Kailash Mansarovar Yatra पर नेपाल का 'अड़ंगा', भारत ने दिया मुंहतोड़ जवाब- 'ऐतिहासिक तथ्यों से समझौता नहीं!'
Kailash Mansarovar Yatra controversy: भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद एक बार फिर गरमा गया है। नेपाल की सरकार ने भारत और चीन को एक औपचारिक 'डिप्लोमैटिक प्रोटेस्ट नोट' भेजकर लिपुलेख दर्रे के माध्यम से कैलाश मानसरोवर यात्रा के संचालन पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। नेपाल का दावा है कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा उसकी क्षेत्रीय संप्रभुता का हिस्सा हैं।
वहीं, भारत ने नेपाल के इन दावों को पूरी तरह निराधार और तथ्यों से परे बताया है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि यह मार्ग दशकों से उपयोग में है और भारत अपनी सीमा सुरक्षा तथा विकास कार्यों को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध है। दोनों देशों के बीच बढ़ता यह कूटनीतिक तनाव दक्षिण एशिया की राजनीति में नई बहस छेड़ रहा है।

Lipulekh border Dispute: नेपाल का कड़ा रुख और आपत्ति
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि लिपुलेख के रास्ते यात्रा चलाने की योजना पर उन्हें सख्त आपत्ति है। नेपाल का कहना है कि यह उनकी संप्रभुता का मामला है। विदेश मंत्री शिशिर खनाल के अनुसार, यह विरोध किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि नेपाल की सभी राजनीतिक पार्टियों की आपसी सहमति के बाद दर्ज कराया गया है। नेपाल चाहता है कि इस क्षेत्र में कोई भी देश एकतरफा कार्रवाई न करे।
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India Nepal boundary row: 1816 की सुगौली संधि का हवाला
नेपाल अपने दावे को मजबूत करने के लिए इतिहास के पन्नों को पलट रहा है। उनका पूरा तर्क 1816 की 'सुगौली संधि' पर टिका है। नेपाल सरकार का मानना है कि इस संधि के अनुसार महाकाली नदी के पूर्व का सारा हिस्सा, जिसमें लिम्पियाधुरा, लिपुलेक और कालापानी शामिल हैं, नेपाल का अभिन्न अंग है। वे इसे अपने आधिकारिक नक्शे का हिस्सा मानते हैं और इस पर पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।
भारत की दोटूक प्रतिक्रिया
भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने नेपाल के इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। भारत का कहना है कि लिपुलेख का रास्ता कोई नया नहीं है, बल्कि 1954 से तीर्थयात्री इसी मार्ग का उपयोग कर रहे हैं। भारत ने स्पष्ट किया है कि नेपाल के नए दावे न तो ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित हैं और न ही इनका कोई कानूनी आधार है। भारत अपनी सीमा और परंपराओं को लेकर पूरी तरह अडिग है।
चीन को भी दी गई जानकारी
नेपाल ने सिर्फ भारत को ही नहीं, बल्कि चीन को भी इस मुद्दे पर अपनी स्थिति से अवगत कराया है। नेपाल का कहना है कि उन्होंने मित्र राष्ट्र चीन को आधिकारिक रूप से बता दिया है कि लिपुलेख नेपाली भू-भाग है। नेपाल की कोशिश है कि वह इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक कूटनीतिक दबाव के रूप में इस्तेमाल करे, ताकि भारत और चीन के बीच होने वाले व्यापार या यात्रा समझौते में उसकी भूमिका बनी रहे।
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बातचीत से समाधान की उम्मीद
इतनी तल्खी के बावजूद, दोनों देशों ने कूटनीति के दरवाजे बंद नहीं किए हैं। भारत ने बड़प्पन दिखाते हुए कहा है कि वह नेपाल के साथ पुराने और मजबूत रिश्तों की कद्र करता है। भारत सीमा विवादों को बातचीत के जरिए सुलझाने के लिए हमेशा तैयार है, बशर्ते दावे तथ्यों पर आधारित हों। वहीं नेपाल की प्रेस विज्ञप्ति भी अंत में यही कहती है कि वे ऐतिहासिक समझौतों और नक्शों के आधार पर मैत्रीपूर्ण समाधान चाहते हैं।












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