मालदीव में चीन को पटकने के लिए भारत तैयार, दिल्ली के आशीर्वाद से सोलिह फिर जीत सकते हैं चुनाव

Maldives Election: जी20 शिखर सम्मेलन के जरिए एक तरह जहां भारत ने ग्लोबल पावर बनने के लिए कदम बढ़ा दिए हैं, वहीं हिंद महासागर में स्थिति द्वीप देश मालदीव के चुनाव में भारत बनाम चीन की लड़ाई चल रही है। हालांकि, इस बात की पूरी उम्मीद है, कि चुनाव में चीन को करारी हार मिलने वाली है।

मालदीव एटोल राष्ट्र के नवोदित लोकतांत्रिक मूल्यों को मान्य करने के लिए 9 सितंबर को एक नए राष्ट्रपति का चुनाव हो रहा है। हालांकि, वोट को भारत और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के बीच एक लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि इन दोनों देशों ने हाल के वर्षों में मालदीव की भूराजनीति की कहानी को आकार दिया है।

Maldives Election

मालवीद में भारत बनाम चीन

मालदीव हाल के वर्षों में हिंद महासागर की भू-राजनीति में विवाद का एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है। यही कारण है, कि पर्यवेक्षकों ने चुनाव की व्याख्या चीन और भारत के बीच प्रभाव के लिए संघर्ष के रूप में की है।

खासकर तब से, जब निवर्तमान राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह, चीन के पिट्ठू बने पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन अब्दुल गयूम के खिलाफ भारत समर्थक राजनीति करने लगे।

मालदीव में सितंबर 2018 में हुए पिछले राष्ट्रपति चुनाव को व्यापक रूप से भारत की जीत और चीन की हार के रूप में देखा गया था। अब्दुल्ला यामीन अब्दुल गयूम के नेतृत्व वाले पिछले प्रशासन के दौरान, मालदीव चीन के बेल्ट और रोड इनिशिएटिव में शामिल हो गया था, जो भारत के लिए बहुत बड़ा झटका था।

इसके अलावा, चीन के गुलाम राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन, चीन-मालदीव मैत्री पुल जैसी बड़े पैमाने की परियोजनाओं को आगे बढ़ाने लगे। वहीं, उन्होंने चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर भी कर लिया, हालांकि उसके बाद इलेक्शन आ गया और अब्दुल्ला यामीन की सरकार चुनाव में चारों खाने चित हो गई।

इसके विपरीत, वर्तमान राष्ट्रपति सोलिह का प्रशासन भारत का समर्थन करता है और उसकी नीतियां भारत की तरफ हैं। मालदीव की वर्तमान नीति "इंडिया फर्स्ट" विदेश नीति का पालन करता है, जो भारत के "पड़ोसी पहले" दर्शन का समर्थन करता है।

हालांकि राष्ट्रपति सोलिह भी खुद को चीन विरोधी नहीं मानते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे से सोलिह प्रशासन ने बीजिंग को कई बड़े झटके दिए हैं और बीआरआई के कई प्रोडेक्ट डील को रद्द कर दिया है।

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मालदीव में आज हो रहे हैं चुनाव

इस बार, पांच राजनीतिक दलों और तीन निर्दलीय उम्मीदवारों के आठ दावेदार हैं, जो अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। 2008 के अंत में मालदीव में अपना पहला बहुदलीय राष्ट्रपति चुनाव आयोजित करने के बाद से राष्ट्रपति पद के लिए सबसे ज्यादा उम्मीदवार इसी बार हैं।

मौजूदा राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह एक बार फिर से चुनाव के लिए रेस में हैं और कई राजनीतिक बाधाओं के बावजूद फिर से कार्यकाल हासिल करना उनका लक्ष्य है।

पिछले कई महीनों से भारत लगातार इब्राहिम मोहम्मद सोलिह की मदद कर रहा है और उनकी सरकार के साथ आर्थिक परियोजनाओं पर भारत ने साइन किए हैं, ताकि वो देश में विकास योजनाओं को लांच कर सके, ताकि चुनाव में उनकी पार्टी को बहुमत मिल सके।

दूसरी तरफ, पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन, जो वर्तमान में रिश्वत लेने और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में जेल में सजा काट रहे हैं, और देश के एक और पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद, जो वर्तमान में मालदीव संसद के स्पीकर हैं और राष्ट्रपति सोलिह के पूर्व सहयोगी रह चुके हैं, वो भी चुनाव में हैं और सोलिह को कड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं।

सोलिह और नशीद, राजनीतिक मतभेदों की वजह से अलग अलग हो गये और अब दुर्जेय प्रतिद्वंद्वी बन चुके हैं।

थोड़ी मुश्किल हो रही है सोलिह की राह

सोलिह के सामने अभी भी कई चुनौतियां हैं, जिनमें एक छोटी पार्टी भी शामिल है, जिसमें मोहम्मद नशीद महत्वपूर्ण हैं। मोहम्मद नशीद ने बढ़ते राजनीतिक तनाव के कारण इस साल की शुरुआत में सत्तारूढ़ मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी (एमडीपी) छोड़ दी थी।

पार्टी के सदस्यों में गंभीर रूप से ध्रुवीकरण करने वाली फूट के बाद, नशीद के समर्थकों ने द डेमोक्रेट्स नामक एक नई पार्टी की स्थापना की, जिसके उम्मीदवार, विधायक इलियास लबीब, राष्ट्रपति सोलिह के खिलाफ सात विरोधियों में से एक हैं।

वहीं, राजधानी माले के मेयर मोहम्मद मुइज्जू, जो पीपुल्स नेशनल कांग्रेस पार्टी से चुनाव लड़ रहे हैं, उन्हें चीन समर्थक अब्दुल्ला यामीन का समर्थन मिला हुआ है, जिनके चुनाव लड़ने पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा रखी है।

भारत और चीन के बीच मलेशिया

हिंद महासागर में महत्वपूर्ण शिपिंग लेन के बीच में एटोल राष्ट्र के स्थान के कारण भारत और चीन मालदीव में प्रभाव चाहने वाले दो प्रतिद्वंद्वी हैं।

मालदीव में भारत की गहरी रुचि इसकी भौगोलिक निकटता से जगी है, जबकि चीन की रुचि बीजिंग के समुद्री रेशम मार्ग (एमएसआर) के साथ मालदीव की रणनीतिक स्थिति से जगी है।

2013 में अब्दुल्ला यामीन के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद चीन और मालदीव के बीच रिश्ते बेहतर हुए। 2014 में, राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) पहल के लिए समर्थन मांगने के लिए मालदीव का दौरा किया था। इस बीच, घरेलू असहमति और विरोध पर यामीन के अभियान की भारत और अन्य देशों से काफी आलोचना की गई, जिससे मालदीव के नेता चीन के और भी करीब आ गए।

राष्ट्रपति यामीन ने मावदीव में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए चीन को लीज पर जमीन देना शुरू कर दिया और मालदीव की पुरानी "भारत पहले" नीति को दरकिनार करते हुए चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए।

बदले में, चीन ने मालदीव को ऋण और बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाएं प्रदान कीं, जिनमें से अधिकांश यामीन को लाभ पहुंचाने वाले अस्पष्ट नियम और शर्तों के साथ आईं।

जब इब्राहिम सोलिह 2018 में राष्ट्रपति बने, तो उन्होंने अपने अब्दुल्ला यामीन के फैसलों को पलटना शुरू किया और भारत और मालदीव के बीच खराब हुए संबंधों को फिर से सुधारना शुरू किया। उन्होंने एक बार फिर से राजनीतिक और आर्थिक नुकसान को सुधारने के लिए काम किया। तब से, कई चीनी प्रस्ताव पेश किए गए हैं, जिनमें बीआरआई और एफटीए के तहत पहल शामिल हैं, लेकिन मालदीव ने उन प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया।

हालांकि, चीन के इशारे पर नाचने वाले अब्दुल्ला यामीन ने अपनी खुराफात जारी रखी और देश में भारत के खिलाफ अशांति फैलाना जारी रखा।

अब्दुल्ला यामीन ने देश की सत्तारूढ़ प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव (पीपीएम) के खिलाफ भारत को लेकर निराधार आरोप लगाए, और यहां तक प्रोपेगेंडा फैलाया, कि मालदीव में तैनात भारतीय सैन्य कर्मियों ने संप्रभुता का उल्लंघन किया है।

अब्दुल्ला यामीन ने एक साल से ज्यादा समय तक मालदीव में 'इंडिया आउट' अभियान को आगे बढ़ाया। जबकि, मालदीव के विदेश और रक्षा मंत्रालयों ने एटोल पर किसी भी भारतीय सैन्य उपस्थिति को सख्ती से खारिज कर दिया है।

आख़िरकार, 2022 में, मालदीव के राष्ट्रपति इब्राहिम सोलिह ने एक डिक्री पर हस्ताक्षर किए, जिसमें कहा गया कि विपक्ष का 'इंडिया आउट' अभियान "राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा" है।

आज मालदीव में चुनाव हो रहे हैं, लिहाजा एक बार फिर से नजर सोलिह पर है, कि क्या वो जीत पाते हैं या नहीं। हालांकि, उनकी स्थिति मजबूत है और पूरी संभावना है, कि मालदीव में एक बार फिर से भारत समर्थिक सरकार का निर्माण होगा।

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