भूख से बेहाल पाकिस्तानी कर रहे अल्लाह को याद, ना नौकरी, ना सरकार का साथ, बिगड़ रहे हालात
पाकिस्तान में लोगों ने दवा खरीदना बंद कर दिया है, क्योंकि दवा की कीमत भी काफी ज्यादा है। अगर कोई बीमार होता है, तो उसे महसूस होता है, कि उसे सजा-ए-मौत मिली है।

Pakistan Food Crisis: "हम पूरी तरह से अल्लाह पर निर्भर हैं," गंभीर आर्थिक हालात के बीच अब यह पाकिस्तान में हर दूसरा व्यक्ति अब कह रहा है, क्योंकि देश में साप्ताहिक मुद्रास्फीति 40 प्रतिशत को पार कर गया है। पाकिस्तान का गरीब अवाम भोजन के लिए रो रहा है, और ज्यादातर गरीब आबादी बिना खाना खाए रात को खाली पेट सोने पर मजबूर है। लोगों के पास खाना खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं और जिनके पास पैसे हैं, वो भविष्य के सोचकर डर रहे हैं और राशन जमा कर रहे हैं। वहीं, पाकिस्तान की सरकार के पास इस स्थिति से निकलने के लिए कोई उपाय नहीं है। आईएमएफ से लोन मिलेगा या नहीं, ये अनिश्चित है, जिसने बाजार के विश्वास को भी हिला दिया है। दूसरी तरह, पाकिस्तान के नेता आपसी लड़ाई में इतने मशगूल हो चुके हैं, कि शहबाज शरीफ की सरकार पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

सामान खरीदने के लिए पैसे नहीं
पाकिस्तान में लोगों का कहना है, कि उनके पास यूटिलिटी बिल, बच्चों की स्कूल फीस भरने के लिए पैसे नहीं बचे हैं। उनके घर में राशन खत्म हो रहा है और स्टॉक को फिर से भरने के लिए कोई बचत नहीं हो रही है। पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है, कि बीमार लोग अस्पताल जाने से परहेज कर रहे हैं, क्योंकि उनके पास डॉक्टर की फीस का भुगतान करने और दवाएं खरीदने के लिए रुपये नहीं हैं और अगर हैं, तो वो उसे खर्च नहीं करना चाह रहे हैं। पाकिस्तानियों का कहना है, कि उनकी खरीदने की क्षमता खत्म हो गई है, यहां तक कि बहुत से बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। ऐसी चिंताजनक स्थिति के बावजूद, शहबाज शरीफ के नेतृत्व वाली सरकार अवाम पर कोई दया नहीं दिखा रही है और अपने नागरिकों पर एक के बाद एक टैक्स को बोझ डाल रही है। इसके साथ ही, इस्लामाबाद ने पिछले कुछ महीनों में महत्वपूर्ण स्तर तक विदेशी सामानों की आपूर्ति पर रोक लगा दी है।

गरीब परिवारों का हाल बेहाल
41 साल की रूखसाना बीबी, जो एक घर में काम करती है, वो कहती है कि उसका परिवार अब सिर्फ एक समय ही खाना खाता है। रूखसाना जिस घर में वह काम करती हैं, वहां से हर महीने उसे 3,000 रुपये से 4,000 रुपये मिलते हैं, जिसमें उसके लिए घर चलाना असंभव है। डॉन से बात करते हुए रूखसाना ने कहा, कि "गेहूं का आटा मुश्किल से मिलता है। हमारे बच्चे एक बोरी गेहूं का आटा लेने के लिए कई-कई दिनों तक लाइन में खड़े रहते हैं, और वो भी काफी महंगा है।" उन्होंने कहा, कि "हम तीन वक्त का खाना खाते थे, लेकिन अब हम एक वक्त के खाने से समझौता कर लेते हैं।" रूखसाना ने आगे कहा, कि पाकिस्तान में कम वेतन के बावजूद भी लोगों को जो मिल सकता है, उसके लिए काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। रूखसाना ने कहा, कि परिवार का पेट भरना है, इसीलिए हमें ये काम भी करना हो होगा। एक अन्य घरेलू सहायिका, दिलशाद बेगम ने भी कहा, "खाना बहुत मुश्किल हो गया है ... हम एक बार पकाते हैं और तीन बार खाते हैं।"

महंगाई से बचत करना नामुमकिन
पाकिस्तान में महंगाई ने कई व्यवसायों को बंद करने के लिए मजबूर कर दिया है। कुछ छोटे दुकानदारों का कहना है, कि उनके पास कोई बचत नहीं बची है, और बढ़ती कीमतों के कारण उन्हें शायद ही कोई खरीदार मिल रहा है। डॉन की रिपोर्ट में एक छोटे से दुकान के मालिक नदीम उद्दीन सिद्दीकी के हवाले से कहा गया है, कि "मैं एक व्यवसायी हूं, और मेरा व्यवसाय महंगाई के कारण बहुत प्रभावित हुआ है। पहले मुझे सामान खरीदने के लिए हर महीने 50 हजार रुपये लगते थे और अब मुझे एक लाख रुपये खर्च करना होता है, जबकि खरीदने के लिए काफी कम लोग आते हैं, क्योंकि उनके पास भी पैसा नहीं है।" उन्होंने कहा, 'इस महंगाई की वजह से मेरे जीवन भर की जमा पूंजी खत्म हो गई है।'

रुपये के पतन से बुरा हाल हुआ
डॉलर के मुकाबले, कमजोर पाकिस्तानी रुपया देश के लोगों पर भारी पड़ रहा है। जो लोग विदेशी संगठनों के लिए काम कर रहे हैं, और जिन्हें विदेशी मुद्रा में भुगतान किया जाता है, उनका कहना है कि मुद्रा के एक्सचेंज के बाद वे मुश्किल से कुछ बचा पाते हैं। डॉन की रिपोर्ट में कराची के 26 साल के फ्रीलांसर दनियाल सत्तार के हवाले से कहा गया है, जो विदेशी ग्राहकों के लिए काम करते हैं, और कहते हैं, कि बेतहाशा महंगाई और पाकिस्तानी रुपये के पतन के कारण अब वो अपनी बचत डॉलर में रखते हैं। उन्होंने कहा, कि पहले जब उन्हें किसी प्रोजेक्ट के लिए 1000 डॉलर का भुगतान मिलता था, तो वह 500-600 डॉलर को रुपये में बदल देते थे और बाकी को अपने विदेशी मुद्रा खाते में रखते थे। शाहबाज शरीफ सरकार पर आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा, 'सत्ता में बैठे लोग वही गलतियां दोहराते रहते हैं और इसकी कीमत गरीबों को चुकानी पड़ती है। ऐसा कुछ भी नहीं है जो वे (सरकार) पहले से नहीं जानते हैं।" उन्होंने कहा, "मैं वही कहूंगा जो कोई और पाकिस्तानी कहेगा...अमीरों पर टैक्स लगाएं , प्लीज गरीबों को बख्श दें।"
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'दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल'
पाकिस्तानी अखबार डॉन की एक रिपोर्ट में दयनीय स्थिति को दिखाया गया है। सुरक्षा गार्ड के तौर पर काम करने वाले 55 साल के इमाम अली ने डॉन से बात करते हुए कहा, कि "अगर हमारे बच्चे कुछ मांगते हैं, तो हम बहाने बनाते हैं। अगर हम एक वक्त खाना खाते हैं, तो हम उस वक्त दूसरे वक्त का खाना कैसे जुटाएं, इसके बारे में सोचते रहते हैं। ... हम बच्चों को सिर्फ सोने के लिए कहते हैं"। इमाम अली ने कहा, "हम पूरी तरह से अल्लाह पर निर्भर हैं, हम इस महंगाई में गुज़ारा नहीं कर सकते हैं।" आपको बता दें, कि 2020 की बाढ़ में पाकिस्तान की एक बड़ी गरीब आबादी ने अपना फसल और पशुधन का बड़ा हिस्सा खो दिया है, जिससे उनकी स्थिति और भी ज्यादा विकराल हो गई है। अली, जिनका मासिक वेतन 15,000 रुपये है, वो कहते हैं, कि वह अपने आठ बच्चों को स्कूल नहीं भेज सकते हैं, क्योंकि बच्चों को पढ़ाने की उनकी औकात नहीं है। उन्होंने कहा, 'बच्चों को पढ़ाना हमारी औकात के बाहर की चीज है।'












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