इस्लामाबाद मस्जिद में बरसाया था बम, बेनजीर का निकाला था दम, मुशर्रफ से क्यों खौफ खाते थे PAK नेता?
पाकिस्तान के एक्सपर्ट्स ने हमेशा से इल्जाम लगाया है, कि परवेज मुशर्रफ की वजह से हजारों पाकिस्तानी बेमौत मारे गये, क्योंकि उन्होंने ही अमेरिकी सेना को पाकिस्तान से ऑपरेशंस को अंजाम देने की इजाजत दी थी।

Pervez Musharraf News: पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ का रविवार को 79 साल की उम्र में निधन हो गया। उनका काफी समय से दुबई के एक अस्पताल में इलाज चल रहा था। 1999 के कारगिल युद्ध के मास्टरमाइंड रहे मुशर्रफ ने नवाज शरीफ को सत्ता से बेदखल कर पाकिस्तान के शासन पर कंट्रोल कर लिया था। साल 2001 में, उन्होंने खुद को राष्ट्रपति के रूप में नियुक्त किया और 2008 तक इस्लामिक गणराज्य पर शासन किया। आईये जानते हैं, कि आखिर जनरल परवेज मुशर्रफ को क्यों फांसी की सजा मिली थी?

भारत के साथ युद्ध
जनरल रहने के दौरान मुशर्रफ की वजह से ही भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध शुरू हुआ था, जिसमें पाकिस्तान की बुरी तरह से हार हुई थी। लेकिन, उन्होंने 1998 से 2001 तक जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी के 10वें अध्यक्ष और 1998 से 2007 तक 7वें थल सेनाध्यक्ष रहने के दौरान मुशर्रफ ने भारत के दुश्मनी निकालने की हर संभव कोशिश की, लेकिन अंत तक मुशर्रफ को कामयाबी हासिल नहीं हो पाई। दिलचस्प बात ये है, कि परवेज मुशर्रफ का जन्म भारत में ही हुआ था और उनके माता-पिता दिल्ली के रहने वाले थे। साल 1943 में दिल्ली में जन्मे, मुशर्रफ जब चार साल के थे, तभी उनके माता-पिता मुसलमानों के सामूहिक पलायन के समय पाकिस्तान चले गये थे।

18 की उम्र में सेना में हुए शामिल
रॉयटर्स के अनुसार, परवेज मुशर्रफ 18 साल की उम्र में सेना में शामिल हुए और फिर एक एक कदम आगे बढ़ाते हुए पाकिस्तानी सेना के शीर्ष पर पहुंचे थे। पाकिस्तानी सेना के प्रमुख बनने से पहले वो एक कुलीन कमांडो इकाई का नेतृत्व करते थे, लेकिन इस दौरान ही परवेज मुशर्रफ ने रूढ़िवादी मुस्लिम देश पाकिस्तान में सामाजिक रूप से उदार मूल्यों की शुरूआत करने का प्रयास किया। देश की सत्ता संभालने के अपने शुरुआती वर्षों में, मुशर्रफ ने अपने सुधारवादी प्रयासों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा हासिल की, जिसमें महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए कानून को सख्त करना हो या निजी समाचार चैनलों को पहली बार संचालित करने की इजाजत देनी हो, उन्होंने चैनलों की स्वतंत्रता को भी बढ़ावा दिया। लेकिन, इस दौरान पाकिस्तान के मौलाना उनके खिलाफ हो गये, क्योंकि उन्होंने अपने देश में कट्टरपंथी ताकतों को कभी मुंह नहीं लगाया।

अमेरिका के फेवरेट जनरल बने
अपने कार्यकाल के दौरान जनरल परवेज मुशर्रफ अमेरिका के काफी करीब आए और 11 सितंबर, 2001 के संयुक्त राज्य अमेरिका में हुए आतंकी हमलों के बाद वाशिंगटन के सबसे महत्वपूर्ण सहयोगियों में से एक जनरल परवेज मुशर्रफ बन गए। उन्होंने पाकिस्तानी सेना में पैसा इन्वेस्ट करने के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश की सफलतापूर्वक पैरवी की। मुशर्रफ ने अपने कार्यकाल में पाकिस्तान के एयरबेस अमेरिकी सेना के हवाले कर दिया, जहां से अमेरिका, अलकायदा और तालिबान के ठिकानों पर हमला करता था। मुशर्रफ के कार्यकाल के दौरान अमेरिका ने भी अपना खजाना पाकिस्तान के लिए खोल रखा। लेकिन, जैसे-जैसे उनका राष्ट्रपति का कार्यकाल बढ़ता गया, उन्होंने अपने आप को एक पूर्ण तानाशाह के तौर पर पाकिस्तान में स्थापित कर लिया। इस दौरान साल 2006 में, मुशर्रफ ने बलूचिस्तान में भीषण सैन्य कार्रवाई के भी आदेश दिए थे, बलूचिस्तान प्रांत के एक आदिवासी मुखिया की मौत हो गई, जिसने एक सशस्त्र विद्रोह की नींव रखी, जो आज भी जारी है।

बेनजीर भुट्टो पर जानलेवा हमला
साल 2007 में पाकिस्तान की प्रमुख विपक्षी नेता बेनजीर भुट्टो की हत्या कर दी गई, जिसने देश में हिंसा की लहरें पैदा कर दी थीं। उन्हें बेनजीर भुट्टो हत्याकांड और लाल मस्जिद मौलवी हत्याकांड में भगोड़ा घोषित किया गया था। मुशर्रफ ने ही पाकिस्तान के लाल मस्जिद में बम बरसाने के आदेश दे दिए थे, क्योंकि वहां कट्टरपंथी ताकतों का जमावड़ा हो गया था। जिसके बाद पाकिस्तान की राजनीतिक और घरेलू स्थिति काफी खराब होने लगी थी। राजधानी इस्लामाबाद की घिरी हुई लाल मस्जिद पर जनरल मुशर्रफ के आदेश के बाद एक ऑपरेशन को अंजाम दिया गया था, जिसमें एक मौलवी समेत 100 से ज्यादा लोग मारे गए थे। इस केस में बाद में जाकर मुशर्रफ को गिरफ्तार भी किया गया था। वहीं, बेनजीर भुट्टो की मौत के कुछ समय बाद मुशर्रफ ने चुनाव को सस्पेंड कर दिया और पूरे पाकिस्तान में आपातकाल लागू कर दिया। 11 लंबे वर्षों के बाद, साल 2008 में देश का पहला लोकतांत्रिक चुनाव हुआ, लेकिन मुशर्रफ की पार्टी चुनाव हार गई। जिसके बाद मुशर्रफ के खिलाफ पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में महाभियोग चलाया गया। जिसके बाद उन्होंने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया और लंदन भाग गए।

2013 में आखिरी बार लौटे पाकिस्तान
जरनल परवेज मुशर्रफ साल 2013 में पाकिस्तान लौटे और उन्होंने चुनाव लड़ने की कोशिश की, लेकिन उन्हें तुरंत अयोग्य घोषित कर दिया गया। उन्हें 2016 में दुबई जाने की अनुमति दी गई थी। और साल 2019 में पाकिस्तान की एक विशेष अदालत ने उन्हें 2007 में आपातकालीन नियम लागू करने के लिए मौत की सजा सुनाई, लेकिन बाद में हाईकोर्ट ने उस फैसले को पलट दिया था। हालांकि, बीमार होने के बाद वो दुबई चले गये और गुमनामी में रहने लगे। इस बीच वो एमाइलॉयडोसिस नाम की एक दुर्लभ बीमारी का शिकार हो गये, जिसकी वजह से पिछले एक सालों से उनकी जिंदगी काफी दर्दनाक हो गई थी और इसी बीमारी की वजह से उनकी मौत हुई है।












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