OI Explained: क्या है अब्राहम एकॉर्ड? जिस पर बंटे सभी मुस्लिम देश, Israel को फायदा- Pak को क्या नुकसान?

OI Explained: अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने एक बार फिर अब्राहम एकॉर्ड्स (Abraham Accords) को और आगे बढ़ाने की कोशिशें तेज कर दी हैं। ट्रंप ने कई मुस्लिम और अरब देशों से इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने की अपील की है। उनका कहना है कि यह कदम ईरान के साथ चल रही बातचीत और पश्चिम एशिया में स्थिरता लाने के बड़े प्लान का हिस्सा हो सकता है।

ट्रंप ने सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्किये, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन जैसे देशों से अमेरिकी समर्थन वाले इस ढांचे में शामिल होने को कहा है। साथ ही उन्होंने चेतावनी भी दी कि अगर कोई देश इस पहल का समर्थन नहीं करता, तो उसका असर अमेरिका के साथ भविष्य के रिश्तों पर पड़ सकता है। ऐसे में ये जानना जरूरी हो जाता है कि अब्राहम एकॉर्ड आखिर है क्या?

Abraham Accords पर पाकिस्तान की राय

ट्रंप की इस नई पहल के बाद Abraham Accords फिर से सुर्खियों में आ गए हैं। यह ऐसे समय में हो रहा है जब गाजा युद्ध, ईरान के साथ तनाव और फिलिस्तीन मुद्दे को लेकर पूरा वेस्ट एशिया बंटा हुआ नजर आ रहा है। हालांकि पाकिस्तान ने इस प्रस्ताव को सार्वजनिक रूप से खारिज कर दिया है।

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आखिर क्या हैं Abraham Accords?

Abraham Accords अमेरिका की मध्यस्थता में 2020 में शुरू किए गए समझौतों का एक समूह है। इनका मकसद इजरायल और अरब देशों के बीच राजनयिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को सामान्य बनाना था।

जिसमें पहला समझौता 15 सितंबर 2020 को इजरायल, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और बहरीन के बीच साइन हुआ था। बाद में मोरक्को और सूडान भी इसमें शामिल हो गए। वहीं कजाकिस्तान ने 2025 में औपचारिक रूप से इस समूह में एंट्री की, हालांकि उसके इजरायल के साथ रिश्ते पहले से मौजूद थे। यह समझौता यहूदी, इस्लाम और ईसाई धर्म की साझा अब्राहमिक जड़ों के नाम पर रखा गया था और इसे मिडिल ईस्ट की सबसे बड़ी कूटनीतिक घटनाओं में से एक माना जाता है।

फिलिस्तीन मुद्दे से हटे अरब देश

पहले ज्यादातर अरब देश इजरायल को मान्यता देने को फिलिस्तीन मुद्दे के समाधान से जोड़ते थे। लेकिन Abraham Accords के बाद फोकस व्यापार, निवेश, रक्षा सहयोग और रणनीतिक साझेदारी पर शिफ्ट होने लगा। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण ईरान का बढ़ता प्रभाव माना जाता है। इन समझौतों को 1979 में मिस्र और 1994 में जॉर्डन द्वारा इजरायल को मान्यता देने के बाद सबसे बड़ी अरब-इजरायल कूटनीतिक सफलता माना गया।

कौन-कौन हैं वर्तमान सदस्य?

फिलहाल Abraham Accords में इजरायल, UAE, बहरीन, मोरक्को, सूडान और कजाकिस्तान शामिल हैं। ट्रंप का दावा है कि इन समझौतों की वजह से इन देशों में आर्थिक और सामाजिक विकास तेजी से हुआ है। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर लिखा, Abraham Accords सभी देशों के लिए शानदार साबित हुए हैं और भविष्य में मिडिल ईस्ट में असली ताकत और शांति लाएंगे।

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ईरान डील के साथ जोड़ रहे हैं ट्रंप

ट्रंप का नया प्लान अमेरिका और ईरान के बीच चल रही संभावित शांति वार्ताओं से भी जुड़ा हुआ है। उन्होंने दावा किया कि ईरान के साथ बातचीत “अच्छी तरह आगे बढ़ रही है”। ट्रंप ने कहा, “यह सभी के लिए शानदार डील होगी, नहीं तो कोई डील नहीं होगी।” उन्होंने चेतावनी दी कि अगर समझौता नहीं हुआ तो क्षेत्र फिर से युद्ध और हिंसा की ओर लौट सकता है। ट्रंप चाहते हैं कि ईरान के साथ किसी समझौते के तुरंत बाद सऊदी अरब, कतर और दूसरे मुस्लिम देश Abraham Accords में शामिल हो जाएं।

ट्रंप ने किन नेताओं से की बातचीत?

ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने इस मुद्दे पर कई बड़े नेताओं से बातचीत की है। इनमें सऊदी क्राउन प्रिंस Mohammed bin Salman, UAE के राष्ट्रपति Mohamed bin Zayed Al Nahyan, कतर के अमीर Tamim bin Hamad Al Thani, पाकिस्तान के सेना प्रमुख Asim Munir, तुर्किये के राष्ट्रपति Recep Tayyip Erdoğan, मिस्र के राष्ट्रपति Abdel Fattah el-Sisi और जॉर्डन के किंग Abdullah II of Jordan शामिल हैं।

पाकिस्तान ने सबसे पहले किया साफ इनकार

ट्रंप द्वारा संपर्क किए गए देशों में पाकिस्तान पहला ऐसा देश बना जिसने सार्वजनिक रूप से इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री Khawaja Muhammad Asif ने कहा कि पाकिस्तान ऐसे किसी समझौते का हिस्सा नहीं बनेगा जो उसकी “मूल विचारधारा” के खिलाफ हो। पाकिस्तान लगातार कहता रहा है कि जब तक 1967 से पहले की सीमाओं के आधार पर पूर्वी यरुशलम को राजधानी बनाकर स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य नहीं बनता, तब तक वह इजरायल को मान्यता नहीं देगा।

घरेलू राजनीति और खाड़ी देशों का दबाव

पाकिस्तान इस मुद्दे पर दो तरह के दबावों का सामना कर रहा है। एक तरफ वह आर्थिक मदद, प्रेषण और सुरक्षा सहयोग के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है, वहीं दूसरी तरफ देश के अंदर धार्मिक समूह इजरायल के साथ संबंधों का लगातार विरोध करते हैं। 2020 में तत्कालीन प्रधानमंत्री Imran Khan ने भी Abraham Accords को खारिज कर दिया था। वहीं 2025 में पाकिस्तान के विदेश मंत्री Ishaq Dar ने साफ कहा था कि फिलिस्तीन मुद्दे के समाधान तक पाकिस्तान इजरायल को मान्यता नहीं देगा।

मिडिल ईस्टी नेता भी दिखे असहज

रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप ने हाल ही में सऊदी अरब, UAE, कतर, पाकिस्तान, तुर्किये, मिस्र, जॉर्डन और बहरीन के नेताओं के साथ एक कॉन्फ्रेंस कॉल में यह मुद्दा उठाया था। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ संघर्ष खत्म होने के बाद जिन देशों ने अभी तक इजरायल को मान्यता नहीं दी है, उन्हें Abraham Accords के तहत आगे बढ़ना चाहिए। लेकिन रिपोर्ट्स बताती हैं कि इस प्रस्ताव के बाद कॉल में कुछ समय के लिए चुप्पी छा गई थी। खासकर सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान की तरफ से ज्यादा उत्साह नहीं दिखा।

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गाजा युद्ध और फिलिस्तीन मुद्दा बना सबसे बड़ा रोड़ा

विशेषज्ञों का मानना है कि गाजा युद्ध, ईरान के साथ तनाव और फिलिस्तीन को लेकर अरब दुनिया में गुस्से की वजह से अब्राहम एकॉर्ड्स का विस्तार आसान नहीं होगा। ईरान ने भी इस तरह के किसी भी प्रस्ताव को सख्ती से खारिज कर दिया है। ईरानी विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने कहा था, “ईरान कभी भी ऐसे कब्जे वाले शासन को मान्यता नहीं देगा जिसने नरसंहार किया हो और बच्चों की हत्या की हो।”

फिलहाल प्रतिबंधों में ढील, यूरेनियम भंडार और ईरानी संपत्तियों जैसे मुद्दों पर बातचीत अभी भी अटकी हुई है। ऐसे में ईरान समझौते और Abraham Accords दोनों का भविष्य अभी अनिश्चित नजर आ रहा है।

इस खबर पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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