Balen Shah Foreign Policy: बालेन शाह का ट्रंप को बड़ा झटका, अमेरिकी दूत को मिलने से किया मना
Balen Shah Foreign Policy: दक्षिण एशिया की बदलती राजनीति में नेपाल ने हाल ही में अमेरिका को कड़ा कूटनीतिक संदेश दिया है। अमेरिकी विशेष दूत और भारत में अमेरिका के राजदूत सर्गियो गोर इन दिनों क्षेत्रीय दौरे पर हैं, लेकिन मालदीव के बाद अब नेपाल में भी उन्हें मायूसी हाथ लगी।
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने अमेरिकी दूत से मिलने का वक्त देने से साफ इनकार कर दिया। यह घटना दर्शाती है कि अब छोटे देश भी महाशक्तियों के सामने अपनी शर्तों पर कूटनीति करना सीख गए हैं। बालेन शाह के इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल मचा दी है।

मुलाकात से इनकार: सीधा संदेश
अमेरिकी दूत सर्गियो गोर ने काठमांडू पहुंचकर प्रधानमंत्री कार्यालय से मिलने का समय मांगा था। उम्मीद थी कि अमेरिका की अहमियत देखते हुए उन्हें तुरंत समय मिल जाएगा, लेकिन पीएम बालेन शाह के कार्यालय ने इस अनुरोध को ठुकरा दिया। सरकार का तर्क है कि प्रधानमंत्री फिलहाल बाहरी मुलाकातों के बजाय देश के आंतरिक प्रशासन और नीतिगत सुधारों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। यह कदम अमेरिका के लिए किसी झटके से कम नहीं है।
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Balen Shah Nepal PM: प्रोटोकॉल की नई लक्ष्मण रेखा
विशेषज्ञों का मानना है कि बालेन शाह नेपाल की कूटनीति में एक नई परंपरा शुरू कर रहे हैं। इस नए प्रोटोकॉल के तहत प्रधानमंत्री अब केवल राष्ट्राध्यक्षों या समकक्ष स्तर के नेताओं (जैसे विदेश मंत्री) से ही आधिकारिक मुलाकात करेंगे। किसी राजदूत या विशेष दूत को सीधे प्रधानमंत्री का समय न मिलना यह बताता है कि नेपाल अब अपने पद और गरिमा को लेकर बेहद सख्त हो गया है और वह किसी भी दबाव में नहीं झुकना चाहता।
गुटबाजी से दूरी का इरादा
नेपाल की भौगोलिक स्थिति उसे भारत, चीन और अमेरिका जैसी शक्तियों के बीच खींचतान का केंद्र बनाती है। बालेन शाह का यह रुख साफ करता है कि नेपाल किसी भी वैश्विक गुटबाजी का हिस्सा नहीं बनना चाहता। अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश के प्रतिनिधि को समय न देकर नेपाल ने यह संदेश दिया है कि उसकी प्राथमिकता अपनी संप्रभुता और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता है। वह अपनी धरती पर किसी भी देश का हस्तक्षेप बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।
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दक्षिण एशिया में अमेरिका की बढ़ती मुश्किल
सिर्फ नेपाल ही नहीं, हाल के दिनों में मालदीव ने भी अमेरिकी दूतों के प्रति ऐसा ही रुख अपनाया है। दक्षिण एशियाई देशों का यह 'तेवर' अमेरिका के लिए चिंता का विषय है। भारत में स्थित अमेरिकी राजदूत के लिए यह दौरा काफी असहज साबित हुआ है। यह स्थिति दिखाती है कि अब दक्षिण एशिया की बिसात बदल रही है, जहां छोटे देश अपनी 'औकात' या हैसियत कम आंकने के बजाय बड़े देशों को बराबरी का आईना दिखा रहे हैं।












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