पाकिस्तान में कट्टरपंथी संगठनों के चुनाव लड़ने पर नहीं लगेगी रोक, सीनेट में नकेल कसने वाला बिल गिरा
Pakistan News: पाकिस्तान में कट्टरपंथी संगठनों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने वाला बिल सीनेट में गिर गया है और इसके साथ ही तय हो गया है, कि इस साल जब पाकिस्तान में आम चुनाव होंगे, तो तहरी-ए-लब्बैक जैसे संगठन चुनाव लड़ पाएंगे।
पाकिस्तानी सीनेट के चेयरमैन सादिक संजरानी ने रविवार को 'हिंसक चरमपंथ रोकथाम विधेयक' को खारिज कर दिया है, जिसमें "किसी भी चरमपंथी या हिंसक" संगठन को चुनाव लड़ने से रोकने की मांग की गई थी।

पाकिस्तान के राज्य मंत्री शहादत अवान ने इस विधेयक को पेश किया था, जिसे आगे की कार्यवाही रोकने के लिए सीनेट में खारिज कर दिया गया है, क्योंकि सीनेट के सदस्यों ने कानून पर निराशा जताई थी और कहा था, कि इसके "दूरगामी परिणाम" होंगे।
वहीं, सीनेट अध्यक्ष ने बिल पर अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा, कि "सरकार यह तय कर सकती है, कि वह इस बिल को आगे बढ़ाना चाहती है या नहीं... लेकिन अभी के लिए, मैं इसे खारिज कर रहा हूं।"
कट्टरपंथी संगठनों के खिलाफ लाया गया बिल क्यों गिरा?
पाकिस्तान में कट्टरपंथी संगठनों के खिलाफ लाया गया ये बिल इसलिए गिरा, क्योंकि देश में मौजूद कई कट्टरपंथी जमातों की जनता के बीच काफी गहरी पकड़ है और अगर ये बिल पास कर दिया जाता और अगर इसे कानून बना दिया जाता, तो शहबाज सरकार को चुनाव में बड़ा झटका लग सकता था।
उदाहरण के लिए, तहरीक-ए-लब्बैक, जिसने फ्रांसीसी राजदूत को देश से बाहर निकालने के लिए इमरान खान कार्यकाल के दौरान देश में हिंसक प्रदर्शन किए थे, उसे पिछले चुनाव में करीब 28 लाख वोट मिले थे।
लिहाजा, सीनेट में बहुमत के विरोध के मद्देनजर इस विधेयक को गिरा दिया गया। सीनेट में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के सीनेटरों और सत्तारूढ़ गठबंधन के उन हिस्सों, जिनमें बलूचिस्तान नेशनल पार्टी (बीएनपी) के सीनेटर ताहिर बिजेंजो भी शामिल थे, उन्होंने इस बिल का विरोध किया था।
सीनेटरों ने शिकायत की थी, कि इस तरह के फैसले केवल दो राजनीतिक दलों - पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) और पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) - के इशारे पर बिना किसी परामर्श के लिए जाते हैं।
उन्होंने अपने विरोध का कारण बताते हुए विधेयक को "लोकतंत्र के लिए खतरनाक" भी बताया।
सीनेटरों ने कहा कि विधेयक के विरोध का मुख्य कारण यह है, कि इसे एक विशिष्ट राजनीतिक दल को निशाना बनाने के लिए पेश किया जा रहा है, लेकिन भविष्य में इसे दूसरों के खिलाफ भी हथियार बनाया जाएगा।
सीनेटरों ने कहा, कि इस तरह के कानून को इतिहास में अच्छी तरह से याद नहीं किया जाएगा और इससे देश में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों को नुकसान होगा।
जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम पाकिस्तान (फजल) के सीनेटर कामरान मुर्तजा और सीनेटर अब्दुल गफूर हैदरी ने एक के बाद एक बिल के खिलाफ अपने विरोध की घोषणा की।
इमरान खान की पार्टी को डर है, कि इस बिल के जरिए उनकी पार्टी पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है, क्योंकि 9 मई को पाकिस्तान में सेना के खिलाफ जो हिंसा हुआ था, शहबाज शरीफ की सरकार उसके लिए इमरान खान की पार्टी को जिम्मेदार ठहरा रही है।
जमात-ए-इस्लामी के सीनेटर मुश्ताक अहमद ने कहा कि इस विधेयक का उद्देश्य राजनीतिक दलों और लोकतंत्र को हराना है। उन्होंने कहा, कि "यह बिल लोकतंत्र के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा।"
बिल में ऐसा क्या 'खतरनाक' था?
शहबाज शरीफ की सरकार की तरफ से जो बिल पेश किया गया था, उस मसौदे में हिंसक उग्रवाद को राजनीतिक, धार्मिक, सांप्रदायिक या वैचारिक मान्यताओं से उत्पन्न उकसावे, समर्थन, धमकी और हिंसा और शत्रुता के उपयोग के रूप में परिभाषित किया गया है।
इस विधेयक मे हिंसक उग्रवाद में शामिल व्यक्तियों या समूहों को वित्तपोषण और सुरक्षा के खिलाफ कानून बनाने की बात कही गई है और ऐसे आरोपों में शामिल तत्वों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाना शामिल है।
इस विधेयक के तहत, हिंसक व्यक्तियों और नेताओं, अधिकारियों और कार्यकर्ताओं सहित हिंसक संगठनों से जुड़े लोगों को 90 दिनों से लेकर 12 महीने तक की हिरासत का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, पीड़ित व्यक्ति को उच्च न्यायालय में अपील करने का अधिकार बरकरार रहेगा।
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