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मुस्लिम देश सीरिया की 11 साल बाद अरब लीग में वापसी, इसका मतलब क्या होगा?

सीरिया की अरब लीग में वापसी हो गई है। लेकिन, इससे वहां के जमीनी हालात में बहुत ज्यादा परिवर्तन होगा, इसकी संभावना नहीं लगती। अरब देश चाहकर भी उसकी अधिक मदद नहीं कर सकते।

syria Arab League

सऊदी अरब में शुक्रवार को अरब लीग शिखर सम्मेलन में सीरिया की वापसी को क्षेत्रीय जियो-पॉलिटिक्स में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन, सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद का यहां आना वास्तव में जमीनी हालात में तत्काल कोई परिवर्तन लाएगा, इसकी संभावना नहीं लगती।

11 साल बाद सीरिया की वापसी
11 साल से ज्यादा गुजर गए। सीरिया को विरोधियों पर क्रूरता और देश में युद्ध के हालात पैदा करने की वजह से अरब देशों के संगठन से बाहर कर दिया गया था। लेकिन, सऊदी अरब में अब अरब देश सीरिया की समस्याओं की ओर ध्यान देने के लिए तैयार हुए हैं वह काफी अहम है। क्योंकि, यह असद की सरकार के अस्तित्व के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, जो पश्चिम को फूटी आंखों नहीं सुहा रही।

सीरिया के लिए क्या है उम्मीद?
अरब देशों के इस कदम से सीरिया को उसकी मौजूदा स्थिति का सामना करने में मदद मिलने की संभावना पैदा हुई है। जानकारों की राय में इससे वहां संघर्ष की स्थिति कम हो सकती है, मादक द्रव्य की समस्या भी घटेगी, शरणार्थी संकट से भी उसे उबारने में मदद मिलेगी, उसकी सीमाओं को सुरक्षित किया जाएगा और ईरान समर्थित उपद्रवियों की भूमिका भी सीमित की जा सकेगी।

सीरिया सरकार की जीत- एक्सपर्ट
अलजजीरा की एक रिपोर्ट के मुताबिक सेंचुरी इंटरनेशनल के फेलो और मिडिल-ईस्ट के एनालिस्ट एरोन लुंड का कहना है कि अरब लीग की पूर्ण सदस्यता प्राप्त करना सीरिया की सरकार के लिए बड़ी जीत है। उनका कहना है कि अरब नेताओं द्वारा असद को अपनाने का मतलब है कि उनकी राजनीतिक जीत है।

'इससे बहुत बड़ा बदलाव नहीं आएगा'
हालांकि, एरोन का यह भी कहना है कि 'इससे बहुत बड़ा बदलाव नहीं आएगा। सीरिया को बहुत ज्यादा सहायता और निवेश की आवश्यकता है। अरब लीग इसमें उसकी मदद नहीं कर सकता, लेकिन खाड़ी के अरब देश कर सकते हैं।' तथ्य यह है कि सीरिया को अरब लीग में फिर से लाने की राजनयिक पहल में सऊदी अरब ने बड़ी भूमिका निभाई है। सीधे शब्दों कहें तो अगर सऊदी अरब का स्टैंड नहीं बदलता तो यह होना मुश्किल था।

अमेरिका के रुख का है इंतजार
वैसे अरब लीग में सीरिया की आपसी को लेकर कतर, कुवैत और मोरक्को जैसे दे अभी भी उत्साहित नहीं हैं और असद सरकार को गैरकानूनी मानते हैं। लेकिन, सऊदी अरब के अरब और मुस्लिम देशों पर प्रभाव की वजह से वे उसकी वापसी को रोक नहीं पाए। कई अरब सरकारों के नजरिए से अमेरिका और उसके पीछे चलने वाले देशों की सीरिया को अलग-थलग रखने की रणनीति अब ज्यादा टिकाऊ नहीं रहेगी।

सीरिया पर लगे प्रतिबंध से वित्तीय सहायता में दिक्कत
सीरिया सरकार का एक काम हो गया है। अब उसे वित्तीय मदद चाहिए, जिसके लिए उसे एक बार फिर सऊदी अरब और अन्य अमीर अरब देशों से ही आस है। लेकिन, अरब देश पैसे देना भी चाहें तो ऐसा तत्काल होना मुमकिन नहीं है। क्योंकि, अमेरिका समेत पश्चिमी देशों ने सीरिया पर जो प्रतिबंध लगा रखे हैं, उसके चलते सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात या बाकी अरब देशों के लिए फिलहाल ऐसा कर पाने में दिक्कत होगी।

ऐसे में एक्सपर्ट की राय है कि जबतक गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल के सदस्य सीरिया में निवेश करने में सक्षम नहीं हो पाएंगे, उसे ईरान से दूर करना नामुमकिन होगा। इसलिए ,सीरिया के अरब लीग में वापसी राजनयिक रूप से तो बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन वहां की सरकार के लिए वैश्विक नजरिए से सबकुछ सामान्य हो जाना अभी दूर की कौड़ी है।

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