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पाकिस्तान: इमरान सरकार ने पबजी क्यों बैन किया

पाकिस्तान: इमरान सरकार ने पबजी क्यों बैन किया

पाकिस्तान का इस्लामाबाद हाई कोर्ट जल्द ही इस बात पर फ़ैसला सुनाएगा कि लोकप्रिय मोबाइल गेम पबजी (PubG) पर पीटीए यानी पाकिस्तान टेली कम्युनिकेशन अथॉरिटी ने जो बैन लगाया है वो जायज़ है या नहीं.

पीटीए ने अदालत में पबजी द्वारा दायर की गई याचिका का विरोध किया है जबकि मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस फ़ारूक़ी ने पाकिस्तान टेली कम्युनिकेशन अथॉरिटी से अदालत में पूछा है कि "किस क़ानून के तहत आपने ये बैन लगाया है".

पीटीए के वक़ील ने अपनी दलील में कुछ ऐसा कहा जिससे पाकिस्तान में एक नई बहस शुरू हो चुकी है.

उन्होंने कहा, "उन तमाम चीज़ों के अलावा जो बच्चों-युवाओं की मानसिक और शारीरिक सेहत को नुक़सान पहुँचाती हैं, पबजी गेम में कुछ ग़ैर-इस्लामिक चीज़ें हैं".

जानकरों का कहना है कि पाकिस्तान में कुछ ऐसे ही आरोप टिकटॉक पर भी लग सकते हैं क्योंकि उसे भी बैन करने की माँगे बढ़ती जा रही हैं.

उधर पबजी को पसंद करने वालों ने सरकार के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपने विरोध का स्वर बढ़ा दिया है और इस गेम के खिलाड़ियों और समर्थकों ने पंजाब-सिंध इलाक़े में धरना-प्रदर्शन करने की धमकियाँ दी हैं.

पाकिस्तान: इमरान सरकार ने पबजी क्यों बैन किया

वजह

पाकिस्तान की इमरान खान सरकार पर पबजी गेम को बैन करने का दबाव तब और बढ़ गया था जब कुछ आत्महत्याओं की ख़बरें पूरे देश में न सिर्फ़ प्रमुखता सी छपीं बल्कि उनके मक़सद पर टीवी चैनलों पर कई दिनों बहस होती रही.

इस्लामाबाद में बीबीसी संवाददाता शुमाला जाफ़री के मुताबिक़, "मामले की शुरुआत क़रीब दो हफ़्ते पहले लाहौर से हुई जब दो युवा लड़कों ने ख़ुदख़ुशी कर ली थी. पुलिस अधिकारियों ने बाद में बताया कि इनके माँ-बाप ने इन्हें पबजी खेलने से मना किया था लेकिन उनकी बात अनसुनी कर दी गई थी. इसके बाद पुलिस ने पीटीए से इस गेम को बैन करने की गुज़ारिश की. पीटीए ने इस्लामाबाद हाई कोर्ट में भी ये दलील दी है कि इस गेम के चलते बच्चे बिगड़ रहे हैं और, उनका समय बर्बाद हो रहा है."

सोशल मीडिया में इस बात को लेकर ख़ासी बहस छिड़ी हुई है कि पाकिस्तान में जब भी इस तरह के मसले होते हैं तो बजाय उनका समाधान ढूँढने के सीधे बैन कर दिया जाता है.

फ़ेसबुक और ट्विटर पर #UnBanPUBGPakistan और #PUBGKaJawabDou जैसे हैशटैग वायरल हो रहे हैं और इन्हें शेयर करने वाले ज़्यादातर लोगों का मत है कि "सरकार किसी मामले को सुलझाने के बजाय उससे छुटकारा पाने की नीति अपना लेती है'.

हालाँकि ये पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान में किसी वीडियो गेम के ख़िलाफ़ इस तरह की सख़्ती बरती गई हो.

एसोसिएटेड रिपोर्टर्स एब्रॉड की दक्षिण एशिया संवाददाता नायला इनायत ने 'द प्रिंट' वेबसाईट में लिखा है कि, "ये पहली बार नहीं जब पाकिस्तान ने कोई वीडियो गेम बैन किया है. 2013 में कॉल आफ़ ड्यूटी और मेडल आफ़ ऑनर जैसे गेम इसलिए बैन किए गए क्योंकि उनमे पाकिस्तान को "चरमपंथियों के छुपने की जगह' दिखाया गया था. फिर 2017 में वलक्यरी ड्राइव पर बैन इसलिए उसमें समलैंगिकता का मुद्दा उठाया गया था".

पाकिस्तान: इमरान सरकार ने पबजी क्यों बैन किया
Getty Images
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हासिल क्या

बड़ा सवाल ये है कि आख़िर इस बैन से कितना फ़र्क़ पड़ेगा और इस बैन के पीछे कोई और मंशा तो नहीं है.

पाकिस्तान के कई युवाओं की दलील है कि सरकार इस तरह के "अनडेमोक्रेटिक" फ़ैसला लेकर समाज के "एक ख़ास वर्ग को ख़ुश करना चाहती है बस".

कराची शहर की फिरदौस कॉलोनी के रहने वाले कॉलेज छात्र रेहान अब्बास के मुताबिक़, "महीनों से लॉकडाउन वाले हालात हैं, कोरोना के चलते बच्चे-बूढ़े सब घरों में ही सुकून ढूँढ रहे हैं और सरकार ने पबजी पर ही पाबंदी लगा दी है. माना कि चंद लोगों ने इसका ग़लत इस्तेमाल किया, लेकिन 99% तो वो नहीं कर रहे न".

कुछ दूसरों का मत है कि पाकिस्तान सरकार इस बात को कैसे "नज़रंदाज़ कर सकती है कि पबजी दुनिया के सबसे ज़्यादा लोकप्रिय और रेवेन्यू कमाने वाले मोबाइल गेम में से एक है".

ज़ाहिर है, इस तरह के क़दम से न सिर्फ़ गेम खेलने वालों बल्कि उन गेम-डिवेलपर्स को भी दोबारा सोचने पर मजबूर किया होगा जो मनोरंजक मोबाइल गेम बनाने में लगे होंगे.

जाने-माने टीवी होस्ट वक़ार ज़का का मत है कि, "ये वही बात हो गई जब कुछ साल पहले पाकिस्तान में यूट्यूब पर रोक लग गई थी. भले ही बाद में वो हटी लेकिन डिजिटल इंडस्ट्री को इस तरह के फ़ैसलों से बड़ा नुक़सान होता रहता है".

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बहस

पाकिस्तान में पबजी पर लगे बैन पर छिड़ी बहस अब राजनीतिक रंग लेने की कगार पर भी दिखती है.

देश की राजनीति पर नज़र रखने वालों का कहना है कि "युवाओं के ज़बरदस्त समर्थन" पर सत्ता में आई इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ (पीटीआई) पार्टी "के कुछ फ़ैसले युवाओं के ख़िलाफ़ ज़रूर दिखे हैं".

लेकिन इस बात में भी कोई शक़ नहीं है कि आज भी पाकिस्तान में इमरान खान की लोकप्रियता के पीछे युवाओं का बड़ा हाथ है जो उनके राजनीतिक आंदोलन में बरसों तक बिना किसी बड़ी कामयाबी के भी जुड़े रहे थे.

ज़ाहिर है, सवाल उठेंगे कि क्या युवाओ में लोकप्रिय पबजी जैसे गेम पर लिए गए फ़ैसलों का असर इमरान खान के फ़ैन-बेस पर भी पड़ेगा क्या?

इस्लामाबाद में 'इंडिपेंडेंट उर्दू' अख़बार के संपादक हारून राशिद का कहना है कि "पाकिस्तान में पबजी कितना लोकप्रिय है, ये आँकड़े किसी के पास नहीं हैं. रही बात इमरान ख़ान की तो उनकी पहचान एक दक्षिणपंथी रूढ़िवादी नेता की होती चली गई है और वो भी धर्म के नाम पर".

बीबीसी उर्दू सेवा के वरिष्ठ पत्रकार आरिफ़ शमीम की राय थोड़ी अलग है क्योंकि उन्हें नहीं लगता इस बैन से इमरान के युवा फ़ैन बेस में कोई कमी आएगी.

उन्होंने बताया, "युवा समर्थकों में इमरान ने ख़ुद को मसीहा जैसा स्थापित कर रखा है और उनके भक्त आंख बंद कर उनका अनुसरण करते हैं. हाल ही में उनके एक समर्थक और लोकप्रिय गायक ने बिलावल भुट्टो ज़रदारी के बारे में अभद्र सा कमेंट किया तब भी लोग उनके समर्थन में उतर आए. वजह गायक की लोकप्रियता नहीं थी बल्कि इमरान पर उस गायक का भरोसा था. आर्थिक मुश्किलों, ऊर्जा की क़िल्लत, कोरोना वायरस से निपटने की दिशाहीन नीतियों के बावजूद इमरान के समर्थक इन मुद्दों पर चुप रहना पसंद करते हैं, सवाल उठाना नहीं. पाकिस्तान के लिए ये ज़्यादा बड़ी चिंता है."

पाकिस्तान में इमरान खान की सरकार और उसके काम-काज पर कथित तौर से बढ़ते हुए "फ़ौजी प्रभाव" की ख़बरें भी पिछले छह महीनों में तेज़ हुई.

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हालाँकि पाकिस्तान फ़ौज ने सरकार के काम-काज में "किसी क़िस्म की दख़लंदाज़ी से इनकार" किया है लेकिन सियासी इतिहास को ध्यान में रखते हुए इसे सिरे से ख़ारिज भी नहीं किया जा सकता.

फ़िलहाल तो पाकिस्तान में पबजी के भविष्य पर इस्लामाबाद हाई कोर्ट को अपने फ़ैसला सुनाना है. फ़ैसला जिसके भी पक्ष में होगा, उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी जा सकती है.

हारून रशीद को लगता है कि इमरान सरकार कुछ फ़ैसले अप्रत्यक्ष तौर से भी ले रही है.

उन्होंने कहा, "टेली कम्युनिकेशन अथॉरिटी ने भले ही अदालत से कहा है कि ये गेम ग़ैर-इस्लामिक और अभद्र है लेकिन ये नहीं बताया कि ये राय सरकार के किस धड़े की है. ज़ाहिर है, पीटीए भी देश की उन शक्तिशाली ऐजेंसीस के प्रभाव में है जो आमतौर से सभी बड़े फ़ैसले लेती हैं. ये ऐजेंसीस आपस में तय कर लेती हैं कि ग़ैर-पाकिस्तानी क्या है, ग़ैर-इस्लामिक क्या है और उस कॉन्टेंट को हटा देती हैं. मुद्दे की बात यही है कि चुनाव जीतने के समय इमरान के 'बदलाव' लाने वाले नारे के बावजूद कुछ बदला नहीं है".

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