कराची से काबुल तक...चीनी नागरिकों पर हो रहे हैं भीषण हमले, पाकिस्तान के डेंजरस गेम का खुलासा
पाकिस्तान खुद आर्थिक संकट में फंसा हुआ है, लेकिन वो अफगानिस्तान से अपना नियंत्रम कम होते नहीं देखना चाहता है। इसके साथ ही तालिबान की धमकियों का भी पाकिस्तान जवाब देना चाहता है।

Pakistan Hand In Afghanistan Attack: अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में 11 जनवरी की शाम को हुए भीषण बम धमाके में पाकिस्तान की मिलीभगत की रिपोर्ट आ रही है। बताया जा रहा है, कि काबुल में आत्मघाती बम धमाके के पीछे पाकिस्तान का हाथ हो सकता है, जिसमें चीनी नागरिकों को निशाना बनाया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक, काबुल में चीनी प्रतिनिधिमंडल को निशाना बनाकर ये आत्मघाती हमला किया गया था, जिसमें कम से कम 20 लोग हताहत हो गये हैं।

चीनी नागरिकों को निशाना बनाकर हमला
राजधानी काबुल में चीनी प्रतिनिधिमंडल को निशाना बनाकर उस वक्त हमल किया गया, जब अफगानिस्तान विदेश मंत्रालय में चीनी प्रतिनिधिमंडल और तालिबान के अधिकारियों के बीच मुलाकात होने वाली थी। उसी वक्त हमलावर ने खुद को बम धमाके में उड़ा लिया, जिसमें कम से कम 20 लोग मारे गये हैं। इस भीषण बम धमाके की जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट खुरासान ने ली है, जो पाकिस्तान का बनाया एक प्रॉक्सी ऑर्गेनाइजेशन है। अफगानिस्तान के विदेश मंत्रालय के बाहर बुधवार का हमला एक महीने से भी कम समय में दूसरा भीषण हमला था, जिसमें अफगानिस्तान में रहने वाले चीनी नागरिक प्रमुख लक्ष्य थे। इससे पहले 10 दिसंबर 2022 को इस्लामिक स्टेट-खुरासान (IS-K) के सदस्यों ने उस होटल पर हमला किया था, जहां अक्सर चीनी कारोबारी ठबरते हैं, उस हमले में कम से कम पांच चीनी नागरिक घायल हो गए थे।

पाकिस्तान का डेंजरस गेम
नई दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट स्टडीज के सीनियर रिसर्च फेलो अभिजीत अय्यर-मित्रा ने इंग्लिश न्यूज चैनल WION से बात करते हुए कहा कि, इस्लामिक स्टेट-खुरासन "पूरी तरह से पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (IS-I) का निर्माण है।" अय्यर-मित्रा ने कहा, कि "बार-बार यह साबित हुआ है, कि इस्लामिक स्टेट-खुरासान (आईएस-के) एक पाकिस्तानी क्रिएशन है।" एक्सपर्ट्स बताते हैं, कि अफगान और पाकिस्तानी पश्तून, इस्लामिक स्टेट ऑफशूट की बाहरी परत के सार्वजनिक चेहरे के रूप में काम करते हैं। यह क्रिएशन आईएस-के सदस्यों को खतरनाक अफगानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र में पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत की तरफ आथंकी हमले करने की इजाजत देती है।

इस्लामिक स्टेट और तालिबान में कैसा संबंध?
साल 2021 के अगस्त महीने में अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना के नाटकीय रूप से बाहर निकलने और बाद में काबुल में लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित अशरफ गनी सरकार के गिरने के बाद तालिबान ने देश के जेलों के गेट खोल दिए थे और तमाम कैदियों को रिहा कर दिया था। अटल अहमदजई ने अपने अक्टूबर 2022 के शोध पत्र में इस बात पर रिसर्च रिपोर्ट सार्वजनिक किया था, कि इस्लामिक स्टेट-खुरासान (आईएस-के) के सूत्रों से संकेत मिलता है, कि तालिबान ने काबुल पर कब्जा करने से ठीक पहले 2000 से ज्यादा आईएस-के लड़ाकों को रिहा कर दिया था। रिहा किए गए कैदियों में वो आतंकी भी शामिल थे, जिसने 26 अगस्त 2021 को काबुल हवाई अड्डे पर आत्मघाती बम हमला किया था, जिसमें 170 अफगान नागरिक और 13 अमेरिकी सैनिक मारे गए थे। लेकिन, इस हमले के बाद तालिबान को लगने लगा, कि इस्लामिक स्टेट-खुरासान उसके लिए खतरनाक साबित हो सकता है, लिहाजा तालिबान ने आईएस-के सदस्यों के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया। आईएस-के सदस्यों के खिलाफ तालिबान अभियान में सिर कलम करना, डूबो कर मारना और मौके पर ही फांसी देना शामिल है, जिससे आईएस-के के कई सदस्य पड़ोसी पाकिस्तान में शरण लेने के लिए प्रेरित किया है।

पाकिस्तान का हाथ होने का शक क्यों?
अभिजीत अय्यर-मित्रा ने तर्क दिया, कि पाकिस्तान नहीं चाहता है कि "अपने अलावा कोई भी अफगानिस्तान को नियंत्रित करे"। उन्होंने कहा कि, "इस तरह के हमले सीधे चीनी सरकार-से-अफगानिस्तान के मौजूदा शासकों तालिबान से संपर्क को रोकने का एक तरीका है। यह अफगान राज्य की एजेंसी को नीचा दिखाने का एक तरीका है। यह चीनियों को एक चेतावनी संकेत भेज रहा है, कि पाकिस्तान के बिना वो अफगानिस्तान से संबंध स्थापित नहीं कर सकता है। अय्यर-मित्रा के मुताबिक, मकसद और क्षमता के मामले में यहां मूल रूप से सब कुछ सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान की ओर इशारा करता है। वहीं, फोरम फॉर स्ट्रैटेजिक इनिशिएटिव के कार्यकारी निदेशक ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) अरुण सहगल के मुताबिक, काबुल में विदेश मंत्रालय के बाहर 11 जनवरी का हमला इस बात को उजागर करता है, कि "तालिबान राजनीतिक नेतृत्व पूरी तरह से देश के मामलों के नियंत्रण में नहीं है।"
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पाकिस्तान का मकसद क्या है?
ऐसा माना जा रहा है, कि पाकिस्तान तालिबान को संदेश देना चाहता है, कि पाकिस्तान में टीटीपी के हमलों को रोकने में तालिबान मदद करे, नहीं तो वो अफगानिस्तान को भी चैन से नहीं रहने देगा। टीटीपी को लेकर पाकिस्तान और तालिबान के संबंध काफी तनावपूर्ण हो गये हैं और दोनों देशों के नेताओं की तरफ से उत्तेजक बयानबाजी की जा रही है, लिहाजा पाकिस्तान अब ये दिखाना चाहता है, कि वो जब चाहे अफगानिस्तान में धमाके करवा सकता है। वहीं, पाकिस्तान की तरफ से तालिबान को यह संदेश देने की भी कोशिश की गई है, कि अगर तालिबानी अधिकारी उसकी बात नहीं मानते हैं, तो वो अफगानिस्तान में चीनी निवेश नहीं होने देगा और हर चीनी निवेश में तालिबान को पाकिस्तान को शामिल करना ही होगा।












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