10 वर्ष के अंदर धरती पर बहुत बड़े खाद्यान संकट की आशंका, NASA के शोध में किसानों के लिए खास संदेश
वॉशिंगटन, 2 नवंबर: नासा से जुड़े वैज्ञानिकों के एक शोध के बाद कहा गया है कि अगर ग्लोबल वॉर्मिंग का मौजूदा ट्रेंड जारी रहा तो एक दशक के भीतर धरती पर खेती के पैटर्न में बहुत बड़ा बदवाव आ जाएगा। बल्कि, हाल में जिस तरह से मौसम में अजीब बदलाव देखने को मिले हैं, उससे महसूस हो रहा है कि इस संकट ने दस्तक दे दी है। वैज्ञानिकों के मुताबिक जलवायु परिवर्तन की वजह से खेती के पैटर्न में बहुत ज्यादा बदलाव आने की संभावना है, जिसके पैटर्न को पकड़ने में गरीब देशों और उसके भी छोटे किसानों को बहुत मुश्किल हो सकती है। भविष्यवाणी के मुताबिक बदली हुई परिस्थितियों में कुछ अनाजों के पैदावार में बहुत ही ज्यादा गिरावट आने की आशंका है तो कुछ की बढ़ भी सकती हैं। लेकिन, उनकी भी गुणवत्ता प्रभावित होने की भरपूर आशंका मौजूद है।

जलवायु परिवर्तन से वैश्विक कृषि पर संकट-रिसर्च
ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से हो रहे जलवायु परिवर्तन का दुनियाभर में खेती पर पड़ रहे असर पर अमेरिका के नासा और कोलंबिया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक शोध किया है, जिसके परिणाम भारत जैसे देशों के लिए बहुत भयावह खाद्यान संकट की ओर इशारा कर रहे हैं। नासा के गोड्डार्ग इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस स्टडीज के लीड ऑथर और पर्यावरण वैज्ञानिक जोनास जैगरमेयर, न्यूयॉर्क के कोलंबिया यूनिवर्सिटी के दी अर्थ इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक और दी पोट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इंपैक्ट रिसर्च के शोधकर्ताओं की यह रिसर्च 'नेचर फूड' की वेबसाइट पर प्रकाशित हुई है। शोध के मुताबिक दुनियाभर के ब्रेडबास्केट इलाके में अभी जो मौसम में बदलाव देखा जा रहा है, वहां के किसानों को अब नए पर्यावरण की हकीकत को स्वीकार करना होगा और उसी के मुताबिक नया पैटर्न अपनाना पड़ेगा।

एक दशक के भीतर आने वाला है खाद्यान संकट
जैगरमेयर ने आने वाले वर्षों में किसानों के सामने पैदा होने वाली चुनौतियों के बारे में कहा है कि, 'ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रों में हम देख रहे हैं कि पर्यावरण में हुए बदवावों से फसलों की पैदावार प्रभावित हो रही है। मानव-निर्मित ग्रीनहाउस गैस के निकलने से तापमान बढ़ रहा है, बारिश के पैटर्न में बदलाव आ रहा है और हवा में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा ज्यादा है। इससे फसल का विकास प्रभावित होता है और हम देख रहे हैं कि आने वाले समय में असामान्य वर्ष ही सामान्य हो जाएंगे.....और दुनियाभर के मुख्य कृषि वाले इलाकों में यह एक दशक के अंदर या उससे पहले भी हो जाएगा।"

ग्लोबल वॉर्मिंग संकट से बचने के लिए क्या करें किसान ?
जाहिर है कि जिस तरह से मौसम में लगातार बदलाव नजर आ रहा है और अत्यधिक गर्मी, बहुत ज्यादा बारिश, सूखा, समय से पहले बर्फबारी देखने को मिल रही है, यह उसी जलवायु परिवर्तन की वजह से माना जा रहा है। नासा से जुड़े वैज्ञानिक का कहना है कि 'इसका मतलब ये है कि किसानों को तेजी से बदलाव के लिए तैयार रहना होगा, उदाहरण के लिए फसल लगाने के लिए तारीखों में परिवर्तन करना होगा या फसल के विभिन्न प्रकारों का इस्तेमाल करना होगा, ताकि नुकसान को कम किया जा सके।..' हालांकि, उच्च आक्षांश के क्षेत्रों में इसका फायदा भी मिल सकता है।

गरीब देशों के किसानों के लिए क्या कहा गया है ?
इस रिसर्च के को-ऑथर और पोट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इंपैक्ट रिसर्च के शोधकर्ता क्रिस्टोफ मुलर के मुताबिक, 'आंकड़े साफ तौर पर बताते हैं कि गरीब देशों की जो मुख्य फसलें हैं, उनके पैदावार में बहुत ही ज्यादा गिरावट आने की संभावना है। इसकी वजह से पहल से ही खाद्य सुरक्षा से जूझ रहे इन देशों का संकट और गहरा सकता है। ' स्टडी में सबसे ज्यादा चिंता गरीब देशों और छोटे किसानों को लेकर जताई गई है, जिनके सामने खाद्य सुरक्षा का जोखिम बढ़ने की आशंका है।
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किस अनाज के उत्पादन पैटर्न में आने वाला है बड़ा बदलाव ?
शोध से यह भी पता चला है कि इस सदी के अंत तक मकई के पैदावार में करीब एक-चौथाई तक की गिरावट आ सकती है। लेकिन दुनियाभर में गेहूं के पैदावार में 17 फीसदी तक इजाफा होने की भी संभावना है। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि गेहूं की पैदावार में जितनी बढ़ोतरी की संभावना है, वह इतना नहीं होने वाला कि मक्के की कमी को पूरा किया जा सके। स्टडी में कहा गया है कि 'वातावरण में ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइनड की मौजूदगी से फसल के विकास खासकर गेहूं पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। लेकिन, इससे उसके पोषक तत्व में कमी हो सकती है।' शोध में साफ कहा गया है कि अगर दुनियभर के देशों की ओर से हो रहे प्रयासों से जलवायु परिवर्तन पर सबसे अच्छी संभावना भी देखी जाए तो भी 'वैश्विक खेती' एक नए जलवायु वास्तविकता का सामना कर रही है।












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