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पेप्सी, कोका कोला समेत कई दिग्गज कंपनियों ने बंद किया रूस में बिजनेस, जानिए क्या है वजह

मॉस्को, 09 मार्च। यूक्रेन के खिलाफ युद्ध की शुरुआत के बाद से ही रूस को एक के बाद एक कई प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा है। अमेरिक सहित यूरोपियन यूनियन के देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए हैं। लेकिन जिस तरह से कई देश रूस पर यह प्रतिबंध लगा रहे थे उसी तरह अब कई मल्टिनेशनल ब्रांड्स ने भी रूस में प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए। इसी कड़ी में पेप्सिको और कोका कोला ने भी रूस में अपने सभी बिजनेस को बंद करने का फैसला लिया है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर ये तमाम कंपनियां भी रूस पर प्रतिबंध क्यों लगा रही हैं।

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कई दिग्गज कंपनियों ने खुद को रूस से किया अलग

कई दिग्गज कंपनियों ने खुद को रूस से किया अलग

रूस पर प्रतिबंध लगाने वाली कुछ बड़ी कंपनियों की बात करें तो शेल, एग्जॉन, बोइंग एंड एयरबस, एप्पल, टिकटॉक, मैकडोनाल्ड्स, स्टारबक्स, पेप्सिको और कोका कोला हैं। इन तमाम कंपनियों ने रूस में अपने ऑपरेशन को सस्पेंड कर दिया है और अपने मौजूदा बिजनेस को बंद करने का फैसला लिया है। ना सिर्फ इन तमाम उत्पाद कंपनियों बल्कि ग्लोबल कंसल्टिंग कंपनियां जैसे मैकिंजे ने भी खुद को रूस से अलग कर दिया है। कंपनी की ओर से कहा गया है कि वह रूसी सरकार के साथ अपने करार को खत्म कर रही है। इसी तरह का फैसला बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप और ए्सेंचर ने भी लिया है।

राजनतीतिक वजह बनी अहम

राजनतीतिक वजह बनी अहम

अमेरिका की लॉ कंपनी के मॉर्निंग स्पेशलाइजिंग के पार्टनर डीजे वोल्फ का कहना है कि मेरे लिहाज से कंपनियों की ताकत मायने रखती है कितनी बड़ी संख्या में ये कंपनिया रूस के खिलाफ कदम उठाती हैं। पहले ही दिन से किसी कंपनी ने रूस में अपने बिजनेस को सस्पेंड करने का फैसला नहीं लिया। लोग रूस के रवैये के बारे में बात कर रहे थे, लोग इसको लेकर चिंता जाहिर कर रहे थे, लेकिन इसको लेकर कोई ऐलान नहीं हो रहा था कि हम रूस से बाहर जा रहे हैं। लेकिन एक के बाद एक कंपनियां इसका ऐलान कर रही हैं। इन्होंने युद्ध की शुरुआत करने वाले का विरोध किया, जिसकी वजह से कंपनियों को राजनीतिक वजह का हवाला देते हुए रूस से खुद को अलग करना आसान हो गया।

पहले नहीं दिखे इस तरह के कदम

पहले नहीं दिखे इस तरह के कदम

लेकिन ऐसे में यह सवाल उठता है कि इससे पहले के संकट में इन कंपनियों ने किस तरह का कदम उठाया था। अगर म्यांमार और थाइलैंड सैन्य तख्तापलट और सीरिया में सिविल वॉर की बात करें तो कंपनियों ने इस तरह का कदम नहीं उठाया था। चीन में श्रमिकों के साथ दुर्व्यवहार, जातीय नरसंहार की रिपोर्ट के बाद भी इस तरह के फैसले नहीं लिए थे। हालांकि कुछ कंपनियों ने चीन के खिलाफ कदम उठाए थे लेकिन रूस की तुलना में यह बहुत कम थे।

आम नागरिकों पर हमले की तस्वीरें बना रही दबाव

आम नागरिकों पर हमले की तस्वीरें बना रही दबाव

एक्सपर्ट का मानना है कि ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि लोगों को लगता है कि हिंसा सिर्फ सोशल मीडिया पर ही नहीं बल्कि यूरोप के मुहाने और कई बड़ी कंपनियों के हेडक्वार्टर में भी हो रही है, जिसके चलते इन कंपनियों में कोल्ड वॉर और विश्व युद्ध 2 की यादें ताजा हो गई हैं। दरअसल अन्य देशों में हुई हिंसा की तस्वीरें इस तरह से सामने नहीं आई जैसे यूक्रेन में आम नगरिकों पर हमले हो रही हैं,उनके घरों में बमबारी की जा रही है, महिलाओं और बच्चों को निशाना बनाया जा रहा है। यही वजह है कि इन कंपनियों को इस तरह के कड़े फैसले लेने पड़ रहे हैं। ऐसे ही क्रीमिया की बात करें तो उस वक्त इस तरह की कोई हिंसा नहीं हुई थी।

कंपनियों को इस बात का डर

कंपनियों को इस बात का डर

तमाम कंपनियों का रूस के खिलाफ कदम को चीन की अर्थव्यवस्था से भी जोड़कर देखा जा रहा है। रूस की तुलना में चीन की अर्थव्यवस्था 10 गुना बड़ी है। रिपोर्ट की मानें तो मार्च से अभी तक रूस के खिलाफ तकरीबन 1200 प्रतिबंध अलग देशों जिसमे अमेरिका, यूरोपियन यूनियन के देश, स्विट्जरलैंड, जापान, यूके शामिल हैं ने लगाए हैं। कंपनियों को इस बात का भी डर है कि अमेरिका के प्रतिबंध के बाद भी अगर ये कंपनियां अपनी गतिविधियों को रूस में जारी रखती हैं तो उनके पूरे बिजनेस को बंद किया जा सकता है

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