Balen Shah Vs President: नेपाल में महा-संग्राम! बालेन शाह और राष्ट्रपति आमने-सामने, क्या खतरे में है सरकार?

Balen Shah Vs President: नेपाल में एक बार फिर सत्ता और संवैधानिक संस्थाओं के बीच ठन गई है। प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार और राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल के बीच 'संवैधानिक परिषद अध्यादेश' को लेकर गहरा विवाद पैदा हो गया है।

सरकार ने संसद के बजट सत्र को अचानक स्थगित कर अध्यादेश का रास्ता चुना, जिसे राष्ट्रपति ने लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताते हुए ठुकरा दिया है। यह टकराव न केवल कानूनी है, बल्कि इसने नेपाल की राजनीति में एक नया ध्रुवीकरण पैदा कर दिया है, जिससे सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं।

Balen Shah Vs President

Nepal Political Crisis 2026: राष्ट्रपति का कड़ा रुख और आपत्ति

राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल ने सरकार द्वारा भेजे गए 8 में से 7 अध्यादेशों को तो मंजूरी दे दी, लेकिन संवैधानिक परिषद संबंधी अध्यादेश को पुनर्विचार के लिए वापस लौटा दिया। राष्ट्रपति का मानना है कि संविधान में तय बहुमत आधारित निर्णय प्रक्रिया को किसी अध्यादेश से कमजोर नहीं किया जा सकता। उन्होंने साफ किया कि केवल प्रधानमंत्री और सीमित सदस्यों की मर्जी से नियुक्तियां करना संवैधानिक भावना के खिलाफ है, क्योंकि इससे लोकतांत्रिक संतुलन बिगड़ सकता है।

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बालेन सरकार का पक्ष और तर्क

प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार का दावा है कि संवैधानिक निकायों (जैसे चुनाव आयोग या अख्तियार दुरुपयोग अनुसंधान आयोग) में खाली पदों को भरने के लिए यह कदम उठाना जरूरी था। सरकार का तर्क है कि पुरानी व्यवस्था के कारण नियुक्तियों में देरी हो रही थी, जिससे कामकाज प्रभावित हो रहा था। सरकार ने इस अध्यादेश में 4 सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य करने और टाई होने पर प्रधानमंत्री को निर्णायक वोट देने का अधिकार प्रस्तावित किया था।

संसद को दरकिनार करने का आरोप

इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी वजह संसद की अनदेखी है। राष्ट्रपति ने 30 अप्रैल 2026 से बजट सत्र बुलाया था, लेकिन बालेन कैबिनेट ने मात्र 24 घंटे में उसे स्थगित करने की सिफारिश कर दी। विपक्ष का कहना है कि सरकार चर्चा से भाग रही है और 'अध्यादेश राज' के जरिए अपनी मनमानी करना चाहती है। बजट सत्र जैसे महत्वपूर्ण सत्र को टालकर अध्यादेश लाना संसदीय परंपराओं पर प्रहार माना जा रहा है।

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नेपाल में गहराता सियासी संकट

राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश लौटाना बालेन सरकार के लिए एक बड़ा नैतिक और राजनीतिक झटका है। विपक्षी दल अब इस मुद्दे पर एकजुट हो रहे हैं और इसे सरकार की तानाशाही प्रवृत्ति बता रहे हैं। अब सरकार के पास दो ही रास्ते बचे हैं: या तो वे राष्ट्रपति के सुझावों के अनुसार अध्यादेश में बदलाव करें, या फिर संसद का सत्र बुलाकर इसे कानून के रूप में पेश करें।

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