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SAARC के लिए गिड़गिड़ाए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री, भारत के 'सेंन्ट्रल एशिया' प्लान से घबराए

सार्क को लेकर भारत की उम्मीदें लगातार टूटती चली गईं और 2016 में उरी हमले के बाद भारत ने उस साल पाकिस्तान में होने वाली सार्क सम्मेलन में भाग लेने से मना कर दिया। भारत के बाद बांग्लादेश और अफगानिस्तान ने भी मना कर दिया।

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Pakistan News: भारत के प्लान सेन्ट्रल एशिया से पाकिस्तान घबराता हुआ नजर आ रहा है और इसलिए पाकिस्तान अब 'सार्क' को फिर से जिंदा करने के लिए गिड़गिड़ा रहा है। पाकिस्तान के प्रधान मंत्री शहबाज शरीफ ने कहा है कि, पाकिस्तान इस क्षेत्र की विशाल क्षमता का दोहन करने के लिए दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) को पुनर्जीवित करने में अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का सार्क को लेकर प्रेम अचानक नहीं जागा है, बल्कि, पिछले दो सालों में भारत ने सेन्ट्रल एशिया में बढ़त बनाने के लिए जिस मिशन का आगाज किया हुआ है, उसे देखते हुए पाकिस्तान को डर है, कि कहीं मुस्लिम देशों में ही उसकी जमीन खिसक ना जाए।

सार्क पर क्या बोला पाकिस्तान

सार्क पर क्या बोला पाकिस्तान

साउथ एशिया एसोसिएशन फॉर रिजनल कॉर्पोरेशन (SAARC) को लेकर भारत की उदासीनता ने पाकिस्तान को चिंतित कर रखा है और अगर अगर सार्क पर भारत ध्यान नहीं देता है, तो फिर ये संगठन बेमतलब और बेमकसद हो जाता है। लिहाजा, माना जा रहा है, कि सार्क को पुर्नर्जीवित करने की इच्छा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने यूं ही नहीं दिखाई है, बल्कि सार्क के जरिए पाकिस्तान एक बार फिर से भारत से जुड़ने की मंशा रखता है। शहबाज शरीफ की ये टिप्पणी गुरुवार को सार्क चार्टर दिवस के मौके पर आई है। शहजाब शरीफ ने ट्वीट करते हुए कहा कि, "सार्क चार्टर दिवस आज दक्षिण एशिया के देशों के बीच क्षेत्रीय विकास, कनेक्टिविटी और सहयोग की विशाल क्षमता की याद दिलाता है।" उन्होंने यह भी कहा कि, सार्क देशों के लोग "इन छूटे हुए अवसरों के शिकार" हैं और "पाकिस्तान सार्क के पुनरुद्धार के लिए अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार है।"

क्या है SAARC, क्या है मकसद?

क्या है SAARC, क्या है मकसद?

सार्क के सदस्यों में अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका शामिल हैं और ये सभी देश भारत के पड़ोसी देश हैं और सार्क के विकास के लिए अतीत में भारत ने काफी अहम भूमिका निभाई है और काफी काम भी किए हैं। लेकिन, पाकिस्तान द्वारा बार बार आतंकवाद फैलाने के बाद भारत का सार्क को लेकर मोहभंग होता चला गया और मोदी सरकार सार्क के प्रति पूरी तरह से उदासीन हो गई। अपनी स्थापना के कम के कम 25 साल बीत जाने के बाद भी आठ सदस्यीय सार्क बॉर्क ने काफी कम प्रगति की है। सार्क के विकास नहीं होने के पीछे की सबसे बड़ी वजह भारत और पाकिस्तान के बीच चलने वाला निरंतर विवाद है और भारत की मोदी सरकार ने साल 2016 में पाकिस्तान में होने वाले सार्क के 19वें शिखर सम्मेलन में भाग लेने से इनकार कर दिया, जिसके बाद सार्क पूरी तरह से 'शांत' हो गया।

सार्क के प्रति क्यों भारत हुआ उदासीन

सार्क के प्रति क्यों भारत हुआ उदासीन

हालांकि, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से भारत हमेशा से परेशान रहा है, लेकिन साल 2016 में भारत के उरी में भारतीय सेना के शिविर पर हुए आतंकी हमले के बाद भारत के धैर्य ने जवाब दे दिया। उस आतंकी हमले के पीछे पाकिस्तान स्थिति जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादियों का हाथ था और फिर भारत ने उस साल होने वाले सार्क शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने से मना कर दिया। वहीं, भारत के सार्क में हिस्सा लेने से मना करने के बाद बांग्लादेश, भूटान और अफगानिस्तान नें भी बैठक में भाग लेने से इनकार कर दिया, जिसके बाद सार्क शिखर सम्मेलन को रद्द कर दिया गया। 2016 में सार्क सम्मेलन रद्द होने के बाद पिछले 6 सालों से सार्क की कोई बैठक नहीं हुई है। लेकिन, अब अचानक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को सार्क की याद आ गई है और माना जा रहा है, कि इसके पीछे भारत सरकार का मध्य एशिया में विस्तार कार्यक्रम है।

सेंन्ट्रल एशिया के लिए भारत का प्लान

सेंन्ट्रल एशिया के लिए भारत का प्लान

भारत बहुच अच्छी तरह से जानता है, कि अफगानिस्तान का तालिबान शासन उसे कभी भी धोखा दे सकता है, लिहाजा भारत ने मध्य एशिया से कनेक्टिविटी जोड़ने के लिए काफी अलग शुरूआत कर रखी है, जिससे तालिबान के ऊपर काफी प्रेशर है। मध्य एशिया में आने वाले तमाम देश, जैसे किर्किस्तान, ताजिकिस्तान, कजाखस्तान और उज्बेकिस्तान, ये तमाम देश अफगानिस्तान के पड़ोसी देश हैं और इसी हफ्ते भारतीय नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर अजीत डोभाल ने इन देशों के साथ आतंकवाद, क्षेत्रीय सुरक्षा और रीजनल कनेक्टिविटी को बढ़ाने को लेकर चर्चा की है। लिहाजा, पाकिस्तान के कान खड़े हैं और उस अब सार्क की याद आ रही है। मध्य एशिया में भारत कितना मजबूत कदम रख चुका है, इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं, कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मध्य एशियाई देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ एक अलग बैठक की है, जिसके मुताबिक, भारत की प्लानिंग ईरान में अपने बनाए चाबहार बंदरगाह होते हुए अफगानिस्तान के रास्ते मध्य एशिया तक पहुंचने की है।

प्लान मध्य एशिया में कामयाब होता भारत

प्लान मध्य एशिया में कामयाब होता भारत

भारत अपने इस प्लान में काफी हद तक कामयाब हो चुका है, क्योंकि ईरान बार बार भारत से व्यापारिक रिश्ते को एक बार फिर से बढ़ाने की अपील कर रहा है और दो महीने पहले पीएम मोदी और ईरानी राष्ट्रपति की उज्बेकिस्तान के समरकंद में बैठक भी हुई थी, जिसके बाद ऐसी रिपोर्ट्स हैं, कि भारत ईरान से तेल खरीदने पर विचार कर रहा है। वहीं, तालिबान भारत से बार बार अफगानिस्तान में अपने रूके हुए काम को फिर से शुरू करने की अपील कर रहा है, जिसके बाद भारत काबुल में अपने दूतावास फिर से खोल चुका है। वहीं, मध्य एशिया के लिए अगल भारत व्यापार मार्ग बना लेता है, तो फिर भारतीय सामानों की बिक्री के लिए तो एक विशालकाय बाजार तो खुलेगा ही, इसके साथ ही मध्य एशियाई देशों के साथ मिलकर भारत, तालिबान को काफी हद तक भारत विरोधी कार्रवाई में शामिल होने से रोक सकता है।

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