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Pakistan News: बहुत बड़े संवैधानिक संकट में फंसा पाकिस्तान, सरकार और सुप्रीम कोर्ट में छिड़ी लड़ाई

पाकिस्तान में मोटे तौर पर दो धड़े बन गये हैं। एक हिस्सा शहबाज शरीफ और उनके गठबंधन का है, जिसे सेना का समर्थन मिला है। जबकि, दूसरा हिस्सा इमरान खान का है, जिसके साथ राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट है।

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Pakistan News: पाकिस्तान बहुत बड़े संवैधानिक संकट में फंस गया है और अब स्थिति बिगड़ती जा रही है। पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, देश के सुप्रीम कोर्ट के शीर्ष न्यायाधीशों और सत्तारूढ़ पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (PDM) सरकार के बीच मतभेद इस हद तक बढ़ गए हैं, कि उनकी अपने अपने पॉजीशन से वापसी नहीं हो सकती है।

द एक्सप्रेस ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति उमर अता बंदियाल की अध्यक्षता वाली चुनाव को लेकर बनाई गई पीठ अभी भी पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा में चुनाव कराने के अपने फैसले पर अड़ी हुई है, जबकि शहबाज शरीफ की सरकार ने साफ शब्दों में कह दिया है, कि चुनाव नहीं कराए जाएंगे। शहबाज सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए संसद में अध्यादेश तक पारित कर दिया, जिससे अब देश में संवैधानिक संकट उत्पन्न हो गया है।

पाकिस्तान में संवैधानिक संकट

पाकिस्तान की सरकार ने संसद में बिल पास कर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस से 'स्वत: संज्ञान' लेने के अधिकार को खत्म कर दिया है, लेकिन इस बिल पर दस्तखत करने से इनकार करते हुए राष्ट्रपति आरिफ अल्वी ने फाइल को लौटा दिया है। आरिफ अल्वी, इमरान खान की पार्टी के नेता रहे हैं और इस वक्त देश के राष्ट्रपति हैं, जो ज्यादातर मौकों पर प्रत्यक्ष तौर पर इमरान खान का समर्थन कर देते हैं।

जबकि, सुप्रीम कोर्ट की स्पेशल बेंच में भी चीफ जस्टिस के 'स्वत: संज्ञान' अधिकार को लेकर दरार है और कुछ जजों ने आरोप लगाया है, की चीफ जस्टिस ने अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल किया है। लेकिन, चीफ जस्टिस ने देश की संसद में जाकर कहा, कि 'कोई एक मामला उनके सामने लाया जाए, जिसमें उन्होंने अपने अधिकार का दुरुपयोग किया है।' यानि, पाकिस्तान में जबरदस्त राजनीतिक उथल-पुथल मची हुई है।

शहबाज सरकार बनाम सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने शहबाज शरीफ की सरकार को निर्देश दिए थे, कि वो चुनाव आयोग को 21 करोड़ रुपये चुनाव कराने के लिए जारी करे, लेकिन सरकार ने ऐसा करने से मना कर दिया। यानि, सरकार ने सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन कर दिया है।

दूसरी तरफ, देश की शक्तिशाली सैन्य प्रतिष्ठान इस मामले में शहबाज शरीफ के नेतृत्व वाली सरकार का समर्थन कर रहा है और उसने हाल ही में चीफ जस्टिस और अन्य न्यायाधीशों को सूचित किया है, कि पाकिस्तान में सुरक्षा का माहौल दो प्रांतों में चुनाव कराने के अनुकूल नहीं है। गल्फ न्यूज ने बताया है, कि इसके अलावा, गठबंधन सरकार "सीजेपी की मनमानी शक्तियों को विनियमित करने के लिए" विधेयक पारित करने के लिए संसद का उपयोग करेगी।

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मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के महानिदेशक, लेफ्टिनेंट जनरल नदीम अंजुम ने 17 अप्रैल को CJP बांदियाल से "शिष्टाचार भेंट" की थी, जिसमें सैन्य खुफिया महानिदेशक (DGMI) मेजर जनरल वाजिद अज़ीज़ और देश के रक्षा सचिव रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल हमूद-उज़-ज़मान खान भी मौजूद थे, जिसकी जानकारी फ्राइडे टाइम्स ने दी है।

इस बैठक के दौरान जस्टिस इजाज-उल-अहसन और जस्टिस मुनीब अख्तर भी मौजूद थे, और इन दोनों ने भी पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा में जल्द चुनाव कराने का फैसला दिया था। डीजी आईएसआई ने 14 मई को होने वाले आगामी पंजाब चुनावों पर सैन्य प्रतिष्ठान के रुख से सुप्रीम कोर्ट के जजों को अवगत कराया।

पाक ऑब्जर्वर की रिपोर्ट के मुताबिक, विश्लेषकों का अनुमान है कि दो से तीन घंटे तक चली बैठक उच्च स्तरीय बैठक के दौरान कोर्ट के बताने की कोशिश की गई, कि वर्तमान सैन्य प्रतिष्ठान का मानना है कि पंजाब में चुनाव वर्तमान सुरक्षा माहौल में संभव नहीं हैं। इसके अलावा, बैठक में सुप्रीम कोर्ट के जजों को ये भी बताया गया, कि अगर सुप्रीम कोर्ट चुनाव कराने के लिए प्रतिबद्ध है, तो फिर संघीय और प्रांतीय दोनों चुनाव एक साथ होने चाहिए। लेकिन, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा, कि 'सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले से पीछे नहीं हट सकता है।'

यानि, शहबाज सरकार बनाम सुप्रीम कोर्ट का स्टेज तैयार हो चुका है, जिसमें देश की सेना शहबाज शरीफ के साथ है।

पाकिस्तान में आगे का रास्ता क्या है?

पाकिस्तान के एक्सपर्ट्स का मानना है, कि ऐसे संकेत दिख रहे हैं, कि सैन्य प्रतिष्ठान आगामी प्रांतीय चुनावों के संबंध में निर्णय लेने की प्रक्रिया को संभावित रूप से प्रभावित करना चाहता है। बिजनेस रिकॉर्डर की रिपोर्ट के मुताबिक, सेना प्रमुख जनरल सैयद असीम मुनीर के नेशनल असेंबली में औपचारिक दौरे के कुछ दिनों बाद डीजी आईएसआई की बैठक हुई, जहां उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा पर संसदीय समिति के "इन-कैमरा सत्र" को संबोधित किया।

हालांकि, पिछले कुछ सालों से देश की सेना, राजनीति में सीधे हस्तक्षेप से बचती रही है, लेकिन पिछले साल इमरान खान को सत्ता से निकाले जाने के बाद से सेना ने सीधे तौर पर शहबाज शरीफ की अगुवाई वाले गठबंधन पीडीएम को समर्थन दिया है। सेना भी जानती है, कि अगर दोनों प्रांत में चुनाव हुए, तो इमरान खान प्रचंड बहुमत से जीत जाएंगे, और सेना ऐसा नहीं चाहती है, जबकि सुप्रीम कोर्ट का आदेश है, कि 14 मई को हर हाल में दोनों प्रांतों में चुनाव होने चाहिए।

सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच की तनातनी साफ तौर पर बताती है, कि सैन्य प्रतिष्ठान इमरान खान की सत्ता में वापसी को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है और अक्टूबर तक किसी भी हाल में चुनाव नहीं होने दिया जाएगा, जब देश में लोकसभा चुनाव भी होने हैं। डॉन ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, कि दोनों प्रांतों में चुनाव टालने के लिए प्रतिष्ठानों की तरफ से हर संभव काम किए जाएंगे, चाहे वो संवैधानिक हों या असंवैधानिक।

शहबाज-सेना को इमरान खान से डर?

वहीं, इमरान खान का कहना है, कि शहबाज शरीफ की सरकार सुप्रीम कोर्ट का बार बार अपमान कर रही है और देश में लोकतंत्र को खत्म कर दिया गया है। उनका कहना है, कि उनके नेताओं को निशाना बनाया जा रहा है और उनकी पार्टी को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। खुद इमरान खान के खिलाफ आतंकवादी धाराओं के साथ 140 से ज्यादा मुकदमे दर्ज किए गये हैं और हर दूसरे दिन उन्हें कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ते है। वहीं, पाकिस्तान चुनाव आयोग, इमरान खान के चुनाव लड़ने पर ही प्रतिबंध लगा चुका है। बावजूद इसके, इमरान खान के लिए जो जनसमर्थन उमड़ रहे है, उसने सेना और शहबाज सरकार, दोनों की हवा निकाल दी है।

सेना का मानना है, कि इमरान खान अगर दो तिहाई बहुमत से सरकार में आ गये, तो उनका काम सबसे पहले सेना को कमजोर करना होगा और इसके लिए वो पाकिस्तान की सेना को भारत की तरफ तीन हिस्से में तोड़ सकते हैं, यानि सेना के तीन अंग हो जाएंगे, जिससे सत्ता में सेना की पकड़ काफी कम कम हो जाएगी।

इसीलिए, पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा में सुप्रीम कोर्ट के चुनाव 14 मई को कराए जाने का फैसला इमरान खान की जीत की तरह देखा जा रहा है, जबकि शहबाज शरीफ और सेना ने साफ शब्दों में कह दिया है, कि चुनाव किसी भी हाल में नहीं होंगे। लिहाजा, देश गंभीर संवैधानिक संकट में फंस गया है।

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    वहीं, एक्सपर्ट्स का कहना है, कि चीफ जस्टिस के पास अभी भी 'स्वत: संज्ञान' का अधिकार है, और अगर शहबाज शरीफ कोर्ट के आदेश के खिलाफ जाकर चुनाव नहीं करवाते हैं, तो फिर चीफ जस्टिस अपने उस अधिकार का इस्तेमाल शहबाज शरीफ के खिलाफ कर सकते हैं, जिससे सरकार के लिए स्थिति काफी खतरनाक हो जाएगी, क्योंकि फिर शहबाज शरीफ की प्रधानमंत्री की कुर्सी पर ही संकट पैदा हो जाएगा।

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