भारत में 4 में से 3 मुस्लिम चाहते हैं इस्लामिक कोर्ट और शरिया कानून, PEW सर्वे में खुलासा
PEW के रिसर्च के मुताबिक, भारत में 74% मुस्लिम आबादी इस्लामी अदालतों यानि शरीयत कानून को लागू रने के पक्ष में है।
नई दिल्ली, जून 03: भारत में मुसलमानों की एक बड़ी आबादी संपत्ति विवाद और तलाक जैसे मामलों में इस्लामी अदालत में जाना पसंद करती है। अमेरिकी थिंक टैंक PEW की एक स्टडी में यह बात सामने आई है। इस अध्ययन से पता चला है कि हिंदू या मुसलमान, जब शादी, दोस्ती या अन्य सामाजिक मामलों की बात आती है, तो वे धार्मिक रूप से अलग जीवन जीना पसंद करते हैं। ''रिलिजन इन इंडिया: टॉलरेंस एंड सेपरेशन'' टाइटल से प्रकाशित रिपोर्ट में इसका खुलासा किया गया है। (सभी तस्वीर प्रतीकात्मक)

सर्वे की बड़ी बातें
PEW के एक रिसर्च के मुताबिक, भारत में 74% मुस्लिम आबादी इस्लामी अदालतों यानि शरीयत कानून को लागू रने के पक्ष में है। 59% मुसलमानों ने भी विभिन्न धर्मों के अदालतों का समर्थन किया है। यानि, भारत में हर चार मुसलमान में 3 मुसलमान शरीया अदालत चाहता है। उनका कहना है कि भारत को अलग अलग धार्मिक मान्यताओं वाले देश होने से फायदा मिलता है। मुसलमानों ने सर्वे में कहा है कि मुसलमानों का धार्मिक अलगाव अन्य धर्मों के प्रति उदारता के रास्ते में नहीं आता है और ऐसा ही हिंदुओं के साथ भी है।

भारत की न्यायिक व्यवस्था होगी कमजोर
अमेरिकन थिंक टैंक के सर्वे में से पता चला है कि 30% हिंदू इस बात का समर्थन करते हैं कि मुस्लिम पारिवारिक विवादों को निपटाने के लिए अपनी धार्मिक अदालतों में जा सकते हैं। इस बात का समर्थन करने वालों में 25% सिख, 27% ईसाई, 33% बौद्ध और 33 प्रतिशत जैन भी शामिल हैं। हालांकि, ज्यातातर भारतीयों ने इस बात पर चिंता जताई है कि शरिया अदालतों का अगर निर्माण होना शुरू हो जाए तो न्यायिक व्यवस्था कमजोर हो जाएंगी। क्योंकि, शरिया अदालतों के निर्माण के बाद एक बड़ी आबादी मुख्य अदालतों का निर्देश मानने से इनकार करने लगेंगे और फिर देश की न्यायिक व्यवस्था की कमजोर हो जाएगी।

30 हजार लोगों पर सर्वे
अमेरिकी थिंक टैंक ने ये सर्वे 2019 के अंत और 2020 की शुरूआत में की थी, उस वक्त तक कोरोना महामारी ने दस्तक नहीं दी थी। इस सर्वे में 17 भाषाओं और विभिन्न धार्मिक पृष्ठभूमि के 30 हजार से ज्यादा लोगों को शामिल किया गया था। इस सर्वे में शामिल सभी लोगों ने कहा कि उनके ऊपर अपनी धार्मिक मान्यकता बदलने का कोई दवाब नहीं रहता है और वो अपनी मर्जी से अपनी धार्मिक मान्यता चुनने और उसका पालन करने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र हैं। सर्वे के लिए एजेंसी ने देश के 26 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों के लोगों से बात की थी।

धर्म के अलावा भी मान्यताएं
अमेरिकन थिंक टैंक के सर्वे में कई चौंकाने वाली बातों का भी खुलासा हुआ है। इस सर्वे में शामिल लोगों ने कहा है कि वो अपनी धार्मिक मान्यताओं के अलावा दूसरे धर्मों में शामिल कई मान्यताओं को भी मानते हैं। तीन चौथाई हिंदुओं ने सर्वे में कहा कि वो 'कर्म करने के सिद्धांत' में यकीन रखती है, जबकि सर्वे में शामिल मुसलमानों के एक बड़े हिस्से ने भी 'कर्म के सिद्धांत' को माना है। वहीं, 81 प्रतिशत हिंदु जल्द से जल्द गंगा नदी को पवित्र और साफ सुधरा देखना चाहते हैं। वहीं, 32 प्रतिशत ईसाई भी गंगा के शुद्धिकरण में विश्वास रखते हैं। सर्वे में पता चला कि उत्तर भारत में 12 प्रतिशत हिंदू, 10 प्रतिशत सिख और 37 प्रतिशत मुस्लिम सूफीवाद में यकीन रखते हैं, जो इस्लाम के बेहद नजदीक है। वहीं, सर्वे में शामिल सभी लोगों ने माना कि बड़ों का आदर करना उनकी आस्था के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।

धर्मों को नहीं मानते हैं समान
कुछ मूल्यों और धार्मिक विश्वासों को साझा करने के बावजूद, एक देश में रहने वाले, एक संविधान के तहत, भारत के ज्यादातर लोगों को यह नहीं लगता है कि उनका धर्म दूसरे धर्म के समान है। सर्वे में शामिल ज्यादातर हिंदुओं का मानना है कि उनका धर्म मुस्लिम धर्म से पूरी तरह अलग है, वहीं, मुस्लिमों ने भी हिंदू धर्म को लेकर यही कहा। वहीं, सर्वे में शामिल सिख धर्म और जैन धर्म के लोगों ने कहा कि उनका धर्म और हिंदू धर्म बहुत हद तक एक समान मिलते हैं।

शादी को लेकर सर्वे
प्यू रिसर्च सेंटर के मुताबिक भारत में ज्यादातर लोग दूसरे धर्म में शादी करने के फैसले को सही नहीं मानते हैं। इनमें से 80 फीसदी मुसलमान और 67 फीसदी हिंदू हैं। हिंदुओं का कहना था कि यह जरूरी है कि उनके धर्म की महिलाओं को दूसरे धर्मों में शादी करने से रोका जाए। 65% हिंदुओं ने कहा कि हिंदू पुरुषों को भी दूसरे धर्म में शादी नहीं करनी चाहिए। 80% मुसलमानों ने कहा कि मुस्लिम महिलाओं को किसी अन्य धर्म में शादी करने से रोकना बहुत जरूरी है। 76% ने कहा कि मुस्लिम पुरुषों को भी दूसरे धर्म में शादी नहीं करनी चाहिए। सर्वे में लोगों की राष्ट्रीयता को लेकर भी सवाल पूछे गए। सर्वेक्षण में यह भी पता चला कि भारत के लोग धार्मिक सहिष्णुता के समर्थन में हैं, लेकिन वे खुद को अन्य धार्मिक समुदायों से अलग रखना चाहते हैं।












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