कुछ सालों में बर्बाद हो जाएंगे अरब देश, धिपेगी धरती, मिट जाएगा इंसानों का नामोनिशान... आ गया महा खतरा

फ़ारस की खाड़ी के तेल-समृद्ध अरब राज्यों ने गर्मी के खिलाफ अब तक एयर कंडीशन का इस्तेमाल किया है और खुद को सुरक्षित किया है, लेकिन राजधानी के अलावा बाकी जगहों पर रहने वाले लोग ऐसा नहीं कर सकते हैं।

अबू धाबी, अगस्त 20: तेल की कमाई से रईसी करने के लिए प्रख्यात अरब देशों पर संकट के गहरे बादल मंडरा रहे हैं और कुछ सालों के बाद अरब देश पूरी तरह से सुनसान हो जाएंगे और इंसानों का नामोनिशान मिट सकता है। इस साल लंदन ही इतना ज्यादा गर्म हो गया था, कि तमाम अखबार ये हेडलाइंस लिख रह थे, कि लंदन शायद नया दुबई हो गया है, जहां गर्मी ने हर पुराने रिकॉर्ड को धाराशाई कर दिया है। वहीं, एक के बाद एक, स्पेन और पुर्तगाल जैसे यूरोपीय देशों ने इस साल गर्मी के मामले में रिकॉर्ड ऊंचाई दर्ज की है। लेकिन, उत्तरी गोलार्ध ने वास्तव में रिकॉर्ड तापमान को इस साल महूसस किया है और यूरोप के कई हिस्से में जंगल की आग भड़कने की आशंका जताई गई है और यूरोपीय शहरों में फारस की खाड़ी की तुलना में अधिक गर्म स्थिति देखी गई।

मध्य-पूर्व पर सबसे बड़ा खतरा

मध्य-पूर्व पर सबसे बड़ा खतरा

हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि, सिर्फ ज्यादा तापमान ही किसी शहर को सुनसान करने के लिए पर्याप्त नहीं है, बल्कि अगर ज्यादा तापमान में आर्दता मिल जाए, तो फिर वो खतरनाक स्थिति पैदा करता है और मध्य पूर्व के साथ यही होने वाला है। मध्य पूर्व अभी भी काफी गर्म है। ईरानी शहर अबादान ने इस साल सबसे शुष्क गर्मी के तापमान का रिकॉर्ड बनाया है, जब 5 अगस्त को 53 डिग्री सेल्सियस का तापमान रिकॉर्ड किया गया, जिसने दुनियाभर के वैज्ञानिकों को डरा दिया है। सबसे ज्यादा डराने वाली बात ये थी, कि 53 डिग्री सेल्सियस तापमान के साथ साथ ह्यूमेडिटी भी काफी ज्यादा थी, जिसने लोगों का हाल बेहाल कर दिया था और वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है, कि इस क्षेत्र में उच्च स्तर की आर्द्रता अगर नियमित हो गई, तो यह क्षेत्र इंसानों के रहने के लिए दुर्गम हो जाएगा। यानि, अगर चंद सालों में ईरानी शहर अबादान को छोड़कर लोगों का बाहर निकलना पड़ेगा।

रहने के लिए होगा दुर्गम स्थान

रहने के लिए होगा दुर्गम स्थान

वैज्ञानिकों का कहना है, कि आर्दता बढ़ने के साथ ही ये स्थान इंसानों के रहने लायक नहीं रहेगा। वैज्ञानिकों के मुताबिक, जब मौसम आर्द्र होता है, तो उसे ठंडा करना कठिन होता है, क्योंकि शुष्क मौसम में हमारे शरीर को शुष्क हाव की गर्मी को "गीली" हवा में बदलने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता है, जिसकी वजह से शरीर को पसीना बाहर निकालना और तामपान को संतुलित करना काफी ज्यादा मुश्किल हो जाता और ऐसी स्थिति में इंसान गंभीर स्वास्थ्य संकट का शिकार हो सकता है। वैज्ञनिकों के मुताबिक, आर्द्रता के साथ संयुक्त ऊष्मा के माप को वेट बल्ब तापमान कहा जाता है। ये नाम इस स्थिति को मापने के तरीके से निकला है, जिसका शाब्दिक मतलब, एक गीले कपड़े को थर्मामीटर के चारों ओर लपेटकर और तापमान को मापने के रूप में पानी वाष्पित हो जाता है। यह सीधे तौर पर हमारे शरीर की पसीने के जरिए खुद को ठंडा करने की क्षमता को बताता है। लेकिन, अगर आर्दर्त की वजह से अगर पसीना ही नहीं बने, तो फिर शरीर खुद को ठंडा रखने में कामयाब नहीं हो पाएगा।

'वेट बल्ब' तापमान, कैसे रहेंगे इंसान?

'वेट बल्ब' तापमान, कैसे रहेंगे इंसान?

कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में पर्यावरण विज्ञान और इंजीनियरिंग के प्रोफेसर टैपियो श्नाइडर ने सीएनएन को बताया कि, "वेट बल्ब का तापमान सबसे कम तापमान है, जिसे बाष्पीकरणीय शीतलन द्वारा पहुंचा जा सकता है।" और मध्य पूर्व विशेष रूप से बढ़ते वैश्विक तापमान की चपेट में है। ये "क्षेत्र पहले से ही गर्म रहा है, लेकिन ईरान के कई शहरों के आर्द्र होने के बाद अब आशंका इस बात की है, कि पूरा मिडिल ईस्ट आर्दता की चपेट में आ सकता है। उन्होंने कहा कि, "इसलिए, ग्लोबल वार्मिंग इसे उस क्षेत्र में धकेल सकती है जहां मानव स्वास्थ्य खतरे में होगा।" यानि, एक तो पहले से भी भीषण गर्मी और ऊपर से आर्दता... यानि, मिडिल ईस्ट वीरान और सुनसान।

यूरोपीय देशों की भी स्थिति खराब

यूरोपीय देशों की भी स्थिति खराब

19 जुलाई को यूके ने रिकॉर्ड पर अपने सबसे गर्म दिन का अनुभव किया औ पहली बार यूके का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस को कर गया। पूर्वी इंग्लैंड में 40.3C का उच्च तापमान रिकॉर्ड किया गया। उसी दिन, लंदन और दुबई दोनों में औसत तापमान 34 डिग्री सेल्सियस था, लेकिन लंदन में वेट बल्ब का तापमान 20 डिग्री सेल्सियस था, जबकि दुबई में 27C से ज्यादा वेट बल्ब का तापमान था। फारस की खाड़ी दुनिया के उन कुछ स्थानों में से एक है, जहां ऐसा वेट बल्ब तापमान रिकॉर्ड किया गया है, जो इंसानों के जीवित रहने की सीमा से अधिक है और ये तापमान था 35 डिग्री सेल्सियस और साल 2005 के बाद से अभी तक 9 बार ऐसा हो चुका है, जब वेट बल्ब तापमान इंसानों के जिंदा रहने की क्षमता से ज्यादा हो गया हो। 35 डिग्री सेल्सियस वेट बल्ब तापमान का मतलब है, कि शरीर अब अपने आप को उस तापमान तक ठंडा नहीं कर सकता है, जो उसके जिंदा रहने के लिए जरूरी है। प्रोफेसर श्नाइडर ने कहा कि, "उम्र और फिटनेस को फ्री रहने के लिए यह एक कठिन सीमा है और मनुष्य उन परिस्थितियों में जीवित नहीं रह सकते हैं और वेट बल्ब की इस स्थिति में इंसान कुछ घंटों के अंदर मर सकता है।'

मिडिल ईस्ट में बजी खतरे की घंटी

मिडिल ईस्ट में बजी खतरे की घंटी

फ़ारस की खाड़ी के तेल-समृद्ध अरब राज्यों ने गर्मी के खिलाफ अब तक एयर कंडीशन का इस्तेमाल किया है और खुद को सुरक्षित किया है, लेकिन राजधानी क्षेत्रों के अलावा बाकी के क्षेत्रों में ये सुविधा नहीं है, कि लोग उस क्षमता के एयर कंडीशन खरीद सकें और अपनी जान बचा सकें और उसपर से स्थिति ये, कि वेट बल्ब का तापमान अब लगातार बढ़ने ही वाला है, क्योंकि ग्लोबल वॉर्मिंग को कम करने के लिए अभी तक पूरी दुनिया में कुछ नहीं किया जा रहा है। इराक के बसरा शहर में कर्मचारियों को इस महीने की शुरुआत में उच्च तापमान के कारण घर में रहने के लिए कहा गया है। हालांकि, घरों को राष्ट्रीय ग्रिड से केवल 10 घंटे तक बिजली ही मिलती है, तो फिर अगर घर में एसी भी लगा हो, तो वो चलेगा कैसे? वहीं, लोगों में गरीबी इतनी ज्यादा है, कि वो जेनरेटर सुविधा का इस्तेमाल भी नहीं कर सकते हैं और इन देशों में परिवार इतना बड़ा होता है, कि हर कमरे में एसी लगाना और उसका खर्च वहन करना लगभग नामुमकिन है।

गाजा जैसे शहरों में कैसे रहेंगे लोग?

गाजा जैसे शहरों में कैसे रहेंगे लोग?

जिन क्षेत्रों को लेकर इजरायल और फिलीस्तीन में सालों से विवाद है और कई युद्ध हो चुके हैं, अब सवाल ये उठ रहे हैं, कि क्या कुछ सालों के बाद वो इलाके इंसानों के रहने लायक रहेंगे? गाजा शहर में इस साल गर्मी में घरों को सिर्फ 3 से 4 घंटे ही बिजली सप्लाई की गई है और लोगों को हर दिन करीब 20 घंटे बिना बिजली के रहना पड़ा, वो भी उस भीषण गर्मी में। वहीं, लेबनान की सरकार अब प्रति दिन दो घंटे से अधिक बिजली नहीं देती है। और यहां तक कि, कुछ खाड़ी अरब राज्यों में, जैसे कि कुवैत, जहां ऊंची ऊंची इमारतों का तेजी से निर्माण हो रहा है, इस साल की गर्मी ने वहां के लोगों को आने वाले आपका का ट्रेलर दिखा दिया है। कंस्ट्रक्शन में काम करने वाले सैकड़ों मजदूर बेहोश हुए हैं और दर्जनों मजदूरों की गर्मी से मौत हो गई है। वहीं, जो बड़े बड़े इरामत बने हुए हैं, उनमें रहने वाले ज्यादातर लोगों के पास एयर कंडीशनिंग मशीन नहीं हैं और इस बार गर्मी में उनका रहना भी मुहाल हो गया है। खासकर मजदूर वर्ग पर गर्मी का भीषण असर पड़ा है।

तो मिडिल ईस्ट का क्या होगा?

तो मिडिल ईस्ट का क्या होगा?

पर्ड्यू यूनिवर्सिटी ने अपने रिसर्च में पाया है, कि इन क्षेत्रों में वेट बल्ब तापमान 32 डिग्री सेल्सियस था, जिसने लोगों को दहला दिया है और मजबूत कदकाठी के लोगों के लिए काम के लिए घर से बाहर निकलना असंभव हो गया है। वैज्ञानिकों का कहना है, कि मिडिल ईस्ट में 31 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा वेट बल्ब इंसानों के लिए खतरे की सीमा है। वहीं, एक एमआईटी सिमुलेशन में पाया गया, कि यदि फारस की खाड़ी में ग्रीनहाउस उत्सर्जन की वर्तमान गति स्थिर रहती है, तो अबू धाबी, दुबई और दोहा जैसे शहरों में वार्षिक अधिकतम वेट बल्ब तापमान इस सदी के अंत तक 35 डिग्री सेल्सियस से काफी आगे निकल जाएगा, जिसका मतलब ये हुआ, कि इन क्षेत्रों में इंसानों का रहना लगभग नामुमकिन हो जाएगा।

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