Maldives Economic Crisis: कंगाली की कगार पर मालदीव! $400 मिलियन के कर्ज ने उड़ाई मुइज्जू की नींद
Maldives Economic Crisis: मालदीव इस समय भीषण आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहा है, जिसके कारण राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू की सरकार ने भारत से 400 मिलियन डॉलर के करेंसी स्वैप समझौते को तीसरी बार बढ़ाने की गुहार लगाई है। कभी 'इंडिया आउट' का नारा देने वाले मुइज्जू के लिए अब भारत ही संकटमोचक बना हुआ है।
हालांकि, तकनीकी नियमों और सख्त शर्तों के कारण भारत के लिए इस बार अवधि बढ़ाना एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। मालदीव का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खाली है और उसे 2026 तक भारत को अन्य करोड़ों डॉलर के ट्रेजरी बिल भी चुकाने हैं, जिससे रिश्तों में तनाव बढ़ सकता है।

आर्थिक संकट और भारत की मदद
मालदीव इस समय विदेशी मुद्रा की भारी कमी से जूझ रहा है। उसके पास अपना जरूरी आयात करने और पुराना कर्ज चुकाने के लिए पर्याप्त डॉलर नहीं हैं। इसी साल भारत ने मालदीव की मदद के लिए 400 मिलियन डॉलर और 3,000 करोड़ रुपये के दो बड़े समझौतों पर हस्ताक्षर किए थे। भारत पहले भी दो बार कर्ज चुकाने की समयसीमा बढ़ा चुका है, लेकिन मालदीव की हालत अभी भी ऐसी नहीं है कि वह यह पैसा वापस कर सके।
मुइज्जू सरकार की 'इंडिया आउट' नीति
मोहम्मद मुइज्जू ने मालदीव का चुनाव भारत विरोधी रुख अपनाकर जीता था। सत्ता में आते ही उन्होंने भारतीय सैनिकों को वापस भेजने का आदेश दिया और भारत के बजाय चीन को ज्यादा अहमियत दी। उन्होंने भारत से मिले उपहारों (जैसे हेलीकॉप्टर और विमान) को भी वापस करने की बात कही थी। लेकिन जब देश की आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी, तो उन्हें एहसास हुआ कि चीन के मुकाबले भारत उनके लिए ज्यादा भरोसेमंद और नजदीकी मददगार साबित हो सकता है।
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कर्ज चुकाने में बड़ी चुनौतियां
मालदीव को सिर्फ 400 मिलियन डॉलर ही नहीं, बल्कि सितंबर 2026 तक भारत को 50-50 मिलियन डॉलर के दो और बड़े भुगतान करने हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मालदीव की गिरती अर्थव्यवस्था को देखते हुए इन किश्तों का समय पर चुकाया जाना बहुत मुश्किल लग रहा है। अगर भारत तीसरी बार समयसीमा बढ़ाने से इनकार करता है, तो मालदीव के लिए 'डिफ़ॉल्ट' (दिवालिया होने जैसी स्थिति) का खतरा पैदा हो सकता है, जिससे उसकी अंतरराष्ट्रीय साख खराब होगी।
भारत के सामने कठिन फैसला
भारत के लिए यह स्थिति पेचीदा है। एक तरफ मालदीव की वर्तमान सरकार का पिछला भारत-विरोधी रवैया है, तो दूसरी तरफ 'पड़ोसी पहले' (Neighbor First) की नीति। अगर भारत मदद नहीं करता, तो मालदीव पूरी तरह चीन के प्रभाव में जा सकता है। लेकिन बार-बार नियमों में ढील देना भी वित्तीय रूप से कठिन है। आने वाले कुछ हफ्ते यह तय करेंगे कि भारत अपने इस पड़ोसी दोस्त को डूबने से बचाने के लिए नियमों में कितनी नरमी दिखाता है।












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