मुस्लिम देशः कहां क्या है ईशनिंदा क़ानून

प्रदर्शन करती मुस्लिम महिलाएं
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प्रदर्शन करती मुस्लिम महिलाएं

पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने ईसाई महिला आसिया बीबी को ईशनिंदा के एक मामले में बरी कर दिया है.

निचली अदालत और फिर हाई कोर्ट ने इस मामले में आसिया बीबी को मौत की सज़ा सुनाई थी.

उसी सज़ा के ख़िलाफ़ अपील की सुनवाई करते हुए अदालत ने आसिया बीबी को अब बरी कर दिया है.

फ़ैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस मियां साक़िब निसार ने कहा कि वो हाई कोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फ़ैसलों को रद्द करते हैं.

आसिया पर उनके पड़ोस में रहनेवाली महिलाओं ने पैगंबर मोहम्मद का अपमान करने के आरोप लगाए थे.

अदालत के इस फ़ैसले के बाद पाकिस्तान में एक बार फ़िर तौहीन-ए-रिसालत यानी ईशनिंदा क़ानून पर बहस तेज़ हो गई है.

साल 1990 के बाद से अब तक पाकिस्तान में भीड़ या लोगों ने ईशनिंदा का आरोप लगाकर कम से कम 69 लोगों की हत्या कर दी है.

अलग-अलग संस्थानों से जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक पाकिस्तान में इस समय 40 लोग ईशनिंदा के क़ानून के तहत दोषी क़रार दिए जाने के बाद या तो मौत की सज़ा का इंतज़ार कर रहे हैं या उम्रक़ैद काट रहे हैं.

पाकिस्तान में निचली अदालतों में आए सैकड़ों मामलों में ईश-निंदा के लिए लोगों को सज़ा सुनाई गई लेकिन हाई कोर्ट ने सबूतों के अभाव, छानबीन की प्रक्रिया में कमी या शिकायतकर्ता की गलत मंशा को देखते हुए फैसलों को पलट दिया. इसमें से सैकड़ों ईसाई हैं जिनपर आरोप लगाए गए हैं.

कई देशों में ईशनिंदा क़ानून

लेकिन पाकिस्तान दुनिया का ऐसा अकेला देश नहीं है जहां ईशनिंदा को लेकर क़ानून हैं. शोध संस्थान प्यू रिसर्च की ओर से साल 2015 में जारी की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 26 फ़ीसदी देशों में धर्म के अपमान से जुड़े क़ानून हैं जिनके तहत सज़ा के प्रावधान हैं. इनमें से 70 फ़ीसदी देश मुस्लिम बहुल है.

इन देशों में ईशनिंदा के आरोप के तहत जुर्माना और क़ैद की सज़ा के प्रावधान हैं लेकिन सऊदी अरब, ईरान और पाकिस्तान में इस अपराध में मौत तक की सज़ा का प्रावधान है.

एक नज़र ऐसे चुनिंदा देशों पर जहां ईशनिंदा से जुड़े क़ानून हैं.

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पाकिस्तान

पाकिस्तान में प्रदर्शन
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पाकिस्तान में प्रदर्शन

धर्म से संबंधित आपराधिक मामलों को सबसे पहले ब्रिटिश शासनकाल के दौरान वर्ष 1860 में संहिताबद्ध किया गया था और इसमें वर्ष 1927 में विस्तार किया गया.

विभाजन के बाद पाकिस्तान ने इसे अपना लिया.

पाकिस्तान में ज़िया-उल हक़ की सैन्य सरकार के दौरान 1980 से 86 के बीच इसमें और धाराएं शामिल की गईं. वे उनका इस्लामीकरण करना चाहते थे और वर्ष 1973 में अहमदी समुदाय को ग़ैर-मुस्लिम समुदाय घोषित किया गया था और वो इसे क़ानूनी तौर पर अलग करना चाहते थे.

ब्रितानी शासनकाल के दौरान बनाया गया ये आम क़ानून था. इसके तहत अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी पूजा करने की वस्तु या जगह को नुकसान या फिर धार्मिक सभा में खलल डालता है तो उसे दंड दिया जाएगा. साथ ही अगर कोई किसी की धार्मिक भावनाओं का अपमान बोलकर या लिखकर या कुछ दृष्यों से करता है तो वो भी गैरक़ानूनी माना गया.

इस क़ानून के तहत एक से 10 साल तक की सज़ा दी सकती थी जिसमें जुर्माना भी लगाया जा सकता था. वर्ष 1980 की शुरुआत में पाकिस्तान की दंड संहिता में धार्मिक मामलों से संबंधित अपराधों में कई धाराएं जोड़ दी गईं.

इन धाराओं को दो भागों में बांटा गया- जिसमें पहला अहमदी विरोधी क़ानून और दूसरा ईशनिंदा क़ानून शामिल किया गया.

अहमदी विरोधी क़ानून 1984 में शामिल गया था. इस क़ानून के तहत अहमदियों को खुद को मुस्लिम या उन जैसा बर्ताव करने और उनके धर्म का पालन करने पर प्रतिबंध था.

ईशनिंदा क़ानून को कई चरणों में बनाया गया और उसका विस्तार किया गया. वर्ष 1980 में एक धारा में कहा गया कि अगर कोई इस्लामी व्यक्ति के खिलाफ़ अपमानजनक टिप्पणी करता है तो उसे तीन साल तक की जेल हो सकती है.

वहीं वर्ष 1982 में एक और धारा में कहा गया कि अगर कोई व्यक्ति कुरान को अपवित्र करता है तो उसे उम्रकैद की सज़ा दी जाएगी. वर्ष 1986 में अलग धारा जोड़ी गई जिसमें ये कहा गया कि पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ ईशनिंदा के लिए दंडित करने का प्रावधान किया गया और मौत या उम्र कैद की सज़ा की सिफारिश की गई.

सऊदी अरब

सऊदी अरब में इस्लामी क़ानून शरिया लागू है. सऊदी अरब में लागू शरिया क़ानून के तहत ईशनिंदा करने वाले लोग मुर्तद यानी धर्म को ना मानने वाले घोषित कर दिए जाते हैं जिसकी सज़ा मौत है.

2014 में सऊदी अरब में दहशतगर्दी से निबटने के लिए नया क़ानून बनाया गया जिसके तहत स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि ''नास्तिकता का किसी भी रूप में प्रचार करना और इस्लाम के बुनियादी सिद्धांत जिन पर ये देश स्थापित है उनके बारे में सवाल उठाना दहशतगर्दी में आता है.''

ईरान

2012 में ईरान में नए सिरे से लाई गई दंड संहिता में ईशनिंदा के लिए एक नई धारा जोड़ी गई थी. इस नई धारा के तहत धर्म को न मानने वाले और धर्म का अपमान करने वाले लोगों के लिए मौत की सज़ा तय की गई है.

नई संहिता की धारा 260 के तहत कोई भी व्यक्ति अगर पैगंबर-ए-इस्लाम या किसी और पैगंबर की निंदा करता है तो उसे मौत की सज़ा दी जाएगी.

इसी धारा के तहत शिया फ़िरक़े के 12 इमामों और पैगंबर इस्लाम की बेटी की निंदा करने की सज़ा भी मौत है. इस नए क़ानून के तहत बदलाव ये किया गया है कि इसमें से इस्लाम के पवित्र स्थलों को अलग कर दिया गया है. हालांकि पुरानी दंड संहिता की धारा 513 को अभी भी क़ानूनी हैसियत हासिल है जिसमें ये बात भी शामिल की गई है. इन दोनों ही धाराओं के तहत ईशनिंदा की सज़ा मौत है.

प्रदर्शन
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प्रदर्शन

इन दो अलग-अलग क़ानूनों के अलावा ईरान के संविधान के तहत ईशनिंदा के जुर्म को सिर्फ़ 'सबउन्नबी' यानी नबी की शान में गुस्ताख़ी ही नहीं बल्कि ज़मीन पर फ़साद फैलाने जैसा कहा गया है लेकिन इसके तहत कोई सज़ा तय नहीं की गई है. लेकिन ये जुर्म करने वाले को ईरान में सज़ा या सज़ा-ए-मौत दोनों हो सकती हैं.

मिस्र

मिस्र के संविधान में 2014 में हुए अरब स्प्रिंग (सरकार विरोधी प्रदर्शनों) के बाद संशोधन किया गया है जिसके बाद से इस्लाम को राष्ट्रीय धर्म का दर्जा दिया गया है और अन्य धर्मों को वैध माना गया है.

मिस्र की दंड संहिता की धारा 98-एफ़ के तहत पर ईशनिंदा पर प्रतिबंध है और इस क़ानून का उल्लंघन करने वालों को कम से कम छह महीनों और अधिकतम पांच साल तक की सज़ा हो सकती है.

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इंडोनेशिया

इंडोनेशिया में प्रदर्शन
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इंडोनेशिया में प्रदर्शन

दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया में सरकारी नज़रिए के मुताबिक सिर्फ़ एक ख़ुदा पर यक़ीन किया जा सकता है.

1965 में पूर्व राष्ट्रपति सुकार्णो ने देश के संविधान में इशनिंदा के क़ानून को धारा ए-156 के मसौदे पर हस्ताक्षर किए थे लेकिन ये लागू हुआ राष्ट्रपति सूहार्तो के शासनकाल में 1969 में.

इस क़ानून के तहत देश के सरकारी धर्म, इस्लाम, ईसाइयत, हिंदू धर्म, बुद्ध मत और कन्फ्यूसिज़्म से अलग होना, या इन धर्मों का अपमान करना, दोनों को ही ईशनिंदा माना गया है जिसकी ज़्यादा से ज़्यादा सज़ा पांच साल क़ैद है.

इस क़ानून के तहत किसी व्यक्ति पर मुक़दमा दर्ज करने से पहले जांच करना ज़रूरी है लेकिन अगर उस व्यक्ति पर दोबारा इस जुर्म के आरोप लगते हैं तो उस पर मुक़दमा चलाया जा सकता है.

देश में क़ानूनी तौर पर अभिव्यक्ति की आज़ादी है लेकिन धर्मों पर टिप्पणी की सख़्त मनाही है. इसके अलावा नास्तिकता और इसके प्रचार पर भी पूरी तरह पाबंदी है.

राष्ट्रपति सुहार्तो का 32 साल का कार्यकाल 1998 तक चला जिसके बाद देश में ईशनिंदा के तहत मुक़दमों की संख्या में बढ़ौत्तरी हुई. मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक यहां सौ से ज़्यादा लोगों को ईशनिंदा के क़ानून के तहत दोषी क़रार दिया जा चुका है.

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मलेशिया

मुसमलान प्रदर्शनकारी
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मुसमलान प्रदर्शनकारी

मलेशिया की दंड संहिता भी पाकिस्तान की दंड संहिता की ही तरह मूल रूप से अंग्रेज़ों की बनाई हुई दंड संहिता पर ही आधारित है. दोनों ही देशों में ईशनिंदा से जुड़े क़ानून बहुत हद तक मिलते जुलते हैं.

मलेशियाई दंड संहिता की धारा 295, 298 और 298-ए ईशनिंदा से जुड़ी हैं. इनके तहत किसी भी धर्म के धर्मस्थल का अपमान करना, धर्म के आधार पर समाज में फूट पैदा करना या लोगों को उत्तेजित करना, जानबूझकर किसी भी व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाना अपराध है. इसके तहत अधिकतम तीन साल की सज़ा हो सकती है और जुर्माना लगाया जा सकता है.

इसके अलावा मलेशिया की एक अदालत के फ़ैसले के बाद से दूसरे धर्मों की किताब में अल्लाह शब्द के इस्तेमाल पर भी पाबंदी है. सितंबर 2015 में दिए एक फ़ैसले में उच्च अदालत ने कहा था कि अगर कोई भी मुसलमान ऐसी किताब प्रकाशित करते हुए पकड़ा जाता है जिसमें धार्मिक क़ानूनों के ख़िलाफ़ मवाद हो तो उस पर भी मुक़दमा दायर किया जा सकता है.

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