अमेरिका का ऑफर ठुकराकर पछताएगा पाकिस्तान? दोस्त तालिबान के लिए इमरान ने लिया US से पंगा
पाकिस्तान को एयरबेस देने के लिए राजी करने के लिए अमेरिकी रक्षा सचिव लॉयड ऑस्टिन ने पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी से कई बार फोन पर बात की थी, लेकिन अब इमरान खान ने साफ मना करने की बात कही है।
इस्लामाबाद, जून 20: अमेरिका और चीन के बीच पाकिस्तान बुरी तरह से फंसता हुआ नजर आ रहा है। वहीं, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने तालिबान की मदद के लिए अमेरिका के एक बड़े प्रस्ताव को ठुकरा दिया है। दरअसल, अमेरिका ने इमरान खान से अनुरोध किया था कि उसे पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में एक सीक्रेट एयरबेस मुहैया कराए। इसी एयरबेस से अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए अफगानिस्तान में सीक्रेट ड्रोन मिशन को अंजाम देने वाली थी। बदले में अमेरिका ने पाकिस्तान को रुकी हुई आर्थिक सहायता को फिर से शुरू करने का लालच भी दिया था। लेकिन, इमरान खान ने अपने दोस्त तालिबान को बचाने के लिए अमेरिका के इस ऑफर को ठुकरा दिया है।

इमरान ने सीधे-सीधे किया इनकार
अमेरिकी समाचार वेबसाइट एक्सियोस को दिए एक इंटरव्यू में इमरान खान ने कहा कि इस साल अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी के बाद, सीआईए को पाकिस्तान की धरती से अपना अभियान शुरू करने की बिल्कुल भी इजाजत नहीं दी जाएगी। इससे पहले कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि पाकिस्तान ने अमेरिका को अफगानिस्तान में मिशन चलाने के लिए अपने हवाई क्षेत्र का उपयोग करने की अनुमति दे दी है। माना जा रहा है कि इस खबर के बाद पाकिस्तान की राजनीति में कोहराम मच गया और फिर इमरान सरकार ने तुरंत इस फैसले को बदल दिया और अमेरिका को पाकिस्तान के अंदर सैन्य अड्डा देने से इनकार कर दिया।

सीआईए डायरेक्टर आए थे पाकिस्तान
पाकिस्तान को एयरबेस देने के लिए राजी करने के लिए अमेरिकी रक्षा सचिव लॉयड ऑस्टिन ने पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी से कई बार फोन पर बात की। इसके साथ ही अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के निदेशक विलियम बर्न्स ने इस्लामाबाद का बेहद गुप्त दौरा किया था। इसके बावजूद पाकिस्तान ने तालिबान के साथ घनिष्ठ संबंध होने के कारण एयरबेस देने से साफ इनकार कर दिया। अब आशंका जताई जा रही है कि इमरान के इस इनकार से पाकिस्तान और अमेरिका के रिश्ते खराब हो सकते हैं। लेकिन, विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान अमेरिका से संबंध खराब करने का रिस्क लेने के लिए तैयार है, लेकिन वो चीन और तालिबान से संबंध खराब नहीं करना चाहता है।
पाक-अमेरिका एनएसए की मुलाकात
मई के आखिरी हफ्ते में पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार मुईद युसूफ ने जिनेवा में अमेरिकी एनएसए जैक सुलिवन से मुलाकात की थी। इस दौरान मुईद युसूफ ने यूएस एनएसए जैक सुलिवन से पाकिस्तान और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय संबंधों को सुरक्षा और रक्षा के आधार पर नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था और व्यापार के आधार पर बढ़ाने का आग्रह किया था। हालांकि, दोनों अधिकारियों ने यह नहीं बताया कि इस एयरबेस को लेकर कोई बातचीत हुई या नहीं। लेकिन, अमेरिकी अखबार सीएनएन ने दावा किया था कि कुछ शर्तों के साथ पाकिस्तान अमेरिका को एयरबेस देने के लिए तैयार है। सैन्य अड्डा देने के लिए अमेरिका ने सबसे बड़ा शर्त अमेरिका के सामने ये रखा था कि वो पाकिस्तान की जमीन ने तालिबान को निशाना नहीं बनाएगा।

अमेरिका-पाकिस्तान में सैन्य समझौता
अमेरिका में ट्विन टावर पर अलकायदा के द्वारा किए गये आतंकी हमले के बाद तालिबान से बदला लेने के लिए अमेरिकी सेना ने दो पाकिस्तानी हवाई अड्डों का इस्तेमाल करना शुरू किया था। दरअसल, अफगानिस्तान में सैन्य अभियानों के लिए अमेरिका को पाकिस्तान के हवाई ठिकानों और जमीनी इलाकों की जरूरत थी। यही वजह थी कि तब अमेरिका और पाकिस्तान के बीच एएलओसी और जीएलओसी समझौतों पर हस्ताक्षर किए गये थे। एएलओसी समझौते के तहत अमेरिका ने दो पाकिस्तानी एयरबेस का इस्तेमाल किया था, जबकि जीएलओसी समझौते के तहत अमेरिका ने तालिबान के खिलाफ पाकिस्तान के अंदर मिले जमीनी सैन्य ठिकानों से ऑपरेशन चलाया था। इन ऑपरेशंस में अमेरिका ने सैकड़ों तालिबानी आतंकियों को ड्रोन हमले में मारा था। वहीं, अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने पाकिस्तान की जमीन से पाकिस्तान के सैकड़ों सैनिकों को ड्रोन से बम गिराकर उड़ा दिया था। सबसे चर्चित मामला 2011 में हुआ था जब सीआईए ने पाकिस्तान की एक पुलिस चौकी को ही उड़ा दिया था, जिसमें 20 से ज्यादा पुलिसवाले बैठे हुए थे।

पाकिस्तान में दो एयरपोर्ट का इस्तेमाल
अमेरिका ने पाकिस्तान नियंत्रित बलूचिस्तान में स्थित शम्सी एयर बेस और अफगानिस्तान में सैन्य अभियानों के लिए सिंध के जैकबाबाद में शाहबाज एयर बेस का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया था। अमेरिकी फाइटर जेट जैकबाबाद बेस से उड़ान भरते थे, जबकि ड्रोन ऑपरेशन शम्सी एयरबेस से किए जाते थे। इन दोनों एयरबेस को पाकिस्तान ने साल 2011 तक खाली करा लिया था। अब अमेरिकी वायुसेना इन एयरबेस का इस्तेमाल नहीं करती है।
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