पाकिस्तान में अल्पसंख्यक नहीं बन सकते प्रधानमंत्री, अहमदिया मुसलमानों के पास वोट देने का क्यों नहीं है अधिकार?
पाकिस्तान में नेशनल असेंबली और प्रांतीय चुनाव के लिए आज मतदान हो रहे हैं। चुनाव के बाद ही मतगणना शुरू हो जाएंगे। ऐसे में पाकिस्तान का अगला पीएम कौन होगा ये आज रात या कल सुबह तक पता चल जाएगा। हालांकि चुनावी जानकारों का मानना है कि ये पहले से लगभग तय हो चुका है कि पाकिस्तान का प्रधानमंत्री नवाज शरीफ बनेंगे।
लेकिन क्या आपको बता है कि पाकिस्तान में कोई गैर-मुस्लिम शख्स प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति नहीं बन सकता है। पाकिस्तान के संविधान में ही इस बात का विशेष जिक्र कर दिया गया है कि किसी गैर मुस्लिम को प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति नहीं बनाया जा सकता है।

पाकिस्तानी संविधान के अनु. 41 और 91 के मुताबिक पाकिस्तान में कोई भी अल्पसंख्यक प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति नहीं बन सकता है। हालांकि इस मौजूदा प्रावधान को बदलने की भी कोशिश हुई लेकिन ये नहीं हो सका।
किसी गैर-मुस्लिम को पाकिस्तान का राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री बनाए जाने के लिए जरूरी बदलाव करने के लिए अक्टूबर 2019 में पीपीपी पार्टी के पाकिस्तानी सांसद नवीद आमिर जीवा ने संसद में विधेयक लाने की कोशिश की थी मगर इसे खारिज कर दिया गया।
सांसद नवीद पाकिस्तानी संविधान के अनुच्छेद 41 और अनुच्छेद 91 में एक संशोधन करवाना चाहते थे। इस संशोधन के जरिए वे चाहते थे कि पाकिस्तान में गैर-मुस्लिमों को भी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बनने का अधिकार मिले लेकिन इस बिल को निरस्त कर दिया गया। अधिकांश सांसदों ने ध्वनी मत से इसका विरोध किया था।
इसके बाद साफ हो चुका है कि कोई भी गैर-मुस्लिम पाकिस्तान का राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री नहीं बन सकता है। इतना ही कई सांसदों ने इस विधेयक को खारिज करने के फैसले की सराहना की। उन्होंने कहा कि इस्लामिक मूल्यों और उपदेशों के खिलाफ किसी भी कानून को संसद में पारित नहीं किया जा सकता। न इस पर चर्चा की जा सकती है।
बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान का पहला संविधान आजादी के बाद 1956 में बना। फिर इसे रद्द करके 1958 में दूसरा संविधान आया और इसे भी रद्द कर दिया गया और 1973 में तीसरा संविधान बना जो अब तक मान्य है। ये संविधान पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को समान अधिकार देने की बात करता है।
हालांकि ये बातें सिर्फ कागजी तौर पर सही हैं। ऐसा कहा जाता है कि पाकिस्तान में 5 लाख से अधिक अहमदिया आबादी को वोट करने का अधिकार नहीं है। हालांकि ये कानूनी तौर पर नहीं है, लेकिन उन्हें एक तरह से समाज से बहिष्कृत कर दिया गया है। कई दशकों से अहमदिया समुदाय वोटिंग नहीं कर रहा है।
ये समुदाय स्थानीय या राष्ट्रीय चुनावों का हिस्सा नहीं बन सकता। आपको बता दें कि अहमदिया इस्लाम से अलग हुआ एक संप्रदाय है। मुसलमान इसे काफ़िर मानते हैं। दिलचस्प बात ये है कि ये अहमदिया ही थे जिन्होंने पाकिस्तान बनने में अहम भूमिका निभाई थी।
साल 1940 में अहमदिया नेता जफरुल्ला खान ने लाहौर रिजॉल्यूशन में पाकिस्तान की मांग को लेकर संकल्प पत्र पेश किया था, जिसे बंटवारे की पहली सीढ़ी भी कहा जाता है। इतना ही नहीं, 1948 में हुई कश्मीर की जंग में अहमदिया समुदाय ने बढ़-चढ़कर पाकिस्तान की ओर से भारत के खिलाफ हिस्सा लिया था।
अहमदिया समुदाय के बुरे दिन तब शुरू हुए जब 1971 में पाकिस्तान से बांग्लादेश अलग हो गया। भारत से करारी हार के बाद भुट्टो देश बेहद अलोकप्रिय हो चुके थे। ऐसे में जुल्फिकार अली भुट्टो ने इस्लामिक कट्टपरंथियों का दिल जीतने के लिए अहमदिया मुसलमानों, को गैर-मुस्लिम करार दिया।
आज अहमदिया समुदाया दुनिया में सबसे पीड़ित समुदायों में से एक है। वे पाकिस्तान में खुलकर नमाज नहीं पढ़ सकते। वे अपनी इबादतगाह को मस्जिद नहीं कह सकते। यदि उनकी इबादतगाह पर मीनार होती है, तो उसे तोड़ दिया जाता है। वहां से अजान नहीं हो सकती है।
अहमदिया समाज के लोग जहां रहते हैं वहां कोई नागरिक सुविधाएं नहीं मिलती, कोई विकास कार्य नहीं होता है। उन्हें कहीं अच्छी जगह नौकरी भी नहीं मिलती। क्योंकि वे किसी राजनीतिक दलों के वोटर्स नहीं हैं।
अब चूंकि वे वोटर ही नहीं हैं तो किसी भी राजनीतिक दल को उनकी परवाह नहीं है। अहमदिया समुदाय के बहुत से लोग अपनी पहचान गुप्त रखते हैं क्योंकि उन्हें जान का ख़तरा होता है। ऐसा कहा जाता है कि अमहदिया समुदाय ही हालत यूरोप के नाजी समुदाय जैसी हो चुकी है।












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