ऐतिहासिक: सूरज के कोरोना को छूकर लौटा NASA का स्पेसक्राफ्ट, विज्ञान की दुनिया में अविश्वसनीय उपलब्धि
अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा द्वारा लॉन्च किए गए एक अंतरिक्ष यान ने असंभव समझी जाने वाली उपलब्धि हासिल की है। इतिहास में पहली बार एक अंतरिक्ष यान ने सूरज के कोरोना को छुआ है।
वॉशिंगटन, दिसंबर 15: नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन यानि नासा ने असंभव से लगने वाले मिशन को कामयाबी के साथ अंजाम दे दिया है और इसी के साथ ही विज्ञान की दुनिया में उस ऐतिहासिक मिशन को कामयाबी के साथ पूरा कर लिया गया है, जिसके बारे में एक वक्त सोचना भी असंभव था। नासा के स्पेसक्राफ्ट ने पहली बार सूरज के कोरोना को छूने में कामयाबी हासिल कर ली है।

20 लाख डिग्री तापमान
अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा द्वारा लॉन्च किए गए एक अंतरिक्ष यान ने असंभव समझी जाने वाली उपलब्धि हासिल की है। इतिहास में पहली बार एक अंतरिक्ष यान ने सूरज के कोरोना को छुआ है। ये मिशन असंभव इसलिए था, क्योंकि सूरज के कोरोना का तापमान 20 लाख डिग्री फॉरेनहाइट है। नासा का ये मिशन विज्ञान की दुनिया के लिए महानतम उपबल्धियों में से एक है और इंसानों के लिए एक मील के पत्थर है।

नासा का अविश्वसनीय छलांग
नासा के वैज्ञानिकों ने निश्चित तौर पर इस मिशन को अंजाम देकर सौर विज्ञान के क्षेत्र में अविश्वसनीय छलांग लगाई है। रिपोर्ट के मुताबिक, पार्कर सोलर प्रोब नामक रॉकेटशिप ने 28 अप्रैल को सूर्य के ऊपरी वायुमंडल, जिसे कोरोना कहा जाता है, उसमें कामयाबी के साथ प्रवेश किया और उड़ान भी भरी। इसके साथ ही नासा के इस रॉकेट ने लाल गर्म तारे की सतह पर स्थित कणों और चुंबकीय क्षेत्रों का नमूमा भी ले लिया है, जिसे पूरा करना अब तक असंभव माना जा रहा था।

कैसे संभव हुआ नासा का मिशन?
हार्वर्ड एंड स्मिथसोनियन (CfA) में सेंटर फॉर एस्ट्रोफिजिक्स के सदस्यों सहित वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के एक बड़े सहयोग के साथ इस ऐतिहासिक क्षण हासिल किया गया है। जिन्होंने जांच में एक महत्वपूर्ण उपकरण- सोलर प्रोब कप का निर्माण और निगरानी की। यह कप ही वह उपकरण है जिसने सूर्य के वायुमंडल से कण एकत्र किए हैं, जिससे वैज्ञानिकों को यह सत्यापित करने में मदद मिली कि अंतरिक्ष यान वास्तव में कोरोना को छूने में कामयाब रहा है।

कोरोना में रहा 5 घंटे
नासा ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि, स्पेसक्राफ्ट द्वारा एकत्र किए गये आंकड़ों से पता चलता है कि, नासा का ये स्पेसक्राफ्ट सूरज के कोरोना में 28 अप्रैल 2021 को एक प्वाइंट पर करीब 5 घंटे तक रहा। आंकड़ों से पता चलता है कि, स्पेसक्राफ्ट ने तीन बार सूरज के कोरोना के कोरोना में प्रवेश किया था। नासा के इस मिशन ऐतिहासिक और मील का पत्थर साबित होने वाले मिशन को लेकर पूरी रिपोर्ट साइंटिफिक पेपर फिजिकल रिव्यू लेटर्स में प्रकाशित हुआ है, जिसमें सीएफए एस्ट्रोफिजिसिस्ट एंथनी केस ने बताया है कि, कैसे सोलर प्रोब कप अपने आप में इंजीनियरिंग का एक अविश्वसनीय उपलब्धि था।

कैसे बनाया गया था स्पेसक्राफ्ट
करीब 20 लाख डिग्री फॉरेनहाइट तापमान में जाने वाले इस स्पेसक्राफ्ट को स्पेशल तरीके से डिजाइन किया गया था। वैज्ञानिक एंथनी केस ने बताया कि, "स्पेसक्राफ्ट पार्कर सोलर प्रोब से जितनी मात्रा में सूरज से निकलने वाली गर्मी टकराने वाली थी, उससे बचने के लिए और उस गर्मी से उपकरण को बटाने के लिए पहले ये समझा गया कि, स्पेसक्राफ्ट कितना गर्म होने वाला है''।

शील्ड से सुरक्षित था स्पेसक्राफ्ट
वैज्ञानिक केस ने समझाते हुए कहा कि, ''अंतरिक्ष यान को सुरक्षित रखने के लिए उसे एक शील्ड से सुरक्षित किया गया था और उनमें से सिर्फ दो ऐसे कप थे, जो बिना किसी सुरक्षा के स्पेसक्राफ्ट से चिपके हुए थे। वैज्ञानिक केस ने कहा कि, ये दोनों ही कप सीधे तौर पर सूरज की गर्मी में खुले तौर पर थे और उनकी कोई सुरक्षा नहीं की जा सकती थी। उन्होने कहा कि, ये दोनों कप पूरी तरह से लाल हो गये थे। उन्होंने कहा कि, कप को पिघलने से बचाने के लिए उसका निर्माण टंगस्टन, नाइओबियम, मोलिब्डेनम और नीलम जैसे उच्च गलनांक धातुओं और पत्थरों से किया गया था।

सूर्य के वातावरण का वर्णन
पृथ्वी के विपरीत, सूर्य की कोई ठोस सतह नहीं है। लेकिन इसमें अत्यधिक गर्म वातावरण होता है, जो गुरुत्वाकर्षण और चुंबकीय फोर्स के द्वारा सूर्य से कोर से बंधा हुआ सामग्री होता है। जैसे-जैसे बढ़ती गर्मी और दबाव उस सामग्री को सूर्य से दूर धकेलते हैं, यह एक ऐसे बिंदु पर पहुंच जाता है जहां गुरुत्वाकर्षण और चुंबकीय क्षेत्र इसे अपने अंदर बनाए रखने के लिए काफी कमजोर हो जाते है।

क्या है सूरज का कोरोना?
कोरोना सूर्य के वायुमंडल की सबसे बाहरी परत है, जहां मजबूत चुंबकीय क्षेत्र प्लाज्मा को बांधते हैं और सूरज से निकलने वाले खतरनाक तूफान को बाहर निकलने से रोकते हैं। जिस बिंदु पर सौर सामग्री गुरुत्वाकर्षण बल और चुंबकीय क्षेत्र से बच जाती है, उसे अल्फवेन महत्वपूर्ण सतह कहा जाता है और यह सौर वातावरण के अंत और सौर हवा की शुरुआत का प्रतीक है। अल्फवेन महत्वपूर्ण सतह से परे, सौर हवा इतनी तेजी से चलती है कि हवा के भीतर की लहरें कभी भी इतनी तेजी से यात्रा नहीं कर सकतीं कि वह सूर्य की तरफ वापस आ सकें और उनके कनेक्शन को तोड़ दें।

सूरज के सबसे करीब मिशन
अब तक वैज्ञानिक इस बात का पता लगाने में अनिश्चित थे कि, अल्फवेन की महत्वपूर्ण सतह कहां है। कोरोना की दूरस्थ तस्वीरों के आधार पर वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया था कि, सूर्य की सतह से 10 से 20 सौर त्रिज्या यानि, 4.3 से 8.6 मिलियन मील के बीच कहीं अल्फवेन मौजूद है। 28 अप्रैल 2021 से पहले, पार्कर सोलर प्रोब इस बिंदु से ठीक आगे उड़ रहा था, लेकिन 28 अप्रैल को अपनी आठवीं उड़ान के दौरान वो अल्फवेन तक पहुंच गया और इसके साथ ही वैज्ञानिकों को अल्फवेन की सटीक जानकारी भी मिल गई है, जो 18.8 सौर त्रिज्या (लगभग 8.1 मिलियन मील) पर विशिष्ट चुंबकीय कणों के बीच मौजूद है। नासा के इस रॉकेट ने इतिहास में पबली बार अल्फवेन नाम के इस महत्वपूर्ण सतह को पार कर लिया और अंत में सूरज के वातावरण में प्रवेश कर गया।

विज्ञान के लिए कितनी बड़ी उपलब्धि?
नासा के अनुसार, पार्कर सोलर प्रोब स्पेसक्राफ्ट का सूरज के वातावरण में पहुंचना टेक्नोलॉजी की सफलता से भी काफी ज्यादा आगे की सफलता को बताता है, जिसको लेकर सिर्फ कल्पना की गई थी। यह देखते हुए कि सूर्य अब तक वैज्ञानिकों के लिए काफी हद तक दुर्गम था, अंतरिक्ष यान की ऐतिहासिक उपलब्धि ने लाल-गर्म तारे सूरज के बारे में सदियों पुराने रहस्यों को सुलझाने की नई उम्मीद वैज्ञानिकों में भर दी है। नासा ने कहा कि, उदाहरण के लिए, हम वास्तव में नहीं जानते कि सूर्य का बाहरी वातावरण (2 मिलियन डिग्री सेल्सियस) सूर्य (5,500 डिग्री सेल्सियस) की तुलना में इतना अधिक गर्म क्यों है? हालांकि खगोल भौतिकविदों को पता है कि ऊर्जा सूर्य की सतह से बुदबुदाते हुए चुंबकीय क्षेत्रों से आती है, यह अभी तक ज्ञात नहीं है कि सूर्य का वातावरण इस ऊर्जा को कैसे अवशोषित करता है।

सौर तूफान पर मिलेगी ज्यादा जानकारी
सूरज के वातावरण की जानकारी मिलने के बाद अब वैज्ञानिकों को सौर फ्लेयर्स यानि, सूरज में उठने वाली तूफान की वजह से आसमान में बनने वाले फ्लेयर्स और सौर हवाओं पर ज्यादा जानकारियां मिल सकेंगी। जिनका अक्सर पृथ्वी पर सीधा प्रभाव पड़ता है, जहां वे बिजली ग्रिड और रेडियो संचार को बाधित करते हैं। नासा ने कहा कि, "कोरोना में प्रवेश करने में पहली बार मिली सफलना के बाद हम वादा करते हैं कि हम अब कई और स्पेसक्राफ्ट को फ्लाईबाई में भेजेंदें, ताकि और ज्यादा जानकारियां जुटाई जा सके और सूरज के बारे में हम ज्यादा से ज्यादा जानकारी हासिल कर सके। क्योंकि, सूरज पर दूर से जानकारियां हासिल करना असंभव है''।












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