अमेरिका को सीधे तौर पर कई आर्थिक लाभ मिलते हैं। भारत का ऑटोमोबाइल उद्योग अमेरिका के लिए ट्रिलियन-डॉलर बिजिनेस का अवसर है। हाई-टेक पार्ट्स की सप्लाई, EV और बैटरी टेक्नोलॉजी, क्लाउड और AI सॉफ्टवेयर, प्रीमियम वाहनों का बाज़ार,और जॉइंट वेंचर निवेश। यानी भारत का बढ़ता ऑटो मार्केट अमेरिका की कंपनियों को न सिर्फ मुनाफा देता है, बल्कि भविष्य की EV और AI आधारित कार इंडस्ट्री में अपनी पकड़ बनाए रखने का मौका भी देता है।

अमेरिका शेल ऑयल और पेट्रो-डॉलर

अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में से है। अमेरिका ने शेल ऑयल के उत्पादन में खास तौर पर पिछले 15-20 सालों में भारी उछाल हासिल किया है। 2008 के बाद शेल ऑयल "गेम-चेंजर" साबित हुआ और अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक बन गया। भारत अपनी 85 फीसदी से ज्यादा तेल ज़रूरतों के लिए आयात पर निर्भर है। अमेरिका से शेल ऑयल खरीदने से भारत को सिर्फ खाड़ी देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है। कभी-कभी अमेरिका का शेल ऑयल भारत को खाड़ी देशों से मिलने वाले तेल से सस्ता पड़ता है। खासकर तब, जब अमेरिका ज्यादा प्रोडक्शन करके ग्लोबल प्राइस नीचे ले आता है।

भारत अगर सिर्फ सऊदी अरब, इराक, ईरान से तेल ले, तो वह मिडिल ईस्ट की राजनीति में फंस सकता है। इसलिए शेल ऑयल खरीदकर भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक रिश्ते मजबूत करता है और "एनर्जी डिप्लोमेसी" में बैलेंस बनाता है। शेल ऑयल खरीदकर भारत अमेरिका के साथ ट्रेड बैलेंस बेहतर करता है क्योंकि भारत अमेरिका को बहुत कम चीजें बेचता है, लेकिन बहुत ज्यादा आयात करता है।

अमेरिका को बड़ा ग्राहक खोने का डर

भारत चीन और अमेरिका के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऑयल इंपोर्टर है। भारत हर साल अरबों डॉलर का कच्चा तेल खरीदता है...अगर भारत अमेरिकी शेल ऑयल नहीं खरीदेगा, तो अमेरिका को अपने सबसे बड़े ग्राहकों में से एक से हाथ धोना पड़ेगा। अमेरिका 2017 के बाद से भारत को शेल ऑयल और LNG बेच रहा है...2022-23 में अमेरिका भारत को 8-9 अरब डॉलर का क्रूड ऑयल और LNG बेच चुका है। अगर भारत यह खरीदना बंद कर दे, तो अमेरिका को अरबों डॉलर का सालाना नुकसान होगा।

रणनीतिक नुकसान

अगर भारत फिर से सऊदी अरब, इराक, यूएई जैसे खाड़ी देशों पर पूरी तरह निर्भर हो जाए, तो अमेरिका का "India as Energy Partner" वाला प्लान फेल हो जाएगा। अमेरिका चाहता है कि भारत सिर्फ मिडिल ईस्ट पर न टिके, बल्कि अमेरिकी एनर्जी पर भी निर्भर रहे। चीन पहले ही अमेरिका से शेल ऑयल ज्यादा नहीं लेता है। उसके लिए रूस और खाड़ी देश काफी हैं। अगर भारत भी अमेरिका से तेल नहीं खरीदेगा, तो अमेरिका के लिए एशिया का ऊर्जा बाज़ार हाथ से निकल जाएगा।

भूराजनीतिक दबदबे में कमी

अमेरिका शेल ऑयल और गैस को सिर्फ कारोबार के लिए नहीं, बल्कि एक जियोपॉलिटिकल हथियार की तरह इस्तेमाल करता है। भारत अगर अमेरिकी शेल ऑयल छोड़कर जापान, रूस या खाड़ी देशों से ज्यादा खरीदे, तो अमेरिका का भारत पर दबाव बनाने का हथियार कमजोर हो जाएगा।

अमेरिकी शेल ऑयल इंडस्ट्री पर दबाव

शेल ऑयल कंपनियों को अपने प्रोडक्शन का बड़ा हिस्सा बाहर बेचना पड़ता है। भारत जैसा बड़ा खरीदार अगर निकल जाए, तो अमेरिकी कंपनियों को दूसरे खरीदार ढूंढने में मुश्किल होगी। Price War शुरू होगा...और अगर भारत नहीं खरीदेगा, तो अमेरिका को अपना शेल ऑयल बेचने के लिए दाम घटाने पड़ेंगे। इसका असर सीधे अमेरिकी तेल कंपनियों के मुनाफे और रोजगार पर होगा।

Petro-Dollar सिस्टम को खतरा

अभी दुनिया भर का ऑयल ट्रेड अमेरिकी डॉलर में होता है। अगर तेल की मांग गिरेगी, तो डॉलर पर निर्भरता घटेगी। इसका असर अमेरिका की वित्तीय ताकत और वैश्विक दबदबे पर पड़ेगा।

कंपनियों को भारी ट्रांजिशन कॉस्ट झेलनी पड़ेगी

EV के लिए लिथियम, कोबाल्ट, निकेल जैसे क्रिटिकल मिनरल्स की ज़रूरत होती है। इनमें चीन, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका के कुछ देश आगे हैं, अमेरिका नहीं। वहीं बैटरी सप्लाई चेन पर चीन का दबदबा है। अगर EV भारत के बाजार में तेजी से फैलेंगे, तो अमेरिका को अपनी पुरानी ऑटो और ऑयल इंफ्रास्ट्रक्चर में किया गया निवेश घाटे में दिखेगा। अमेरिकी कंपनियों को भारी ट्रांजिशन कॉस्ट झेलनी पड़ेगी। अगर EV गाड़ियां भारत में छा जाती हैं, तो अमेरिका को तेल निर्यात और तेल डॉलर सिस्टम से बड़ा आर्थिक नुकसान होगा और ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री का वैश्विक दबदबा खोना पड़ेगा।

क्या आने वाले वक्त में दुनिया को तेल चलाएगा या बैटरी?

तेल का खेल अब सिर्फ ईंधन का नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का है। पीएम मोदी का ईवी लॉन्च दुनिया को साफ संदेश है कि भारत नए रास्ते पर चल पड़ा है। सवाल अब ये है - क्या आने वाले वक्त में दुनिया को तेल चलाएगा या बैटरी? क्या अमेरिका झुकेगा या भारत नई ताकत बनेगा? फिलहाल इतना तय है कि भारत की ईवी क्रांति ने अमेरिकी ऑयल-डिप्लोमेसी की नींव हिला दी है।

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