OI Exclusive: ‘Petrol-Diesel संकट पर डेटा नहीं दे रही सरकार'! एक्सपर्ट ने बताया कितने बढ़ेगी समस्या
OI Exclusive: हाल ही में जब भारत सरकार ने तय किया कि अमेरिकी वेवर खत्म होने के बावजूद भारत रूस से क्रूड ऑयल खरीदना जारी रखेगा। जिसके बाद अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रटरी स्कॉट बैसेंट ने अगले 30 दिनों के लिए रूसी तेल पर कई देशों को फिर से ढील दी। जिसके बाद भारत के लिए अगले 30 कच्चे तेल को इम्पोर्ट करने के लिहाज से अच्छे रहने वाले हैं। लेकिन क्या बात सिर्फ इतनी सी है? जवाब है नहीं, क्योंकि सरकार इस पर कोई नया डेटा नहीं दे रही, न ही ये बता रही कि भारत के पास कितने दिनों का कच्चा तेल या फिर पेट्रोल-डीजल बचा हुआ है। लेकिन इकोनॉमिस्ट और Jawaharlal Nehru University पूर्व प्रोफेसर Arun Kumar का मानना है कि भारत ने इस संकट को शुरुआत में उतनी गंभीरता से नहीं लिया, जितनी जरूरत थी।
युद्ध शुरू होते ही 80 देशों ने बदली रणनीति
वनइंडिया से बातचीत में अरुण कुमार ने बताया कि जैसे ही मिडिल ईस्ट में युद्ध शुरू हुआ, लगभग 80 देशों ने तुरंत अपनी ऊर्जा रणनीति बदल दी। कई देशों ने पेट्रोल और डीजल की सप्लाई को जरूरी और गैर-जरूरी सेक्टरों में बांट दिया। जिन सेक्टरों से जरूरी सेवाएं और अर्थव्यवस्था चलती थी, वहां तेल की सप्लाई जारी रखी गई, जबकि गैरजरूरी इस्तेमाल में बड़े स्तर पर कटौती शुरू कर दी गई।

भारत ने 70 दिनों तक नहीं लिया बड़ा फैसला
अरुण कुमार के मुताबिक, भारत में ऐसा कोई बड़ा एनर्जी कंट्रोल मॉडल शुरुआती 70 दिनों तक लागू नहीं किया गया। उन्होंने दावा किया कि इसकी एक वजह पांच राज्यों में चल रहे चुनाव भी थे।उनका कहना है कि सरकार राजनीतिक असर से बचना चाहती थी, इसलिए पेट्रोल-डीजल को लेकर सख्त फैसले लेने से बचती रही। साथ ही अरुण कुमार ने कहा कि सरकार स्ट्रेटिजिक रिजर्व्स को लेकर डेटा जारी नहीं कर रही। इस मामले सरकार ने आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा लेकिन PIB फैक्ट चेक में बताया था कि 60 दिन का क्रूड ऑयल बचा हुआ है।
80-90% तेल आयात पर निर्भर है भारत
अरुण कुमार ने बताया कि भारत अपनी कुल जरूरत का करीब 80 से 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। यानी देश काफी हद तक दूसरे देशों और वैश्विक सप्लाई चेन पर निर्भर है। ऐसे में युद्ध शुरू होते ही सरकार को ईंधन उपयोग के लिए नई रणनीति लागू करनी चाहिए थी।
WFH मॉडल से कम हो सकती थी खपत
अरुण कुमार का सुझाव है कि सरकार को देशभर में जरूरी और गैरजरूरी गतिविधियों की अलग-अलग सूची बनानी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि कई सरकारी और निजी दफ्तरों में वर्क फ्रॉम होम लागू किया जा सकता था, जिससे ईंधन की खपत कम होती। दूसरी तरफ पब्लिक ट्रांसपोर्ट, अस्पताल, लॉजिस्टिक्स और जरूरी सप्लाई चेन को प्राथमिकता देकर पुराने रेट पर तेल उपलब्ध कराया जा सकता था।

संकट के बीच बढ़ा दिया गया एक्सपोर्ट
अरुण कुमार के मुताबिक, युद्ध से पहले भारत अपने रिफाइंड ऑयल यानी पेट्रोल-डीजल का लगभग 27 प्रतिशत हिस्सा एक्सपोर्ट करता था। इसका बड़ा हिस्सा यूरोप जाता था, जबकि नेपाल और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों को सीमित मात्रा में सप्लाई की जाती थी। लेकिन युद्ध के बाद जब तेल संकट और गहरा गया, तब एक्सपोर्ट कम करने के बजाय भारत ने इसे बढ़ाकर 35 प्रतिशत तक पहुंचा दिया।
रेवेन्यू बढ़ा, लेकिन बढ़ सकती है मुश्किल
अरुण कुमार का मानना है कि सरकार ने यह फैसला रेवेन्यू बढ़ाने के लिए लिया। लेकिन उनका कहना है कि इसका असर आगे चलकर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि जब देश खुद ऊर्जा संकट का सामना कर रहा हो, तब ज्यादा एक्सपोर्ट घरेलू कमी को और गंभीर बना सकता है।
अप्रैल में 10% कम हुआ क्रूड ऑयल इंपोर्ट
अरुण कुमार ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि पिछले साल की तुलना में अप्रैल महीने में भारत लगभग 10 प्रतिशत कम क्रूड ऑयल इंपोर्ट कर पाया। उन्होंने कहा कि मार्च महीने में यह गिरावट इससे भी ज्यादा थी। इससे साफ संकेत मिलता है कि वैश्विक संकट का असर भारत की तेल सप्लाई पर भी पड़ रहा है।
भारत में 33% तक फ्यूल शॉर्टेज का दावा
सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि भारत इस समय लगभग 33 प्रतिशत फ्यूल शॉर्टेज का सामना कर रहा है। जबकि पूरी दुनिया में औसत ईंधन संकट करीब 20 प्रतिशत बताया जा रहा है। अरुण कुमार के मुताबिक, यह स्थिति आने वाले महीनों में और गंभीर हो सकती है। उन्होंने बताया कि पहले भारत में रोजाना 10 से ज्यादा तेल टैंकर पहुंचते थे। लेकिन अब हालात काफी बदल चुके हैं। स्थिति ऐसी हो गई है कि अगर 1 या 2 टैंकर भी पहुंच जाएं, तो वह खबर बन जाती है।
रूस-यूक्रेन युद्ध भी बना बड़ी परेशानी
स्थिति को और जटिल बना रही है Ukraine और Russia के बीच जारी जंग। यूक्रेन लगातार रूसी रिफाइनरियों पर हमले कर रहा है। दूसरी तरफ रूस अपने कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा अब China को भेज रहा है। ऐसे में भारत को रूसी तेल से मिलने वाली राहत कब तक जारी रहेगी, इस पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। अरुण कुमार का कहना है कि रूस अब सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि कई दूसरे देशों को भी तेल सप्लाई कर रहा है। यही वजह है कि आने वाले समय में भारत के सामने ऊर्जा सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है।
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