पाकिस्तान: 'ये एक ऐसी जंग लड़ने की तरह है जिसका कोई अंत नहीं'
संयुक्त राष्ट्र ने बाढ़ प्रभावित पाकिस्तान के लिए 80 करोड़ डॉलर की एक और मदद की अपील की है.
पिछले बार की फंड की अपील से ये रक़म पाँच गुणा ज़्यादा है और इससे भुखमरी और संक्रमण से जूझ रही महिलाओं और बच्चों की मदद की जाएगी. संक्रमण अब पाकिस्तान में एक पब्लिक हेल्थ इमर्जेंसी बन गया है.
देश में 2000 से ज़्यादा अस्पताल और हेल्थ केयर सेंटर बाढ़ में बर्बाद हो गए हैं.
अब तक कुल 1700 लोगों की मौत हो चुकी है. एक ओर यूएन दुनिया से और मदद की अपील कर रहा है और दूसरी ओर अम्मारा गोहर जैसे डॉक्टर फ्रंट लाइन पर लोगों की मदद कर रहे हैं.
वो कहती हैं, "हमने कोविड के दौरान भी लोगों का इलाज किया लेकिन ये उससे भी ज़्यादा मुश्किल है क्योंकि ये एक प्राकृतिक आपदा है."
वो सिंध प्रांत के एक स्कूल में लोगों का इलाज कर रही हैं. ये बाढ़ से सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वाला इलाक़ा है. ये स्कूल अब डिस्ट्रिक्ट हेल्थ ऑफ़िस का अस्थायी हेडक्वॉर्टर है क्योंकि इस विभाग का ऑफ़िस बाढ़ में डूब चुका है.
अम्मारा की टीम यहाँ एक वैन में सभी ज़रूरी मेडिकल सप्लाई लोड कर रही है. इसमें बैंडेड, हेपाटाइटिस किट, ओआरएस सॉल्युशन और मलेरिया के टैबलेट हैं. वो बताती हैं, "हम ये उन लोगों तक ले जा रहे हैं, जो बाढ़ के कारण बिल्कुल कट गए हैं."
अब भी डूबे हैं कई इलाक़े
सिंध प्रांत का 75 प्रतिशत हिस्सा अब भी डूबा हुआ है. कई सड़कों पर पानी भरा है. लोगों की मदद करने के लिए उन तक पहुँचना बहुत ज़रूरी है.
क़रीब एक घंटे की यात्रा करने के बाद हम एक तालाब के पास पहुँचे. कुछ महीनों पहले तक ये उपजाऊ ज़मीन थी और लोग यहाँ खाना उगाते थे. बाढ़ में सब कुछ डूब गया है. अब ठहरे हुए पानी में मच्छर पनप रहे हैं. यहाँ से बीमारियां फैल सकती हैं. आसपास के बड़े इलाक़ों में गाँव वाले कई हफ़्तों से फंसे हुए हैं.
अम्मारा कहती हैं, "बिना मदद से ये लोग बच नहीं पाएंगे." वो सरकारी डॉक्टरों की अपनी टीम के साथ लकड़ी के नाव पर वहाँ पहुंचती हैं, ये मदद यूनिसेफ़ की ओर से की जा रही है.
यूनिसेफ़ के आदर्श लघारी कहते हैं, "ये एक मेडिकल आपदा है. लोगों तक पहुँचना सबसे बड़ी दिक्क़त है. हर दिन लोगों की मेडिकल ज़रूरतें बढ़ती जा रही हैं."
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मलेरिया के बढ़ रहे हैं मामले
केवल सितंबर के पहले हफ़्ते में सिंध प्रांत में 140,000 मलेरिया के मामले रिपोर्ट किए गए थे. लेकिन दूर दराज़ के कई इलाक़ों में लोगों का टेस्ट नहीं हो पाया है. आशंका है कि असली आंकड़े बहुत ज़्यादा हैं. इसलिए मोबाइल मेडिकल टीम की त्वरित ज़रूरत है.
किनारे पर पहुँचने के बाद, इस टीम ने पेड़ के नीचे एक हेल्थ कैंप लगाया. गांव के किनारे स्थित इस जगर पर पहले गायें छांव की तलाश में आती थीं.
पेड़ की टहनियों से एक बैनर लटकाए गए हैं, जो कि लोगों को क्लिनिक के बारे में जानकारी देते हैं. जो सामग्रियां यहां ज़मीन और पानी के रास्ते लाई गई हैं, उन्हें खोलकर यहां रखा प्लास्टिक की टेबल पर रखा जा रहा है.
यहाँ से अनाउन्समेंट के बाद बड़ी संख्या में गाँव वाले आने लगते हैं. इनमें कई महिलाएं हैं जिनके साथ बच्चे भी हैं. नूर शाह नाम के इस गाँव में पहले से ही ग़रीब हैं, बाढ़ ने हालात और ख़राब कर दिए हैं.
मरीज़ो की लाइन लगी हुई है, एक नर्स समीना नाम के बच्चे की जांच कर रहे हैं. अम्मारा उन्हें देख रही हैं. बच्ची के हाथ पर बंधा टेप लाल निशान तक पहुँच गया है. ये दिखाता है कि समीना बहुत पतली हैं. अम्मारा कहती हैं, "यहां ऐसे कई बच्चे हैं. नौ साल की उम्र में ही वो कुपोषित है."
कई परिवार खुले में सोये हुए हैं, उन टेंटों में जो डूब चुके या टूट चुके घरों के पास हैं.
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खुले में शौच को मजबूर लोग
कई हफ़्तों के कटे रहने के बाद उन्हें मेडिकल सुविधाएं मिल रही हैं, लेकिन कई लोगों का कहना है कि उन्हें अब भी खाने और साफ़ पीने और इस्तेमाल करने लायक पानी का इंतज़ार है.
पास के ही एक और गांव में, तीन साल के गुलबहार की डॉ. अम्मारा जांच कर रही हैं. उनके चेहरे और शरीर पर पपड़ियां नज़र आने लगी हैं और वो कमज़ोर हैं. डॉ अम्मारा का कहना है कि प्रदूषित पानी के इस्तेमाल से ऐसा हुआ है.
यूएन का कहना है कि शौचालय के कमी के कारण लोग खुले में शौच के लिए मजबूर हैं, बीमारियों के फैलने का ये एक बड़ा कारण है. डॉ अम्मारा गुलबहार के दांतों और मसूड़ों की जांच करते हुए कहती हैं, "बाढ़ के कारण हम बच्चों और युवाओं में स्किन इन्फ़ेक्शन देख रहे हैं."
वो उनकी माँ को कुछ दवाइयां देती हैं, लेकिन कहती हैं कि उनके पास सप्लाई कम होती जा रही है.
पाकिस्तान के हेल्थकेयर सिस्टम पर बहुत दबाव है और सभी की मदद करना मुश्किल है. डॉक्टरों और नावों की सप्लाई भी बहुत कम है. इन इलाकों में हम कई ऐसे लोगों से मिले जिनका आरोप है कि सरकार के पर्याप्त कदम नहीं उठाए.
सिंध के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. अज़रा अफ़जल पेछुहो के मुताबिक, "ये एक ऐसा जंग लड़ने जैसा है. जिसका कोई अंत नहीं. पानी कम होने में दो से तीन महीने लगेंगे और तब तक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं सामने आती रहेंगी." उन्होंने डॉक्टरों से अपील की है वो अधिक घंटों के लिए काम करें.
बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "दस दिन, तीन दिन, चार दिन, जितनी भी देर वो अधिक काम कर सकते हैं, करें."
डॉक्टर अम्मारा और उनकी टीम दिन रात काम कर रही है. उन्हें डर है कि बिना कैंप के लोगों ज़िंदा नहीं रह पाएंगे. वो कहती हैं, "बुरा लगता है, बहुत बुरा लगता है. मैं लोगों को ऐसे नहीं देख सकती."
"मुझे बुरा लगता है कि मैं इनके लिए और कुछ नहीं कर सकती."
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