Pakistan में महाशिवरात्रि पर संकट का साया, कटासराज मंदिर यात्रा रोकी! खंडहर मंदिरों में अटकी हिन्दुओं की आस्था
Pakistan में हर साल मनाई जाने वाली शिवरात्रि में इस साल रौनक थोड़ी कम देखने को मिलेगी। महाशिवरात्रि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिन्दुओं द्वारा मनाए जाने वाले बड़े त्योहारों में से एक है। जिसमें न सिर्फ पाकिस्तान के बल्कि भारत से भी बड़ी तादाद में हिन्दू वहां के प्राचीन मंदिरों में जाकर पूजा-अर्चना करते रहे हैं। तो फिर इस बार ऐसा क्या है कि जो रौनक थोड़ी फीकी रहने वाली है, जानेंगे इस आर्टिकल में।
हजारों साल पुराने मंदिर हुए खंडहर
पाकिस्तान में कई प्राचीन हिंदू मंदिर आज भी मौजूद हैं। इन मंदिरों की वास्तुकला में भारतीय शैली की साफ झलक मिलती है। उदाहरण के तौर पर तेजा सिंह मंदिर की भव्य नक्काशी आज भी कला का शानदार नमूना मानी जाती है। लेकिन दुख की बात यह है कि कई मंदिर उपेक्षा या कट्टरपंथी तत्वों की वजह से ये मंदिर क्षतिग्रस्त हो चुके हैं, जिससे उनकी हालत चिंताजनक बनी हुई है।

900 साल पुराना शिव मंदिर और सूखता पवित्र सरोवर
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित लगभग 900 साल पुराना कटास राज (Katas Raj Temple) हिंदुओं के लिए एक प्रमुख तीर्थ स्थल है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब माता सती ने देह त्याग किया तो भगवान शिव की आंखों से दो आंसू गिरे। एक आंसू कटास में गिरा, जिससे अमृत कुंड सरोवर बना, और दूसरा अजमेर में गिरा, जहां पुष्कर तालाब (Pushkar Lake) तीर्थ स्थापित हुआ। दुर्भाग्य से, देखरेख की कमी के कारण कटास का पवित्र सरोवर अब सूख चुका है, जो श्रद्धालुओं के लिए बेहद दुखद है।

महाशिवरात्रि का मुख्य उत्सव भी चकवाल क्षेत्र के इसी कटासराज मंदिर में आयोजित होता आया है। यह मंदिर हर साल एक भव्य समारोह की मेजबानी करता था, जहां दोनों देशों से सैकड़ों श्रद्धालु पहुंचते थे।
1000 साल पुराना शिव मंदिर, जिस पर दागे बम
पाकिस्तान के सिंध प्रांत के उमरकोट में लगभग 1000 साल पुराना एक प्रसिद्ध शिव मंदिर स्थित है। ऐतिहासिक स्रोत बताते हैं कि इसका निर्माण 10वीं सदी में हुआ था, यानी यह भारत के Khajuraho Temples के समकालीन है। विभाजन के बाद इस प्राचीन धरोहर को कट्टरपंथियों ने विस्फोटकों से भारी नुकसान पहुंचाया। इसके बावजूद यह मंदिर इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।

कराची का 150 साल पुराना रत्नेश्वर महादेव मंदिर
कराची शहर में लगभग 150 साल पुराना Ratneshwar Mahadev Temple स्थित है। यह एक विशाल शिव मंदिर है, जहां कई देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं। हर रविवार यहां भंडारा आयोजित किया जाता है। हालांकि, यह मंदिर भी कट्टरपंथियों के हमलों से अछूता नहीं रहा। 2014 में पाकिस्तानी हिंदुओं ने इसे बचाने के लिए एक मुहिम चलाई थी। यहां अभी भी हर साल शिवरात्रि पर भारी भीड़ होती है।

चित्ती गट्टी का 2000 साल पुराना शिवलिंग
चित्ती गट्टी क्षेत्र में स्थित शिव मंदिर हिंदू समुदाय के लिए ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व रखता है। इसके गर्भगृह में लगभग 2000 साल पुराना शिवलिंग स्थापित है। यहां रोजाना पूजा नहीं होती, लेकिन महाशिवरात्रि के दिन हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। मंदिर में शिवलिंग के अलावा गणेश, शिव-पार्वती, काली और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं। यहां देवी दुर्गा की एक गुफा भी मौजूद है। यहां पर भी बड़ी तादाद में श्रद्धालु महाशिवरात्रि की पूजा करने पहुंचते हैं।

हमले का शिकार दादू जिले का 200 साल पुराना शिवालय
पाकिस्तान के दादू जिले के जोही इलाके में लगभग 200 साल पुराना शिव मंदिर है। स्थानीय लोग भगवान शिव को मुख्य देवता मानते थे। इसकी वास्तुकला बेहद खास है, लेकिन कट्टरपंथियों ने इसे बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया। अब यहां सिर्फ टूटी हुई मूर्तियों के अवशेष बचे हैं। वर्तमान में यहां कुछ ही हिन्दू कबीले रहते हैं, जो शिव के उपासक हैं। इस मंदिर वास्तुकला भारतीय और नेपाली शिव मंदिरों से मिलती-जुलती है।

पहलगाम हमले से रुकी कटासराज यात्रा रुकी
पहलगाम में हुए हमले की वजह भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध तनावपूर्ण रहे। लिहाजा इस साल भारतीय तीर्थयात्री पंजाब प्रांत स्थित कटासराज मंदिर में महाशिवरात्रि समारोह में शामिल नहीं हो पाएंगे। अब तक किसी जत्थे को भेजने की आधिकारिक जानकारी नहीं मिली है, जिससे श्रद्धालुओं में निराशा है। हालांकि जो लोग हर साल जाते थे उन्हें पाकिस्तान ने इस बार जाने की अनुमति नहीं दी।
पाकिस्तान सरकार का ढोंग
इन आयोजनों की खास बात यह है कि यहां सिर्फ हिंदू ही नहीं, बल्कि कुछ मुस्लिम और अन्य समुदायों के लोग भी शामिल होते हैं। स्थानीय नेता, धार्मिक प्रमुख और सामाजिक कार्यकर्ता भी इन समारोहों का हिस्सा बनते हैं। जो पाकिस्तान में अल्पसंख्यों पर हो जुल्म के बीच एक सकारात्मक पहल रखने की कोशिश करते हैं।
सरकार की हाजिरी वाली तैयारियां
पूरी साल अनदेखी करने के बाद पाकिस्तान सरकार महाशिवरात्रि के आयोजन के लिए नाम मात्र के इंतजाम करती है। न कोई खास बजट होता है, न चाक-चौबंद सुरक्षा और न ही श्रद्धालुओं के लिए कोई विशेष सुविधाएं। पूरे साल इन मंदिरों को टारगेट करने के बाद सरकार और आर्मी यहां हाजिरी लगाने के लिए मामलू कदम उठाते हैं। बावजूद इसके हिन्दू धर्म के लोग धूमधाम से अपना पर्व मनाते हैं।
पिछले साल क्या हुआ था?
आमतौर पर महाशिवरात्रि से तीन दिन पहले यात्रा शुरू होती है। पिछले साल पाकिस्तानी दूतावास ने 109 आवेदकों को वीज़ा जारी किए थे। श्रद्धालु अटारी सीमा पार कर लाहौर के Gurdwara Dera Sahib में रात रुककर कटासराज पहुंचे थे।
1982 से शुरू हुई तीर्थयात्रा की परंपरा
भारत विभाजन के बाद 1982 में बख्शी अश्चराज लाल बजाज के नेतृत्व में पहला भारतीय तीर्थयात्री समूह कटासराज गया था। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री Indira Gandhi के हस्तक्षेप से पाकिस्तान सरकार ने 200 भारतीयों को जाने की अनुमति दी थी। नवंबर 1999 में पूर्व लोकसभा अध्यक्ष Balram Jakhar के नेतृत्व में 25 सांसदों का एक दल भी यहां पहुंचा था।
नया गेस्ट हाउस और टूटी उम्मीदें
पिछले साल महाशिवरात्रि के दौरान एक दशक के इंतजार के बाद भारतीय तीर्थयात्रियों के लिए सुसज्जित अतिथि गृह तैयार हुआ था। तब 200 वीज़ा की सीमा हटाने का वादा भी किया गया था।लेकिन इस साल भारतीय श्रद्धालु इन समारोहों में शामिल नहीं हो पाएंगे, जिससे उनकी उम्मीदें टूट गई हैं।
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