OI Explained: कनाडा में वोट बैंक से सीधे आतंक का पर्याय कैसे बने खालिस्तानी? क्यों बदला सरकार ने रुख?
OI Explained: कनाडा में सिख समुदाय का इतिहास 20वीं सदी की शुरुआत से जुड़ा हुआ है। लगभग 1900 के आसपास पंजाब से बड़ी संख्या में सिख मजदूरी, व्यापार और बेहतर जीवन की तलाश में कनाडा पहुंचे। उस समय भारत ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा था, इसलिए भारतीयों को कनाडा जाने की इजाजत तो थी, लेकिन वहां पहुंचने के बाद उन्हें नस्लीय भेदभाव और सख्त इमिग्रेशन कानूनों का सामना करना पड़ा।
इसके बाद साल 1907 में हुए एंटी-एशियन दंगे जो मुख्यत: सिखों के खिलाफ थे और "Continuous Journey" जैसे कानूनों ने एशियाई समुदाय (खासकर सिखों) के लिए हालात और मुश्किल बना दिए। इसके बावजूद सिखों ने हार नहीं मानी और धीरे-धीरे उन्होंने अपने धार्मिक और सामाजिक संस्थान जैसे गुरुद्वारे स्थापित किए, जिससे उनकी सामुदायिक पहचान मजबूत होती गई। इस दौर को कई इतिहासकार कनाडा में सिख डायस्पोरा की नींव मानते हैं।

कैसे बढ़ता गया डायस्पोरा?
दूसरे विश्व युद्ध के बाद और खासकर 1960-70 के दशक में कनाडा की इमिग्रेशन कानूनों में बदलाव आया, जिससे एशियाई देशों से प्रवास बढ़ा। इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा भारतीय, विशेषकर पंजाबी सिख समुदाय को हुआ। धीरे-धीरे सिखों ने कनाडा में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में मजबूत पकड़ बना ली। आज कनाडा की राजनीति में सिख सांसदों और मंत्रियों की संख्या उल्लेखनीय है। The Week की रिपोर्ट्स बताती हैं कि सिख समुदाय अब कनाडा के सबसे प्रभावशाली प्रवासी समूहों में से एक बन चुका है। हर पार्टी कनाडा के सिख समुदाय को एक ऐसे वोट बैंक के रूप में देखती है जो चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाता है।
1980 का दशक और खालिस्तान आंदोलन की एंट्री
कनाडा में खालिस्तान आंदोलन का असर 1980 के दशक में दिखाई देने लगा। भारत के पंजाब में उस समय उग्रवाद चरम पर था। Operation Blue Star और उसके बाद पंजाब में खालिस्तानी कट्टरपंथियों से जुड़ी हुई घटनाएं बढ़ती चली गई। वहीं जो खालिस्तानी कट्टरपंथियों ने हथियार उठाए, उन्होंने कुछ समय के बाद दूसरे देशों में एंट्री ली जिसमें सबसे बड़ी तादाद में लोग कनाडा पहुंचे।
इसी दौरान कुछ कट्टरपंथी विचारधाराएं भी कनाडा पहुंची और प्रवासी समुदाय के एक हिस्से में फैलने लगीं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण Air India Flight 182 bombing है, जिसमें 329 लोगों की मौत हुई। यह हमला कनाडा से जुड़े खालिस्तानी चरमपंथियों द्वारा किया गया था और इसे कनाडा के इतिहास का सबसे बड़ा आतंकी हमला माना जाता है।
खालिस्तानी नेटवर्क का विस्तार कैसे हुआ?
समय के साथ कनाडा में खालिस्तान समर्थक समूहों ने अपनी गतिविधियां संगठित तरीके से बढ़ाईं। समय-समय पर भारत विरोधी बयान, रैलियां और दूसरी हरकतों ने ध्यान खींचा। इसके बाद वहां भारतीय मंदिरों और दूसरे प्रतिष्ठानों पर हमले होने शुरू हुए जिसने इंटरनेशनल मीडिया में काफी सुर्खियां बटोरी। इन समूहों ने अलग-अलग तरीकों से अपनी पकड़ मजबूत की-
• सामुदायिक संस्थानों के जरिए नेटवर्क बनाना
• फंडिंग और प्रचार गतिविधियां
• रेफरेंडम जैसे अभियान चलाना
• सोशल मीडिया के जरिए नैरेटिव बनाना
• हिंदी में वीडियो बनाकर भारत तक पहुंचाना
इन गतिविधियों ने भारत-कनाडा संबंधों को प्रभावित किया और इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया। भारत सरकार ने भी इन घटनाओं का बार-बार विरोध किया लेकिन कनाडा की सरकार खालिस्तानियों को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहती थी।
कनाडाई राजनीति और वोट बैंक का समीकरण
कनाडा में सिख समुदाय का राजनीतिक प्रभाव बढ़ने के साथ ही यह वोट बैंक भी बन गया। कई विश्लेषकों का मानना है कि विभिन्न कनाडाई सरकारों ने इस वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए कुछ मुद्दों पर नरम रुख अपनाया। The Indian Express की रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई है कि फ्री स्पीच के नाम पर खालिस्तान समर्थक रैलियों और गतिविधियों को कई बार अनुमति दी गई, जिससे भारत की चिंताएं बढ़ीं। इस वजह से भारत-कनाडा संबंधों में तनाव भी देखने को मिला, खासकर जब भारत ने बार-बार चरमपंथी गतिविधियों पर सख्ती की मांग की।
सुरक्षा की चिंता और आतंक का खतरा
पिछले कुछ वर्षों में यह मुद्दा दोनों देशों के बीच बड़ा कूटनीतिक विवाद बन गया। खालिस्तान समर्थक नेताओं से जुड़ी घटनाओं और सुरक्षा चिंताओं ने इस तनाव को और बढ़ा दिया। कई रिपोर्ट्स में इस बात का जिक्र किया गया कि भारत ने कनाडा से कई बार सख्त कार्रवाई की मांग की, जबकि कनाडा सरकार ने अक्सर इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मामला बताया।
मार्क कार्नी सरकार का बदलता रुख
हाल के समय में कनाडा की नई सरकार, जिसका नेतृत्व Mark Carney कर रहे हैं, ने इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया है। कनाडा की सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट्स में खालिस्तानी चरमपंथी गतिविधियों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया गया है। इसके साथ ही सरकार ने 1985 के एयर इंडिया हमले को याद करते हुए आतंकवाद के खिलाफ कड़ा संदेश दिया है। कनाडा की सुरक्षा एजेंसी (CSIS) की हालिया रिपोर्ट्स में खालिस्तानी चरमपंथ को संभावित सुरक्षा खतरे के रूप में चिन्हित किया गया है। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि कनाडा अब इस मुद्दे को केवल राजनीतिक या सामाजिक नहीं, बल्कि सुरक्षा के नजरिए से भी देख रहा है।
पूरे सिख समुदाय को लेकर भ्रम और वास्तविकता
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि खालिस्तान आंदोलन पूरे सिख समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करता।कनाडा और भारत दोनों जगह अधिकांश सिख शांति, विकास और मुख्यधारा की राजनीति के साथ जुड़े हुए हैं। कुछ सीमित समूहों की गतिविधियों के कारण पूरे समुदाय को एक नजर से देखना गलत होगा।
आगे क्या?
वोट बैंक की राजनीति, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सुरक्षा चिंताओं के बीच संतुलन बनाना कनाडा के लिए एक बड़ी चुनौती रहा है। अब जब सरकार इस मुद्दे पर सख्ती दिखा रही है, तो यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले समय में भारत-कनाडा संबंध और आंतरिक सुरक्षा नीति किस दिशा में जाती है। हालांकि पीएम कार्नी का ये कदम भारत के साथ न सिर्फ रिश्ते सुधारने वाला है बल्कि आने वाले वक्त में और मजबूत करेगा।
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