Mojtaba Khamenei Secret Letter: ईरान में तख्तापलट की आहट? मोजतबा खामेनेई की 'सीक्रेट चिट्ठी' ने खोली पोल

Mojtaba Khamenei Secret Letter: ईरान के सत्ता गलियारों में इस वक्त भारी खींचतान मची हुई है। सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत के बाद अब उनके बेटे मोजतबा खामेनेई कमान संभाल रहे हैं, लेकिन उनके सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है। एक तरफ इजरायल और अमेरिका के साथ युद्ध की आहट है, तो दूसरी तरफ देश के भीतर से ही विद्रोह के स्वर उठ रहे हैं।

हाल ही में एक 'सीक्रेट लेटर' लीक हुआ है, जिसने यह साफ कर दिया है कि तेहरान की सरकार और सेना अब एकमत नहीं हैं। परमाणु समझौते को लेकर छिड़ी इस जंग ने ईरान को दो गुटों में बांट दिया है।

Mojtaba Khamenei Secret Letter

Iran US secret Talks: क्या है वो 'सीक्रेट लेटर' जिसने खोली पोल?

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान, संसद स्पीकर और विदेश मंत्री ने मिलकर मोजतबा खामेनेई को एक गोपनीय पत्र भेजा था। इसमें चेतावनी दी गई है कि देश की आर्थिक हालत बेहद खराब हो चुकी है और अब अमेरिका से परमाणु मुद्दे पर बात करना मजबूरी है। यह पत्र निजी था, लेकिन इसके लीक होने से सरकार की किरकिरी हो गई। अब इस लीक को लेकर जांच जारी है, क्योंकि ईरान में सरकारी दस्तावेज सार्वजनिक करने पर 10 साल की जेल का प्रावधान है।

मोजतबा की 'रेड लाइन' और अधिकारियों की बगावत

मोजतबा खामेनेई ने वार्ताकारों को सख्त निर्देश दिए थे कि अमेरिका के साथ किसी भी कीमत पर परमाणु मुद्दे पर चर्चा नहीं होनी चाहिए। उन्होंने इसे ईरान के सम्मान की 'रेड लाइन' बताया था। हालांकि, लीक हुई जानकारी के अनुसार, ईरानी वार्ताकारों ने इस आदेश को नजरअंदाज कर दिया। उनका मानना है कि जब तक परमाणु प्रतिबंध नहीं हटते, तब तक देश की डूबती अर्थव्यवस्था को बचाना मुमकिन नहीं है। यह सीधे तौर पर सुप्रीम लीडर के आदेश की अवहेलना है।

Iran political Crisis: कट्टरपंथियों और नरमपंथियों के बीच जुबानी जंग

ईरान की संसद के सदस्य महमूद नबावियन जैसे कट्टरपंथी नेता इस वार्ता के सख्त खिलाफ हैं। उनका कहना है कि वार्ताकारों ने सुप्रीम लीडर के निर्देशों का उल्लंघन कर रणनीतिक भूल की है। कट्टरपंथियों का मानना है कि अमेरिका पर भरोसा करना आत्मघाती होगा, भले ही समुद्री नाकेबंदी हट जाए। वहीं, उदारवादी गुट का तर्क है कि अगर बातचीत नहीं हुई, तो ईरान भुखमरी और दिवालियापन की कगार पर पहुंच जाएगा। दोनों पक्षों की इस लड़ाई ने प्रशासन को पंगु बना दिया है।

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डोनाल्ड ट्रंप का तंज और अंतरराष्ट्रीय दबाव

ईरान की इस आंतरिक फूट पर पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी चुटकी ली है। उन्होंने कहा कि ईरान के अधिकारी वॉशिंगटन के साथ बातचीत के मुद्दे पर आपस में 'बिल्लियों' की तरह लड़ रहे हैं। यह बयान ईरान के लिए अपमानजनक साबित हुआ है। दुनिया देख रही है कि जो देश खुद को एकजुट बताता था, वह आज सत्ता के संघर्ष और भविष्य की रणनीति को लेकर पूरी तरह बिखरा हुआ नजर आ रहा है।

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क्या इतिहास खुद को दोहराएगा?

जानकार इस स्थिति की तुलना 1988 से कर रहे हैं। तब अधिकारियों ने रूहोल्लाह खोमैनी को समझाया था कि ईरान-इराक युद्ध जारी रखना नामुमकिन है, जिसके बाद खोमैनी ने शांति का 'जहर का प्याला' पिया था। आज फिर मोजतबा खामेनेई उसी मोड़ पर खड़े हैं। सवाल यह है कि क्या वो कट्टरपंथियों की सुनेंगे या अपने अधिकारियों की सलाह मानकर अमेरिका से हाथ मिलाएंगे? ईरान का भविष्य अब इसी एक फैसले पर टिका हुआ है।

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